अनुभाग की रूपरेखा

  •                                                                                                           
    आज के बदलते परिवेश या कहूँ तो वैश्वीकरण के इस युग में विज्ञान के  कारण अभूतपूर्व आविष्कार हुए हैं और इन आविष्कारों ने प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है और इस प्रतिस्पर्धा के कारण ज्ञान विभिन्न भाषाओं के माध्यम से अपनी सीमाएँ लांघ कर एक परिवेश से दुसरे परिवेश में पहुँचने में बाद्य हैI यह सब कुछ अनुवाद के माध्यम से ही संभव हो पा सका है और भविष्य में भी होता रहेगाI  इन तथ्यों के मद्देनज़र इस  पाठ्क्रयम को रूपायित किया गया हैI अतः इस के अंतर्गत शिक्षार्थी अनुवाद का सफल ज्ञान प्राप्त कर सकेंगेI इस पाठ्यक्रम के  माध्यम से अनुवाद के प्रकार, मुख्य रूप से लेकर साहित्यिक और साहित्येतर अनुवाद की संकल्पना को समझ सकेंगेI 

    "साहित्यिक एवं साहित्येतर अनुवाद " शीर्षक यह पाठ्यक्रम . "डॉ. बी. आर. अंबेडकर सार्वत्रिक विश्वविद्यालय , हैदराबाद द्वारा मुक्त शैक्षिक संसाधनों (ओईआर) के कार्यान्वयन" के लिए CEMCA एवं BRAOU का सहयोगी परियोजना का हिस्सा। यह पाठ्यक्रम क्रिएटिव कॉमन्स एट्रिब्यूशन-शेयर अलाइक 4.0 अंतर्राष्ट्रीय  के अंतर्गत लाइसेंस प्राप्त है। 

      "साहित्यिक एवं साहित्येतर अनुवाद " by डॉ. अविनाश. के is licensed under CC BY 4.0


    • एक भाषा (स्त्रोत भाषा) (भाषा1, ‍(Source Language) की किसी सामग्री का दूसरी भाषा (लक्ष्य भाषा, भाषा2, Target Language) में रूपांतरण ही ‘अनुवाद’ है। पारिभाषिक शब्दों में कहें तो स्रोत भाषा में प्रस्तुत किसी सामग्री को उसे अर्थ में लक्ष्य भाषा में प्रस्तुत करना अनुवाद है। यह अनुवाद कार्य हिन्दी से भारतीय भाषाओं में (जैसे- तेलुगु,  तमिल, मलयालम, गुजराती, उड़िया, बंगाली, पंजाबी आदि में)  या भारतीय भाषाओं से हिन्दी में। इसके अलावा अंग्रेजी से हिन्दी,  हिन्दी से अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाओं में (जैसे- जर्मन, रूसी, जापानी आदि)। अनुवाद के इसी विशिष्टता को दूसरे शब्दों में विस्तार दिया जाता है कि अनुवाद मूलभाषा की सामग्री के भावों की रक्षा करते हुए उसे दूसरी भाषा में बदल देना है। 

  • अनुवाद एक भाषा में व्यक्त सामग्री का दूसरी भाषा में अंतरण है। भाषा में व्यक्त सामग्री कोई जड़ पदार्थ नहीं होती, जिसे एक से दूसरी जगह ले जाया जाए और ना ही भाषा कोई भौतिक आधार या पात्र होती है, जिससे सामग्री को उठाकर अन्यत्र में रख दिया जाए। भाषा, संस्कृति की संवाहिका होती है, किसी भाषा में व्यक्त सामग्री उस भाषिक संस्कृति की अभिव्यक्ति होती है, इसीलिए एक भाषा की संस्कृति, चेतना और संवेदना को दूसरी में पुन: प्रस्तुत करना अनुवाद होता है। यह बात साहित्यिक अनुवाद में विशेष कर

    उल्लेखनीय होती है, जहाँ किसी रचना की विषय-वस्तु और शैली-शिल्प को ही न केवल दूसरी भाषा में अनुवाद किया जाता है, बल्कि उस रचना के अभिव्यंजना-सौन्दर्य, सांस्कृतिक चेतना और संवेदना को भी दूसरी भाषा के पाठकों के लिए अनुभूत्य और संप्रेष्य बनाना अनुवादक का दायित्व होता हैसाहित्यिक अनुवाद की प्रकृति और अपेक्षाएँ साहित्येतर सामग्री के अनुवाद से सर्वथा भिन्न होती है साहित्यिक अनुवाद में वस्तुतः साहित्यिक विधाओं की भिन्नता के अनुसार भिन्न-भिन्न समस्याओं, प्रविधियों, शर्तों और प्रयासों से अनुवादक को गुज़रना होता है। कहा जा सकता है कि साहित्यिक अनुवाद रचना की पुनर्रचना होती है।

  • ज्ञान प्रधान, सूचना प्रधान या प्रयोजनमूलक सामग्री साहित्येतर सामग्री कहलाती हैसाहित्य मूलत: सृजनात्मक होता है, जिसमें कल्पना और रचनात्मक प्रतिभा की मुख्य भूमिका होती है जबकि ज्ञानात्मक या ज्ञान प्रधान या सूचनापरक प्रयोजनमूलक सामग्री मानव जीवन के उन सभी कार्यकलापों से संबंधित होती है जो एक यथार्थपरक, तथ्यात्मक और प्रयोजनबद्ध जीवन जीने के लिए आवश्यक होती हैं। अर्थात् मानव जीवन के क्रियाकलाप असीमित हैं। इन क्रियाकलापों के कारण विज्ञान तकनीकी व प्रौद्योगिकी, समाज विज्ञान जिसमें राजनीति से लेकर अर्थशास्त्र तक सम्मिलित हैं, वाणिज्य, व्यवसाय, प्रशासन तंत्र और संचार माध्यमों तक का विस्तृत व्यापक, बहु-आयामी जीवन-तंत्र विकसित हुआ । - आज मानव-जीवन के इस विशाल और विराट तंत्र में विभिन्न भाषाओं के जंजाल में एक ही सेतु है, संप्रेषण का एक ही सूत्र है और वह है- अनुवाद। साहित्यिक और साहित्येतर- ये दो क्षेत्र परस्पर पूरक हैं, इन दोनों के मेल से ही मनुष्य आनुभविक यथार्थ और कल्पनात्मक सौंदर्य सृष्टि का आस्वादन करता है और इस आस्वादन में माध्यम बनता है- अनुवाद। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे देश के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में ज्ञान-विज्ञान और प्रशासन तंत्र का जो अभूतपूर्व प्रसार हुआ, उसमें अनुवाद एक अपरिहार्य माध्यम बनकर उभरा।