इकाई -1: अनुवाद : अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और क्षेत्र
| Site: | Dr. B.R. Ambedkar Open University Online Learning Portal |
| Course: | अनिवाद सिद्धांत और व्यवहार |
| Book: | इकाई -1: अनुवाद : अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और क्षेत्र |
| Printed by: | Guest user |
| Date: | Wednesday, 15 April 2026, 1:28 AM |
Description
इस इकाई में अनुवाद की मूलभूत अवधारणाओं का परिचय कराया जाता है। इसमें अनुवाद के अर्थ और विभिन्न परिभाषाओं के माध्यम से उसकी सैद्धांतिक आधारभूमि को स्पष्ट किया गया है। साथ ही, अनुवाद के स्वरूप और उसके व्यापक क्षेत्र पर प्रकाश डालते हुए यह समझाया गया है कि अनुवाद केवल भाषाई रूपांतरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक सेतु का कार्य करता है। यह इकाई आगे के अध्ययन के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार करती है।
1. अनुवाद : अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और क्षेत्र
प्रस्तुत पाठ के अध्ययन से आप
- मानव समूह में भाषा का महत्व और दो भाषा समूहों के बीच संपर्क का महत्व जान सकेंगे।
- दो भाषाओं के बीच (दो भाषा-भाषी मानव समूहों के बीच) अनुवाद का महत्व पहचानेंगे।
- ‘अनुवाद’ शब्द का अर्थ और उसकी परिभाषाएँ समझ सकेंगे।
- अनुवाद प्रक्रिया को परिभाषित करने की क्षमता प्राप्त कर सकेंगे।
- भारतीय और पाश्चात्य दृष्टियों से अनुवाद के स्वरूप को जानेंगे।
- अनुवाद के साथ जुड़ी अन्य सह-प्रक्रियाओं का समझेंगे।
- अनुवाद के क्षेत्र विस्तार का अवलोकन करेंगे।
1.1. प्रस्तावना
“सभ्यता अपने अस्तित्व के लिए अनुवादकों की ऋणी है”- यह एक मान्यता प्राप्त वक्तव्य है। अनुवाद के माध्यम से ही ज्ञान एक भाषा-भाषी समुदाय से दूसरे भाषा-भाषी समुदायों में व्याप्त हुआ है और होता रहेगा। विश्व अनेक भाषाओं का व्यवहार स्थल है, किंतु विज्ञान के आविष्कारों ने इस विशाल विश्व को बहुत पास लाकर रख दिया है। आज विश्व में व्याप्त जीवन-दर्शन, सामाजिक व्यवस्थाएँ, धर्म-संस्कृति, भौतिक प्रगति के साधन, विज्ञान के आविष्कार आदि सब एक कोने से दूसरे कोने तक अल्प काल में पहुँच रहे हैं। ऐसे में उससे संबंधित ज्ञान और विज्ञान का बोध भी सामान्य तक पहुँचना आवश्यक है। ज्ञान का (विज्ञान का भी) किसी एक क्षेत्र में किसी एक भाषा के माध्यम से चाहे आविष्कार हो, पर-प्रसार या व्याप्ति सब को वैश्विक स्तर का होना है। प्रसार के ज़रिए ही उसका विकास संभव है। वह अनुवाद के माध्यम से ही विश्व के सुदूर कोनों तक पहुँच सकता है। इसीलिए आज का युग अनुवाद का युग कहा गया है। पर विस्तारित विचार-विनिमय की दृष्टि से और सामंजस्य की दृष्टि से आज अनेक जातियों और भाषाओं के बीच समरसता की आवश्यकता है। यह अनुवाद से ही सरल, संवेद्य और संप्राप्य है।
