इकाई 2: अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
| Site: | Dr. B.R. Ambedkar Open University Online Learning Portal |
| Course: | अनिवाद सिद्धांत और व्यवहार |
| Book: | इकाई 2: अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि |
| Printed by: | అతిథి వాడుకరి |
| Date: | Wednesday, 15 April 2026, 1:43 AM |
Description
इस इकाई में अनुवाद की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों - पाठ के विश्लेषण, अर्थांतरण और पुनर्गठन का क्रमबद्ध अध्ययन कराया जाता है। इसमें अनुवाद की प्रमुख प्राविधियों एवं तकनीकों को स्पष्ट करते हुए उनके व्यवहारिक उपयोग पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, प्रभावी और सटीक अनुवाद के लिए आवश्यक सिद्धांतों एवं कौशलों को समझाया गया है। यह इकाई विद्यार्थियों को अनुवाद के व्यावहारिक पक्ष से परिचित कराते हुए उनकी अनुप्रयोगात्मक क्षमता का विकास करती है।
Table of contents
- 1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
- 1.1. प्रस्तावना
- 1.2. विषय प्रवेश
- 1.3. अनुवाद प्रक्रिया : अनुचिंतन
- 1.4. पाठ चयन
- 1.5. पाठ विश्लेषण
- 1.6. अंतरण-प्रक्रिया
- 1.7. पुनर्गठन
- 1.8. प्रविधि
- 1.9. क) मूलनिष्ठ अनुवाद
- 1.10. ख) मूलमुक्त अनुवाद
- 1.11. ग) शब्दानुवाद
- 1.12. घ) भावानुवाद
- 1.13. ड.) छायानुवाद
- 1.14. च) सारानुवाद
- 1.15. छ) व्याख्यानुवाद
- 1.16. ज) वार्तानुवाद अथवा आशु अनुवाद
- 1.17. झ) रूपान्तरण
- 1.18. सारांशतः
1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
इस पाठ के अध्ययन से आप
- अनुवाद प्रक्रिया में भाषा व्यवहार की प्रकृति को पहचानेंगे।
- लिखित और मौखिक (आशु) अनुवाद के अंतर को समझेंगे।
- अनुवाद प्रक्रिया के लक्ष्य को रेखांकित कर पायेंगे।
- अनुवाद प्रक्रिया के विभिन्न चरणों का एक विहंगम अवलोकन कर सकेंगे।
- अनुवाद प्रक्रिया से संबंधित सूत्रों का ज्ञान पायेंगे।
- अनुवाद की प्रकृति और प्रविधि की जानकारी की आवश्यकता को पहचानेंगे।
- अनुवाद प्रकृति से संबंधित विभिन्न आयाम की जानकारी प्राप्त करेंगे।
- अनुवाद प्रक्रिया से जुड़े पारिभाषिक शब्दों का अर्थ समझ पायेंगे, ताकि अनुवाद प्रक्रिया की अच्छी समझ हो जाए।
1.1. प्रस्तावना
अनुवाद की परंपरा अत्यंत प्राचीनकाल से चली आ रही है। उससे संबंधित अनेक परिकल्पनाएँ एवं संकल्पनाएँ भी मिलती हैं। इसके पूर्व अनुवाद की परिभाषा पर विचार किया गया। अब अनुवाद प्रक्रिया पर कुछ विचार कर लेना समीचीन होगा। आधुनिक युग में अनुवाद का संबंध मात्र धर्म और साहित्य से ही नहीं रहा, बल्कि अनेक साहित्येतर क्षेत्रों से जुड़ा है। अतः उसकी प्रक्रिया और प्रविधि से संबंधित अवधारणाएँ भी बनती जा रही हैं। हर क्षेत्र विशेष में अनुवाद प्रक्रिया का स्वरूप कुछ बदलता दिखाई देता है। किंतु सम्यक् रूप से समग्र सोच में अंतर नहीं है। प्रस्तुत पाठ में अनुवाद-प्रक्रिया का एक विहंगम अवलोकन किया गया है। साथ-साथ उसके विभिन्न रूपों को भी स्पर्श किया गया है, ताकि प्रविधि संबंधी बोध भी यथा संभव हो जाए। प्रस्तुत पाठ अनुवादक की भूमिका निभानेवाले पाठक को अनुवाद से जुड़ी कुछ तात्विक बातों से परिचय कराता है।
1.2. विषय प्रवेश
