इस इकाई में अनुवाद की मूलभूत अवधारणाओं का परिचय कराया जाता है। इसमें अनुवाद के अर्थ और विभिन्न परिभाषाओं के माध्यम से उसकी सैद्धांतिक आधारभूमि को स्पष्ट किया गया है। साथ ही, अनुवाद के स्वरूप और उसके व्यापक क्षेत्र पर प्रकाश डालते हुए यह समझाया गया है कि अनुवाद केवल भाषाई रूपांतरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक सेतु का कार्य करता है। यह इकाई आगे के अध्ययन के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार करती है।
1. अनुवाद : अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और क्षेत्र
1.9. सारांशतः
अनुवाद एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। विश्व में सभ्यता का विस्तार अनुवादों के कारण बहुत सीमा तक हो पाया है। विशाल विश्व को पास लाने का श्रेय भी एक सीमा में अनुवाद को ही मिलता है। अनुवाद के जरिए ज्ञान-विज्ञान का बोध और साहित्य का विस्तार संभव हुआ है और हो रहा है। आज का युग एक ओर विज्ञान का युग है तो दूसरी ओर अनुवाद का युग भी है। आज की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति में अनुवाद अपना योगदान दे रहा है।
अनुवाद की संकल्पना और अवधारणा विश्वव्यापी है। अनुकथन, पुनः कथन की संकल्पना से आरंभ होकर अनुसृजन की प्रक्रिया तक इसकी एक यात्रा भारत में और विश्व में चली है। आज के युग में अनुवाद की प्रक्रिया में भाषिक तत्वों और भाषेतर तत्वों का अन्वेषण हुआ है। उनके सम्यक समावेश से ही अनुवाद को महत्व प्रदान करने के प्रयत्न हुए हैं। अनेक दृष्टियों से अनुवाद प्रक्रिया का अनुशीलन करके उसे परिभाषित करने के सफल प्रयास भी हुए हैं। तत्परिणामस्वरूप स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा की संकल्पनाएँ एवं विषय और क्षेत्र के अनुरूप उभरनेवाले भेदों को रेखांकित भी किया गया है। अनेक व्यवस्थाओं और उपव्यवस्थाओं को सम्यक रूप से समायोजित करने की प्रक्रिया का सैद्धांतिक निरूपण भी अनुवाद कार्य को संपन्न बनाने की दिशा में हुआ है।
आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार अनेक क्षेत्रों से अनुवाद को जोड़ा जा रहा है और उसके महत्व को रेखांकित किया जा रहा है। अनुवाद का क्षेत्र विस्तृत और बहुआयामी है।
अनुवाद प्रक्रिया का वैज्ञानिक विश्लेषण, अनुशीलन, शिक्षण-प्रशिक्षण आदि का महत्व आज समझा जा रहा है। इसीलिए यह आवश्यक है कि आज दो भाषाओं को जाननेवाला हर व्यक्ति ‘अनुवाद’ प्रक्रिया का समग्र बोध प्राप्त करें।