अनुवाद एक महत्वपूर्ण यज्ञ है। दो भाषाओं के बीच सोद्देश्य उभरकर समुन्नत लक्ष्य से आगे बढ़नेवाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया का अनुशीलन भी एक महत्वपूर्ण प्रयास है। इस दिशा में प्रस्तुत इकाई में अनुवाद का एक विश्लेषण है, जिसके अंतर्गत उसकी परिभाषा, उसके स्वरूप और क्षेत्र का अनुशीलन शामिल है।
1.2. विषय प्रवेश
मनुष्य द्वारा अपने भावों, विचारों, उद्देश्यों आदि को दूसरों तक संप्रेषित करने के लिए उपयोग में लाया जानेवाला साधन ‘भाषा’ है। ‘भाषा’ मानव मात्र के लिए प्राप्त विशिष्ट स्वरयंत्र द्वारा प्रसारित होने वाले सार्थक ध्वनि संकेतों की समष्टि है। इसका संबंध मात्र भावावेगों और क्रिया-कलापों से ही नहीं, जाति, संस्कृति, सभ्यता, धर्म, ज्ञान-विज्ञान आदि अनेक से जुड़ा रहता है। किसी विषय से संबंधित जानकारी के लिए भाषा का सहारा लेना आवश्यक है। कहने का सार है कि बिना भाषा के सहयोग के मानव जीवन का एक दिन भी बीतना असंभव है, किंतु भाषा का उद्भव और विकास मानव समूह और उस समूह के वास क्षेत्र की सीमाओं तक ही सीमित होता है। इसीलिए विश्व में अनेक भाषाओं की स्थिति है।
मानव का आरंभिक जीवन चाहे अपने क्षेत्र की परिधि में ही व्यतीत हुआ हो, पर आज वह अपने क्षेत्र तक सीमित होकर रह नहीं सकता। मानव की आवश्यकताएँ उसे दूसरे क्षेत्रों तक ले जाती रही हैं। आज मानव की अनेक क्षेत्रगत सीमाएँ बन गयी हैं- गाँव, प्रांत, राष्ट्र और विश्व। गाँव से प्रांत तक के विस्तार में मानव का संबंध एक भाषा से चाहे संभव हो, परंतु प्रांत, राष्ट्र और विश्व की सीमाओं में मानव एक भाषा से काम निकाल नहीं सकता। आज का विश्व एक गाँव बन गया है। ऐसी स्थिति में मानव अनेक भाषाओं को सीखकर अपना व्यवहार सिद्ध नहीं कर सकता। विश्व की अनेक भाषाओं में साध्य व्यवहार को अपनी भाषा से संपन्न करना। यह संभव नहीं है। इसका समाधान करनेवाली एक मात्र प्रक्रिया ‘अनुवाद’ है। विचार विनिमय की दृष्टि से और सामंजस्य स्थापना की दृष्टि से विश्व में एक भाषा से काम नहीं चलता। अनेक भाषाओं के बीच में से यह संपन्न होता है। यह भी सत्य है कि वैश्विक धरातल पर कुछ भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान द्रुत गति से विकसित हो रहा है। इसे स्वीकारने और अपने समूह को संपन्न बनाने का दायित्व हर मानव-समूह (प्रांत और राष्ट्र) पर है। भारत विश्व के देशों में भाषाओं की स्थिति को लेकर एक विशिष्ट स्थान रखता है। यह अनेक भाषाओं का राष्ट्र है। आज भारत के सामने अपनी जनता की नयी आवश्यकताओं को साधने की समस्या है। इस दिशा में ‘अनुवाद’ अपना महत्वपूर्ण कर्तव्य निभा सकता है और निभा रहा है।
आज की आवश्यकताओं एवं विज्ञान के नये आविष्कारों के कारण जिस ज्ञान तक सामान्य को भी ले जाने की जरूरत है, तदर्थ ‘अनुवाद’ का सहारा लेना अनिवार्य है। इसीलिए आज हर नागरिक का, जो एक से अधिक भाषाएँ जानता है, कर्तव्य है कि वह अनुवाद प्रक्रिया से अच्छी तरह से अवगत हो और अनुवाद की क्षमता प्राप्त करें।
1.3. अनुवाद : शाब्दिक अर्थ