मानवीय भाषा व्यवहार द्विमुखी है। यह दो व्यक्तियों के बीच सामान्यतः समस्त व्यवहारों की साधिका है। ऐसी भाषा की व्याप्ति भाषा-भाषी समूह तक रहती है और उस भाषा-भाषी समूह में ही भाषा जन्म लेती है, विकास पाती है तथा भाषा-व्यवहार प्रक्रिया में जीवित रहती है। इससे समस्त भाषा- समाज परिचित होता है। अनुवाद व्यवहार की दृष्टि से त्रिमुखी है। अर्थात तीन व्यक्तियों से संबद्ध भाषा- व्यवहार है, वे हैं : मूल भाषा प्रयोक्ता, अनुवादक और लक्ष्य भाषा का ग्राहक। अनुवाद की दो स्थितियाँ होती हैं- मौखिक और लिखित। दोनों स्थितियों में मूल भाषा प्रयोक्ता और अनुवादक एक-एक व्यक्ति अलग रहते हैं, पर ग्राहक एक या अनेक हो सकते हैं। उपयोगी काल की दृष्टि से अनुवाद अल्पकालिक और दीर्घ कालिक होता है। अल्पकालिक अनुवाद प्रायः मौखिक (आशु) अनुवाद होता है। समाचार पत्रों, अन्य अल्पकालिक व्यवहार सिद्धि के लिए और उपयोगी सूचना-प्रधान माध्यमों के लिए लिखित अनुवाद भी होते हैं। कुछ अनुवादों का लक्ष्य शाश्वत, दीर्घकालीन और विश्वजनीत भी होता है। ऐसे लिखित अनुवाद मौलिक जीवन-सत्यों, मूल्यों एवं प्रयोजनों से संबद्ध होते हैं। ज्ञान-विज्ञान से युक्त ये अनुवाद लिखित रूप में ही अवतरित होते हैं। ऐसे ही अनुवादों की सिद्धि हेतु अनुवाद की प्रक्रिया एवं प्रविधि का निर्धारण होता है। पर यहाँ ध्यान देने की बात है कि अनुवाद प्रक्रिया तीन व्यक्तियों के बीच विचार अंतरण की प्रक्रिया है और सभी स्थितियों में महत्वपूर्ण है। चलिए, इस प्रक्रिया और प्रविधि की यथासंभव जानकारी प्राप्त कर लें।
1.3. अनुवाद प्रक्रिया : अनुचिंतन
अनुवाद प्रक्रिया पर चिंतन आधुनिक युग में अधिक चल रहा है। पहले साहित्य केंद्रित चिंतन चल रहा था। उस चिंतन को भाषा वैज्ञानिकों ने बल दिया। आगे चलकर सभी शास्त्रियों ने अनुवाद की ओर ध्यान दिया। तर्क शास्त्री, अर्थ-शास्त्री, समाज शास्त्री आदि सब ने इस के महत्व को रेखांकित कर चिंतन की धारा को तेजस्वी बनाया है। साहित्येतर क्षेत्रों में अनुवाद की दिशाएँ और चुनौतियाँ भी सामने आ रही हैं। अब की आवश्यकता है अनुवाद की प्रक्रिया और प्रविधि को एक समग्र दृष्टि से देखें।
प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव आधुनिक भारतीय भाषा-वैज्ञानिकों में प्रथमगण्य हैं, जिन्होंने अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों भाषाओं के माध्यम से अपने भाषापरक वैज्ञानिक विचार व्यक्त किये हैं। यहाँ उनके अनुवाद- प्रक्रिया पर केंद्रित कुछ विचार लीजिए-
- अनुवाद अनुप्रयुक्त भाषिक प्रक्रिया है। अतः उसका एक आयाम उन पाठकों से जुड़ा होता है, जिनके लिए अनुवाद कार्य संपन्न किया जाता है। इसलिए अर्थ संप्रेषण की प्रक्रिया में इस बात की ओर ध्यान दिया जाता है कि अनूदित पाठ युग धर्मी, संप्रेषण-सिद्ध और लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुरूप हो।
- किसी भी अनुवाद सिद्धांत के लिए ‘प्रतिस्थापन’ और ‘अंतरण’ की दो प्रक्रियाओं के भेद को ध्यान में रखना ज़रूरी है।
- अनुवाद स्रोत भाषा के पाठ का पहले ‘विकोडीकरण’ है और इसके बाद कोडीकरण के माध्यम से अर्थ का लक्ष्य भाषा के पाठ में पुर्नगठन है।
- अनुवाद में अंतःकरण की प्रक्रिया दो भाषाओं की टकराहट से मुक्त नहीं रह सकती। (यहाँ प्रतीक-व्यवस्था के अंतरण को ध्यान में रखना चाहिए)
- अनुवाद प्रक्रिया में दो भाषाओं के संप्रेषण-व्यापार की अपेक्षा रहती है। इसीलिए इस पूरे व्यापार में दो प्रकार की प्रेषक (लेखक), संदेश (पाठ), ग्रहीता (पाठक) की संकल्पना निहित रहती है।
- अन्य भाषा में कोडीकृत पाठ को अनूदित पाठ तभी कहा जा सकता है, जब वह प्रकार्यात्मक और संरचनात्मक दृष्टि से मूल पाठ के सहपाठ के रूप में सिद्ध हो।
- लिखित भाषाभिव्यक्ति मौखिक प्रकार से भिन्न प्रकार के वाक्य-विन्यास और पाठ-रचना की अपेक्षा रखती है।
अनुवाद प्रक्रिया के चार सोपान हैं-
(1) पाठ चयन, (2) पाठ विश्लेषण, (3) अंतरण और (4) पुनर्गठन ।
