इस इकाई में अनुवाद की मूलभूत अवधारणाओं का परिचय कराया जाता है। इसमें अनुवाद के अर्थ और विभिन्न परिभाषाओं के माध्यम से उसकी सैद्धांतिक आधारभूमि को स्पष्ट किया गया है। साथ ही, अनुवाद के स्वरूप और उसके व्यापक क्षेत्र पर प्रकाश डालते हुए यह समझाया गया है कि अनुवाद केवल भाषाई रूपांतरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक सेतु का कार्य करता है। यह इकाई आगे के अध्ययन के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार करती है।
1. अनुवाद : अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और क्षेत्र
1.3. अनुवाद : शाब्दिक अर्थ
संस्कृत में कहा गया है कि ‘प्राप्तस्य पुनः कथनम्’ अर्थात् पहले कहे गये अर्थ को स्पष्ट करने हेतु फिर कहना अनुवाद है।
‘अनुवाद’ शब्द का संबंध ‘वद्’ धातु से है। ‘वद्’ धातु का अर्थ है ‘बोलना’ या ‘कहना’। ‘वद्’ धातु में ‘धञ’ प्रत्यय योग से ‘वाद’ शब्द निष्पन्न हुआ है। ‘वाद’ शब्द के पूर्व ‘अनु’ उपसर्ग के जुड़ने से ‘अनुवाद’ शब्द निष्पन्न होता है। ‘अनु’ उपसर्ग अनुवर्तिता आदि अर्थों में प्रयुक्त है। ‘अनु’ उपसर्ग शब्दों के साथ लगाकर पीछे, समान, साथ, बारंबार, प्रत्येक, योग्य आदि अर्थों का द्योतक करता है। ‘वाद’ शब्द के साथ समान, योग्य, बारंबार आदि अर्थ जुड़कर अनुवाद के शाब्दिक अर्थ को पुष्ट करते हैं। भाषा के संदर्भ में ‘अनुवाद’ का अर्थ- ‘पुनः कथन’ या ‘किसी के कहने के बाद कहना’ बनता है।
प्राचीनकाल में प्रायः सभी देशों में गुरु और शिष्य के बीच ‘पुनः पुनः कथन’ की प्रक्रिया चलती थी। गुरु कहता था और शिष्य उसको दुहराता था। इस दुहराने की प्रक्रिया को ‘अनुवाद’ कहते थे। इसके साथ-साथ अनुवचन, अनुवाक आदि शब्दों का प्रयोग भी मिलता है।
‘अनुवाद’ शब्द आजकल अंग्रेज़ी शब्द Translation (ट्रान्सलेशन) के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होता है। यह शब्द लैटिन के Trans (ट्रान्स) और Lation (लेशन) के योग से बना है। ‘ट्रान्स’ का अर्थ है ‘पार’ तथा ‘लेशन’ का अर्थ है ‘ले जाने की क्रिया’। इस तरह एक पार से दूसरे पार तक ले जाने की प्रक्रिया ही ‘ट्रान्सलेशन’ की प्रक्रिया है। भाषा के संदर्भ में एक भाषा में व्यक्त भाव और विचार को दूसरी भाषा में ले जाना ही ‘ट्रान्सलेशन’ है। यहाँ अर्थ प्रधान होता है। यही संबंध अनुवाद या ‘ट्रान्सलेशन’ में प्रमुख है।