संस्कृत में कहा गया है कि ‘प्राप्तस्य पुनः कथनम्’ अर्थात् पहले कहे गये अर्थ को स्पष्ट करने हेतु फिर कहना अनुवाद है।
‘अनुवाद’ शब्द का संबंध ‘वद्’ धातु से है। ‘वद्’ धातु का अर्थ है ‘बोलना’ या ‘कहना’। ‘वद्’ धातु में ‘धञ’ प्रत्यय योग से ‘वाद’ शब्द निष्पन्न हुआ है। ‘वाद’ शब्द के पूर्व ‘अनु’ उपसर्ग के जुड़ने से ‘अनुवाद’ शब्द निष्पन्न होता है। ‘अनु’ उपसर्ग अनुवर्तिता आदि अर्थों में प्रयुक्त है। ‘अनु’ उपसर्ग शब्दों के साथ लगाकर पीछे, समान, साथ, बारंबार, प्रत्येक, योग्य आदि अर्थों का द्योतक करता है। ‘वाद’ शब्द के साथ समान, योग्य, बारंबार आदि अर्थ जुड़कर अनुवाद के शाब्दिक अर्थ को पुष्ट करते हैं। भाषा के संदर्भ में ‘अनुवाद’ का अर्थ- ‘पुनः कथन’ या ‘किसी के कहने के बाद कहना’ बनता है।
प्राचीनकाल में प्रायः सभी देशों में गुरु और शिष्य के बीच ‘पुनः पुनः कथन’ की प्रक्रिया चलती थी। गुरु कहता था और शिष्य उसको दुहराता था। इस दुहराने की प्रक्रिया को ‘अनुवाद’ कहते थे। इसके साथ-साथ अनुवचन, अनुवाक आदि शब्दों का प्रयोग भी मिलता है।
‘अनुवाद’ शब्द आजकल अंग्रेज़ी शब्द Translation (ट्रान्सलेशन) के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होता है। यह शब्द लैटिन के Trans (ट्रान्स) और Lation (लेशन) के योग से बना है। ‘ट्रान्स’ का अर्थ है ‘पार’ तथा ‘लेशन’ का अर्थ है ‘ले जाने की क्रिया’। इस तरह एक पार से दूसरे पार तक ले जाने की प्रक्रिया ही ‘ट्रान्सलेशन’ की प्रक्रिया है। भाषा के संदर्भ में एक भाषा में व्यक्त भाव और विचार को दूसरी भाषा में ले जाना ही ‘ट्रान्सलेशन’ है। यहाँ अर्थ प्रधान होता है। यही संबंध अनुवाद या ‘ट्रान्सलेशन’ में प्रमुख है।
1.4. 'अनुवाद' की परिभाषा : भारतीय दृष्टि
‘अनुवाद’ की विशिष्ट संकल्पना भारत में प्राचीन काल से थी। वैदिक ज्ञान की प्राप्ति तथा जीवन दर्शन के अनुपालन की समझ के साथ यह संकल्पना जुड़ी है। वैदिक युग में ब्राह्मण ग्रंथों के साथ यह प्रक्रिया उभरी है। भारतीय अवधारणा में, ख़ासकर प्राचीनकाल में, अनुवाद पुनः कथन है। अर्थात् किसी कथन को सुनना, समझना और फिर कहना। ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है-
"यद वाचि प्रोदितायाम अनुब्रूयाद् अन्यस्यैवैन म उदितानुवादिनम कुर्यात्"
जो कहा गया है उसका अनुसरण करते हुए कहना अनुवाद है।
बृहदारण्यक में अनुवाद को ‘वाग अनुवदति’ कहा गया है। इसका अर्थ है, पूर्व वाक् को पुनः दुहराना। समय के बीतते-बीतते अनुवाद का संबंध ज्ञात को दुहराने की प्रक्रिया से जुड़ गया। ‘पाणिनि’ के ‘अष्ठाध्यायी’ में- ‘अनुवादे चरणाम्’ (2-4-3) कहा गया है। इस सूत्र की व्याख्या करते हुए वासुदेव दीक्षित ने- ‘अवगतार्थस्य प्रतिपादने इत्यर्थः’ कहा है। इस अनुवाद के अर्थ में (परिभाषा मैं) मात्र पुनः कथन ही नहीं अवगत अर्थ का भी उल्लेख है। इस प्रकार भारतीय अवधारणा में अनुवाद ज्ञात अर्थ के साथ अच्छी तरह समझने की स्थिति का बोध भी है। इस संदर्भ में संस्कृत की एक और व्याख्या को यहाँ उद्धृत करना समीचीन होगा-
