1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि

1.18. सारांशतः

मानवीय व्यवहार भाषा संप्रेषण से चालित है। जब दो व्यक्तियों या समूहों के बीच भाषा संप्रेषण प्रक्रिया में बाधा उपस्थित होती है तो तीसरा व्यक्ति बीच में उपस्थित होता है। वह दोनों की भाषाओं का जानकार होता है। उसके द्वारा संपन्न होनेवाली व्यावहारिक भाषिक प्रक्रिया अनुवाद है। इससे उक्त दोनों के बीच का व्यवहार संपन्न होता है। यह अनुवाद प्रक्रिया दो रूपों में चलती है, मौखिक और लिखित। इसके अल्पकालिक और दीर्घकालिक दो पक्ष हैं। दीर्घकाल तक उपयोग में रहने वाला अनुवाद शाश्वत या विश्वजनीन ज्ञान-विज्ञान संबंधी या विचारों से संबंधित होता है। इसके संदर्भ में अनुवाद की प्रक्रिया को समझने के प्रयास हुए हैं और होते आ रहे हैं। सबका लक्ष्य अनुवाद को सुसंपन्न बनाना ही है।

अनुवाद-प्रक्रिया से संबंधित अनुचिंतन साहित्य शास्त्रियों और भाषा-वैज्ञानिकों ने ही नहीं अन्य शास्त्रकारों ने भी किया है। यह प्रक्रिया अनुप्रयुक्त भाषिक प्रक्रिया है। इसमें प्रतिस्थापन एवं अंतरण की प्रक्रियाएँ चलती हैं। इसमें भाषिक एवं भाषेतर तत्वों का समग्र समायोजन होता है, यह प्रक्रिया चार सोपानों पर चलती है- पाठ चयन, पाठ विश्लेषण, अंतरण और पुनर्गठन। सही वस्तु या पाठ चयन से लेकर पुनर्गठन या पुनर्निर्माण (पुनः सृजन) की प्रक्रिया तक की यात्रा इस प्रक्रिया से संबंधित है। चाहे भाषिक अंतरण की प्रक्रिया ही क्यों न हो, अनुवाद की संपन्नता से संबंधित प्रविधि अनुवादक के दृष्टिकोण के अनुसार लक्ष्य स्वरूप पर आधारित होकर चलती है। इसकी प्रकृति के आधार पर मूलनिष्ठ, मूल मुक्त, शब्दानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद आदि भेदों में परिणत होकर उभरती है।