"सभ्यता अपने अस्तित्व के लिए अनुवादकों की ऋणी है”- यह एक मान्यता प्राप्त वक्तव्य है। अनुवादों के माध्यम से ही ज्ञान एक भाषा-भाषी समुदाय से दूसरे भाषा-भाषी समुदायों में व्याप्त हुआ है और होता भी रहेगा । विश्व अनेक भाषाओं का व्यवहार स्थल है। किंतु विज्ञान के आविष्कारों ने इस विशाल विश्व को बहुत पास लाकर रख दिया है। आज विश्व में व्याप्त जीवन-दर्शन, सामाजिक व्यवस्थाएँ, धर्म-संस्कृति, भौतिक प्रगति के साधन, विज्ञान के आविष्कारों आदि सब एक कोने से दूसरे कोने तक अल्प काल में पहुँच रहे हैं। ऐसे में उससे संबंधित ज्ञान और विज्ञान का बोध भी सामान्य तक पहुँचना आवश्यक है। ज्ञान का (विज्ञान का भी) किसी एक क्षेत्र में किसी एक भाषा के माध्यम से चाहे आविष्कार हो, पर प्रसार या व्याप्ति को वैश्विक धरातल होना है। यानि प्रसार के ज़रिए ही उसका विकास संभव है। वह अनुवाद के माध्यम से ही विश्व के सुदूर कोनो तक पहुँच सकता है। इसीलिए आज का युग अनुवाद का युग कहा गया है। इतना ही नहीं विश्व विकास के दौर में चल रहा है, विचार-विनिमय की दृष्टि से और सामंजस्य की दृष्टि से आज अनेक जातियों और भाषाओं के बीच समरसता की आवश्यकता है। यह अनुवाद से ही सरल, संवेद्य और संप्राप्य है। अनुवाद एक महत्त्वपूर्ण यज्ञ है। दो भाषाओं के बीच सोद्देश्य उभरकर समुन्नत लक्ष्य से आगे बढ़नेवाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया का अनुशीलन भी एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इस दिशा में प्रस्तुत पाठ्यक्रम में अनुवाद का एक विश्लेषण है जिसके अंतर्गत उसकी परिभाषा, उसके स्वरूप और क्षेत्र का अनुशीलन समाविष्ट है।