‘प्रमाणान्तरावगतस्यार्थस्य शब्देन संकीर्तनमात्रमनुवादः’
कहने का तात्पर्य है कि जो बात कही गयी है, उसके अंतर्गत निक्षिप्त अर्थ को शब्दों में सुंदर रूप से व्यक्त करना अनुवाद है।
न्याय सूत्र में अनुवाद के बारे में यह कहा गया है
‘विधिविहित स्य्यानुवचमनुवादः’
इसके अनुसार विधि एवं विहितता अनुवाद के सूत्र बनते हैं। केवल पुनरुक्ति अनुवाद नहीं है। पुनः कथन में शब्द को सार्थक एवं उपयुक्त बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है।
उक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि भारतीय मेधा ने अनुवाद की प्रक्रिया को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया है। इस प्रक्रिया में अनुवचन, अनु कथन, पुनः कथन, ज्ञात का कथन, विधि-विहित कथन, कथन की आवृत्ति, सार्थक पुनरुक्ति आदि अनेक विशेषताएँ निहित हैं।
भारतीय भाषा-साहित्य में अनुवाद की एक अक्षुण्ण एवं अविरल परंपरा मिलती है। हर अनुवादक ने अपने सामने एक स्पष्ट अवधारणा बनाकर अनुवाद की प्रक्रिया से अपने को जोड़ा है। यहाँ इसकी परंपरा का उल्लेख न कर, तेलुगु के आदि कवि नन्नया की एक अनुवाद संबंधी अवधारणा से जुड़ें, तो हमारे सामने भारतीय परिभाषा स्पष्ट उभरती है। नन्नया ने संस्कृत महाभारत के तेलुगु में अनुवाद का बृहत्तर कार्य भार अपने भुज स्कंधों पर लिया था। नन्नया के आश्रयदाता राजा राजराज नरेंद्र ने उनसे प्रार्थना की थी-
जननुत कृष्ण द्वैपा-
यन मुनि वृषाभाभिहित महाभारत ब
द्धनिरूपितार्थ मेर्पड़
देनुगुन रचियिंयु मधिम धी युक्ति मेयिन। (आदि पर्व 1/16)
(हे नन्नया जी! लोगों से प्रशंसित कृष्ण द्वैपायन (व्यास जी) मुनि के द्वारा रचित महाभारत को उसमें निबद्ध एवं उसके द्वारा निरूपित अर्थ को बिना किसी प्रकार कम किये, तेलुगु में अनुवाद कीजिए। इस अनुवाद में धी (बुद्धि) और युक्ति (सोच और प्रक्रिया) का सुंदर मेल होना चाहिए।)
राजा के मुँह से ये शब्द नन्नया के ही थे। इस कथन से यह विदित होता है कि अनुवाद निबद्ध और निरूपित अर्थ को स्पष्ट करते हुए बुद्धि और युक्ति से संपन्न करने की प्रक्रिया है। नन्नया को आश्रयदाता राजा राजराज नरेंद्र से मिली प्रार्थना में अनुवाद के चार तत्व मिलते हैं-
1) व्यास कृत महाभारत का अनुवाद करना (लक्ष्य भाषा की कृति)
2) मूल रचना में निरूपित अर्थ की रक्षा करना- कथ्यार्थ और शब्दार्थ दोनों की लक्ष्य भाषा में रक्षा लक्ष्य भाषा में करना।
(Preservation of the meaning with reference to the source text)
3) धी (बुद्धि और ज्ञान) तथा युक्ति (योजना) का उपयोग करना।
(Intelligence, knowledge and plan)
4) काव्य रूप की प्रतिष्ठा रखना (The Prestige of the form to be maintained)
इन बातों को ध्यान में रखकर देखा जाए तो अनुवाद की परिभाषा बनती है- "अनुवाद मूल पाठ को किसी लक्ष्य-भाषा में प्रतिष्ठित करने की एक ऐसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें स्रोत पाठ में लेखक द्वारा पूर्व स्थापित अर्थ को अपनी धी शक्ति तथा मौलिक योजना के आधार पर पुनः स्थापित करना होता है और मूल रूप को भी सुरक्षित रखा जाता है।"
