1. अनुवाद : अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और क्षेत्र

1.4. 'अनुवाद' की परिभाषा : भारतीय दृष्टि

‘अनुवाद’ की विशिष्ट संकल्पना भारत में प्राचीन काल से थी। वैदिक ज्ञान की प्राप्ति तथा जीवन दर्शन के अनुपालन की समझ के साथ यह संकल्पना जुड़ी है। वैदिक युग में ब्राह्मण ग्रंथों के साथ यह प्रक्रिया उभरी है। भारतीय अवधारणा में, ख़ासकर प्राचीनकाल में, अनुवाद पुनः कथन है। अर्थात् किसी कथन को सुनना, समझना और फिर कहना। ऐतरेय ब्राह्मण में कहा गया है-

"यद वाचि प्रोदितायाम अनुब्रूयाद् अन्यस्यैवैन म उदितानुवादिनम कुर्यात्"

जो कहा गया है उसका अनुसरण करते हुए कहना अनुवाद है।

बृहदारण्यक में अनुवाद को ‘वाग अनुवदति’ कहा गया है। इसका अर्थ है, पूर्व वाक् को पुनः दुहराना। समय के बीतते-बीतते अनुवाद का संबंध ज्ञात को दुहराने की प्रक्रिया से जुड़ गया। ‘पाणिनि’ के ‘अष्ठाध्यायी’ में- ‘अनुवादे चरणाम्’ (2-4-3) कहा गया है। इस सूत्र की व्याख्या करते हुए वासुदेव दीक्षित ने- ‘अवगतार्थस्य प्रतिपादने इत्यर्थः’ कहा है। इस अनुवाद के अर्थ में (परिभाषा मैं) मात्र पुनः कथन ही नहीं अवगत अर्थ का भी उल्लेख है। इस प्रकार भारतीय अवधारणा में अनुवाद ज्ञात अर्थ के साथ अच्छी तरह समझने की स्थिति का बोध भी है। इस संदर्भ में संस्कृत की एक और व्याख्या को यहाँ उद्धृत करना समीचीन होगा-

‘प्रमाणान्तरावगतस्यार्थस्य शब्देन संकीर्तनमात्रमनुवादः’

कहने का तात्पर्य है कि जो बात कही गयी है, उसके अंतर्गत निक्षिप्त अर्थ को शब्दों में सुंदर रूप से व्यक्त करना अनुवाद है।

न्याय सूत्र में अनुवाद के बारे में यह कहा गया है

‘विधिविहित स्य्यानुवचमनुवादः’

इसके अनुसार विधि एवं विहितता अनुवाद के सूत्र बनते हैं। केवल पुनरुक्ति अनुवाद नहीं है। पुनः कथन में शब्द को सार्थक एवं उपयुक्त बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया गया है।

उक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि भारतीय मेधा ने अनुवाद की प्रक्रिया को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया है। इस प्रक्रिया में अनुवचन, अनु कथन, पुनः कथन, ज्ञात का कथन, विधि-विहित कथन, कथन की आवृत्ति, सार्थक पुनरुक्ति आदि अनेक विशेषताएँ निहित हैं।

भारतीय भाषा-साहित्य में अनुवाद की एक अक्षुण्ण एवं अविरल परंपरा मिलती है। हर अनुवादक ने अपने सामने एक स्पष्ट अवधारणा बनाकर अनुवाद की प्रक्रिया से अपने को जोड़ा है। यहाँ इसकी परंपरा का उल्लेख न कर, तेलुगु के आदि कवि नन्नया की एक अनुवाद संबंधी अवधारणा से जुड़ें, तो हमारे सामने भारतीय परिभाषा स्पष्ट उभरती है। नन्नया ने संस्कृत महाभारत के तेलुगु में अनुवाद का बृहत्तर कार्य भार अपने         भुज स्कंधों पर लिया था। नन्नया के आश्रयदाता राजा राजराज नरेंद्र ने उनसे प्रार्थना की थी-

जननुत कृष्ण द्वैपा-

यन मुनि वृषाभाभिहित महाभारत ब

द्धनिरूपितार्थ मेर्पड़

        देनुगुन रचियिंयु मधिम धी युक्ति मेयिन।               (आदि पर्व 1/16)

(हे नन्नया जी! लोगों से प्रशंसित कृष्ण द्वैपायन (व्यास जी) मुनि के द्वारा रचित महाभारत को उसमें निबद्ध एवं उसके द्वारा निरूपित अर्थ को बिना किसी प्रकार कम किये, तेलुगु में अनुवाद कीजिए। इस अनुवाद में धी (बुद्धि) और युक्ति (सोच और प्रक्रिया) का सुंदर मेल होना चाहिए।)

राजा के मुँह से ये शब्द नन्नया के ही थे। इस कथन से यह विदित होता है कि अनुवाद निबद्ध और निरूपित अर्थ को स्पष्ट करते हुए बुद्धि और युक्ति से संपन्न करने की प्रक्रिया है। नन्नया को आश्रयदाता राजा राजराज नरेंद्र से मिली प्रार्थना में अनुवाद के चार तत्व मिलते हैं-

1)     व्यास कृत महाभारत का अनुवाद करना (लक्ष्य भाषा की कृति)

2)     मूल रचना में निरूपित अर्थ की रक्षा करना- कथ्यार्थ और शब्दार्थ दोनों की लक्ष्य भाषा में रक्षा लक्ष्य भाषा में करना।

           (Preservation of the meaning with reference to the source text)

3)     धी (बुद्धि और ज्ञान) तथा युक्ति (योजना) का उपयोग करना।

           (Intelligence, knowledge and plan)

4)     काव्य रूप की प्रतिष्ठा रखना (The Prestige of the form to be maintained)

इन बातों को ध्यान में रखकर देखा जाए तो अनुवाद की परिभाषा बनती है- "अनुवाद मूल पाठ को किसी लक्ष्य-भाषा में प्रतिष्ठित करने की एक ऐसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें स्रोत पाठ में लेखक द्वारा पूर्व स्थापित अर्थ को अपनी धी शक्ति तथा मौलिक योजना के आधार पर पुनः स्थापित करना होता है और मूल रूप को भी सुरक्षित रखा जाता है।"