1.5. अनुवाद की परिभाषा: आधुनिक युग एवं पाश्चात्य चिंतन
आधुनिक युग अनुवाद का युग है। अनुवाद को अपरिहार्य माना जाता है। मानव के बहुमुखी विकास में अनुवाद का महत्वपूर्ण योगदान है। भाषाविज्ञान ने भाषा के अनुशीलन को और विस्तृत किया है। व्याकरण की सीमाओं को लाँघकर भाषा को समझने की दिशाएँ खुल गयी हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में अनुवाद प्रक्रिया को अनेक दृष्टियों से पाश्चात्य विद्वानों ने परिभाषित किया है। कुछ विशिष्ट परिभाषाएँ यहाँ प्रस्तुत हैं-
1) "Translation is a rendering from one language or representational system into another. Translation is an art that involves the recreate ion of a work in another language for readers with a different background."
(Webster’s third International Dictionary, Ed. P.B. Gove)
अर्थात् ‘अनुवाद एक भाषा से दूसरी भाषा में प्रस्तुत करने या प्रतिरूपित करने की व्यवस्था है। यह एक भाषा से दूसरी भाषा में भिन्न पृष्ठभूमि वाले पाठकों के लिए पुनः सृजन की प्रक्रिया से गुज़रनेवाली कला है।’
2) "To interpret in another language; to change into another language, retaining the sense"
(A Dictionary of language, Samuel Johnson)
अर्थात् ‘एक भाषा से दूसरी भाषा में प्रतिपादित करना; एक और भाषा में बिना संवेदन को ठेस लगाये प्रस्तुत करना’ (अनुवाद कहलाता है)।
3) "The art of rendering the writings of one language into another language. The art of translation lies not only in conveying the literal sense from one language into another, but also in translating the feeling, thought and character of the work so that the finished translation is equal in quality to the original."
(Everyman's encyclopedia)
अर्थात् एक भाषा कथ्य को दूसरी भाषा में प्रतिरूपित करने की कला को अनुवाद कहा जाता है। अनुवाद- कला भाव को शब्दश: अर्थ को संप्रेषित करने में ही निहित नहीं, बल्कि भावनाओं, विचारों और कृति की विशेषता को अनुवचित करने में निहित रहती है। तत्परिणाम स्वरूप संपन्न कार्य रूप और गुण में मूल की अनुकृति होती है।
4) "Translation consists in producing in receptor language the closest natural equivalent to the message of the source language, first in meaning and secondly in style."
(Towards science of translation, Nida E.A)
अनुवाद स्रोत भाषा के संदेश को समीपवर्ती सहज समानार्थी रूप में प्रथमतः अर्थ में तथा द्वितीयतः शैली में प्रतिरूपित करने की प्रक्रिया है।
5) "Translation is an operation performed on languages; a process of substituting a text on language for a text in another language."
(A linguistic theory of translation, Cat ford, J.(C.)
अनुवाद भाषाओं पर निष्पादित एक संक्रिया है। इस में एक भाषा पाठ के स्थान पर दूसरी भाषा के पाठ के रूप मे प्रतिस्थापित किया जाता है।
6) "Translation is the replacement of textual material in an language by equivalent textual material in another language."
अनुवाद एक भाषा की पाठ्य सामग्री को दूसरी भाषा की समतुल्य पाठ्य सामग्री में प्रतिस्थापन प्रक्रिया है।
उक्त परिभाषाओं के अवलोकन से इतना तो स्पष्ट है कि अनुवाद दो भाषाओं के बीच निष्पन्न होने वाला एक प्रक्रम (Process) है। इसमें एक भाषा का पाठ दूसरी भाषा पाठ में कला-कौशल के साथ अर्थ और शैली को ठेस पहुँचाये बिना प्रतिस्थापन की प्रक्रिया चलती है। इसमें स्रोत भाषा (Source language) के पाठ से संबंधित भाषिक व्यवस्थाओं का अंतरण लक्ष्य भाषा (Target language) की व्यवस्थाओं में संपन्न किया जाता है।
1.6. भाषिक व्यवस्थाएँ और अनुवाद
अनुवाद को भाषिक व्यवस्थाओं में चलने वाली प्रक्रिया के रूप में समझा गया है। भाषा मानव द्वारा निर्मित संप्रेषण के लिए सुगम व्यवस्था है। भाषा की संरचना से संबंधित प्रमुख व्यवस्थाएँ हैं- (1) ध्वनि व्यवस्था (2) रूप् व्यवस्था (3) अर्थ व्यवस्था (4) वाक्य व्यवस्था तथा (5) लिपि (लेखिम) व्यवस्था। इन सभी उप व्यवस्थाओं की एक समग्र व्यवस्था भाषा की व्यवस्था है। इनके प्रभावों को पहचान कर समान व्यवस्थाओं में अवतरित करने की प्रक्रिया ही अनुवाद की प्रक्रिया है। भाषा को प्रभावित क्रने वाले कुछ अन्य तत्व भी हैं। इन्हें भाषेतर तत्व कह सकते हैं। ये सारे तत्व भाषा-भाषी समूह या समाज की व्यवस्थाओं से उपजीव्य हैं। इनमें प्रधान हैं (1) संस्कृति और सांस्कृतिक उपादान, (2) भौतिक उन्नति और उसके प्रतीक (सभ्यता के प्रतीक), (3) धर्म की व्यवस्था, (4) भौगोलिक पर्यावरण और (5) सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्थाएँ। ये एक ओर से सामाजिक रूप से नियामक हैं तो दूसरी ओर भाषिक अभिव्यक्ति यों को आनुशासित करने वाले भी हैं। इनके प्रभाव के बिना किसी भाषा में सामान्य या विशिष्ट अभिव्यत्तियों को सोच ही नहीं सकते। इनकी सम्यक अवधारणा और अवतरण की योजना अनुवाद के लिए आवश्यक है ।
1.7. अनुवाद का स्वरूप
अनुवाद के स्वरूप को समझने की दिशा में अनुवाद से संबद्ध कुछ अन्य अवधारणाओं को भी समझना जरूरी है। अनुवाद (Translation) के अतिरिक्त इस प्रक्रिया के साथ निम्न शब्द भी प्रचलित हैं-
1) लिप्यंतरण (Transliteration)
2) अनुसृजन (Trans creation)
3) अनुलिपिकरण (Transcription)
4) रूपांतरण (Transformation)
5) अभिग्रहण (Adoption)
'लिप्यंतरण' में मात्र लिपि का परिवर्तन होता है। एक भाषा लिपि में प्रस्तुत पाठ दूसरी भाषा की लिपि में ज्यों का त्यों प्रस्तुत होता है। इसमें भाषा का परिवर्तन नहीं होता।
'अनु सृजन' नितांत मौलिक प्रक्रिया है। एक भाषा पाठ को दूसरी भाषा में पुनः सृजित किया जाता है। इस सृजन की प्रक्रिया में अनुवादक स्वतंत्र होता है। सही अनुवाद प्रक्रिया में मूल का अनुसरण उसकी समस्त व्यवस्थाओं के साथ होता है। किंतु अनुसृजन में भाव, कल्पना, विचारों आदि में आवश्यक परिवर्तनों की गुंजाइश रहती है। सामान्य रूप से काव्य ग्रंथों के अनुवाद में यह प्रक्रिया अधिक देखी- पहचानी जा सकती है।
'अनुलिपिकरण' यह मात्र प्रतिलिपि की प्रक्रिया है। इसे प्रतिलेखन भी कहा जा सकता है। इसके समान अर्थ में Duplicating or copy writing शब्दों को लिया जा सकता है।
'रूपांतरण' मूल कृति के एक रूप (Form) से दूसरे रूप में अंतरित करना है। काव्य से नाटक में, नाटक से उपन्यास में रूपांतरण इसी प्रकार के अंतर्गत है। यह रूपांतरण प्रक्रिया एक पाठ से दूसरे पाठ में भी संभव है। अर्थात् एक भाषा में प्राप्त उपन्यास को दूसरी भाषा में नाटक के रूप में भी सृजित किया जा सकता है।
'अभिग्रहण' प्रक्रिया मूल पाठ की सामग्री, भाव, विचार आदि को अपनी रुचि के अनुसार (अनुवादक की रुचि के अनुसार) ग्रहण करके पुनर्निर्मित करना अभिग्रहण प्रक्रिया में होता है।
उक्त सभी प्रक्रियाओं में अनुवाद (ट्रान्सलेशन) सर्वोपरि है। अनुवाद की बहु आयामिता का विश्लेषण करते हुए प्रो. उमाशंकर उपाध्याय ने कहा है- "मूल पाठ चाहे साहित्यिक हो अथवा साहित्येतर, 'संदेश' की स्थिति अनिवार्यतः महत्वपूर्ण होती है और संदेश के अंतरण का अनुपात ही यह निर्धारित करता है कि अनूदित पाठ कितना उपयुक्त और स्तरीय है।" (अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य - उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, द. भा. हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद)। इस वक्तव्य से यह विदित है कि 'संदेश' की प्रमुखता और उपयोगिता अनुवाद को महत्व प्रदान करती हैं। अनुवाद में इसके साथ-साथ चयन, कथ्य और अर्थ का संयोजन उसके स्वरूप को निष्पन्न करने वाला होता है। अनुवाद को महत्व प्रदान करने वाले अंशों में भाषा की संरचना, शैली, भावात्मकता, सांस्कृतिक पक्ष, वैचारिक दृष्टिकोण आदि उभरते हैं। इनका सम्यक् निर्वहण अनुवाद के स्वरूप को आकर्षक एवं स्थायी बनाता है।
1.8. अनुवाद के क्षेत्र
अनुवाद का क्षेत्र विस्तृत और बहुआयामी है। सामान्यतः अनुवाद के क्षेत्रों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है- (1) साहित्यिक और (2) साहित्येतर। साहित्य का संबंध प्रधानतः भावात्मक एवं सांस्कृतिक पक्षों से होता है। सांस्कृतिक पक्ष जीवन के समस्त व्यापारों में मानव द्वारा स्वीकृत एवं अनुसरित दार्शनिक, धार्मिक, सभ्यता संबंधी तत्वों से जुड़ते हैं। साहित्य का विकास भी अनेक विधाओं में चला है। इन सभी विधाओं में अनुवाद प्रक्रिया सहज रूप से सभी भाषाओं में चलती है और चल भी रही है।
साहित्येतर क्षेत्रों में अनुवाद का आज महत्व बढ़ रहा है। अपरिहार्य रूप से उसका संबंध अनेक क्षेत्रों से जुड़ गया है। सूचना क्रांति (Information Revolution) के इस युग में सूचना तकनीकी (Information Technoloty) के साथ अनुवाद का लक्ष्य बहु संदर्भीय और बहुजन संवेद्य हो रहा है। अनुवाद से संपन्न होने वाले प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं -
1) विज्ञान, 2) तकनीकी, 3) मनोरंजन, 4) प्रशासन, 5) कृषि, 6) व्यवसाय और व्यापार, 7) शिक्षण और प्रशिक्षण, 8) विज्ञापन और 9) समाचार-वितरण।
उक्त क्षेत्रों के अंतर-विभागों से यह सूची और बढ़ सकती है। इन सब क्षेत्रों में विश्व व्याप्त ज्ञान, सामग्री, तकनीकी, विज्ञान आदि की प्राप्ति का एक मात्र साधन 'अनुवाद' ही है। विश्वसनीय और व्यवस्थित अभिव्यक्तियों के लिए अनुवाद प्रक्रिया का सटीक अध्ययन और उसका अभ्यास आज की आवश्यकता ही नहीं, अनिवार्यता भी है।
1.9. सारांशतः
अनुवाद एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। विश्व में सभ्यता का विस्तार अनुवादों के कारण बहुत सीमा तक हो पाया है। विशाल विश्व को पास लाने का श्रेय भी एक सीमा में अनुवाद को ही मिलता है। अनुवाद के जरिए ज्ञान-विज्ञान का बोध और साहित्य का विस्तार संभव हुआ है और हो रहा है। आज का युग एक ओर विज्ञान का युग है तो दूसरी ओर अनुवाद का युग भी है। आज की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति में अनुवाद अपना योगदान दे रहा है।
अनुवाद की संकल्पना और अवधारणा विश्वव्यापी है। अनुकथन, पुनः कथन की संकल्पना से आरंभ होकर अनुसृजन की प्रक्रिया तक इसकी एक यात्रा भारत में और विश्व में चली है। आज के युग में अनुवाद की प्रक्रिया में भाषिक तत्वों और भाषेतर तत्वों का अन्वेषण हुआ है। उनके सम्यक समावेश से ही अनुवाद को महत्व प्रदान करने के प्रयत्न हुए हैं। अनेक दृष्टियों से अनुवाद प्रक्रिया का अनुशीलन करके उसे परिभाषित करने के सफल प्रयास भी हुए हैं। तत्परिणामस्वरूप स्रोत भाषा तथा लक्ष्य भाषा की संकल्पनाएँ एवं विषय और क्षेत्र के अनुरूप उभरनेवाले भेदों को रेखांकित भी किया गया है। अनेक व्यवस्थाओं और उपव्यवस्थाओं को सम्यक रूप से समायोजित करने की प्रक्रिया का सैद्धांतिक निरूपण भी अनुवाद कार्य को संपन्न बनाने की दिशा में हुआ है।
आधुनिक आवश्यकताओं के अनुसार अनेक क्षेत्रों से अनुवाद को जोड़ा जा रहा है और उसके महत्व को रेखांकित किया जा रहा है। अनुवाद का क्षेत्र विस्तृत और बहुआयामी है।
अनुवाद प्रक्रिया का वैज्ञानिक विश्लेषण, अनुशीलन, शिक्षण-प्रशिक्षण आदि का महत्व आज समझा जा रहा है। इसीलिए यह आवश्यक है कि आज दो भाषाओं को जाननेवाला हर व्यक्ति ‘अनुवाद’ प्रक्रिया का समग्र बोध प्राप्त करें।