ये चारों सोपान विषय क्षेत्र के आधार पर बहुमुखी रूप में विदित होते हैं।
1.4. पाठ चयन
अनुवाद में पाठ-चयन का महत्वपूर्ण स्थान है। अनुवाद्य कृति या विषय-पाठ का चयन प्रायः अनुवादक ही अपनी रुचि के अनुसार करता है। अनुवाद की भूमिका में अनुवादक ‘स्वान्तः सुखाय’ की भावना से अधिक प्रेरित होता है। एक और स्थिति में अनुवादक दूसरे स्रोतों से भी प्रेरणा प्राप्त करता है। जहाँ अनुवादक स्वतंत्र है वहाँ पर ‘कृति’ या विषय पाठ का चयन स्वयं करता है। दूसरी स्थिति में आर्थिक आवश्यकता, सामाजिक उपयोगिता, अन्य व्यक्तियों की इच्छा, संस्थाओं के लक्ष्य आदि अनुवादक को अनुवाद के लिए प्रेरित करते हैं। तेलुगु का आदि काव्य ‘महाभारत’ के अनुवाद में अनुवादक आदि कवि नन्नया को आश्रयदाता राजा राजनरेंद्र से अनुवाद की प्रेरणा और आदेश मिला है। उसी संदर्भ में पाठ चयन की बात पर चर्चा हुई। अनुवाद के लिए स्वीकृत कृति या वस्तु के संदर्भ में कहा गया है-
एयदि हृद्यमपूर्व,
बेयदि येद्दानिविनिन समग्रं
बैयुंड, नधनिबर्हण
बेयदि यक्कथय विनग निघृमु माकुन् ।।
(आंध्र महाभारतम्, 1/30)
उक्त छंद में जो विचार व्यक्त किया गया है, उसके अनुसार जो कथ्य हृदय को आनंद देने वाला है, वह अपूर्व, उस समय से पहले नहीं कहा गया है, जिसको सुनने से ज्ञान समग्र होता है। उसी वस्तु को अनुवाद के लिए ग्रहण करना है। यह कथन अनुवाद कृति के संदर्भ में चयन की स्थिति को स्पष्ट करता है।
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में साहित्यिक पाठों के अनुवाद के साथ-साथ तकनीकी, चिकित्सा, विधि और प्रशासन के क्षेत्रों में भी अनुवाद शुरू हुआ। ऐसे में अनुवादक के लिए पाठ चयन महत्वपूर्ण होने लगा। यदि पाठ को परिभाषित किया जाए तो- पाठ वाक्यों की श्रृंखला है जिसका संयोजन किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया हो और जिसका संप्रेष्य अर्थ और लक्ष्य हो। उद्देश्य, अर्थ और लक्ष्य से युक्त पाठ का चयन अनुवाद प्रक्रिया का प्रथम चरण होता है।
पाठ चयन की प्रक्रिया तभी आरंभ हो जाती है, जब अनुवादक को मूल कृति (लेखक सहित) की संदर्भीय पहचान हो जाती है। अनुवाद्य पाठ की लक्ष्य भाषा-भाषियों के पाठकों के लिए अनिवार्यता का बोध होता है। अनुवादक की (कतिपय संदर्भों में अनुवाद कराने वाले की) जीवन-दृष्टि, ज्ञान-पिपासा, जिज्ञासा आदि मूल पाठ को अनुवाद के लिए प्रेरित करती हैं।
स्रोत भाषा पाठ का परिचय अनुवादक को मिलता है। उस परिचय से वह जीवन संदर्भ को पहचानता है। जीवन-दृष्टि से प्रेरित अनुवादक लक्ष्य भाषा-भाषियों के लिए उसकी उपादेयता को रेखांकित कर लेता है। उपादेयता और व्यावहारिकता के संतुलन से संतुष्ट होकर लक्ष्य भाषा में अंतरित करने के लिए कटिबद्ध होता है। इस तरह अनुवाद एक सामाजिक-सांस्कृतिक कार्य हो जाता है। अनुवाद पाठ (Text) के चयन से संतुष्ट अनुवादक की यात्रा वास्तविक अनुवाद प्रक्रिया से जुड़ती है।
1.5. पाठ विश्लेषण
अनुवाद के संदर्भ में अनुवादक को पाठ का विश्लेषण कर लेना चाहिए। पाठ विश्लेषण का सामान्य अर्थ होता है मूल पाठ (Original Text) के संदेश को स्पष्ट-सुलझे रूप में विश्लेषित कर लेना। यह प्रथमतः एक अनिवार्य प्रक्रिया है। पाठ के दो पक्ष होते हैं- विषय वस्तु और भाषा। विषय वस्तु गंभीर, सूक्ष्म और अपनी परिधि में विस्तृत होती है। वस्तु विश्लेषण के स्तर पर अनुवादक को मूल भाषा-समाज की अवधारणाओं को वस्तुपरक दृष्टि से (Objective outlook) परखना होता है। विज्ञान के क्षेत्र में तो और सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। भाषा के स्तर पर विश्लेषण की प्रक्रिया में भाषा वैज्ञानिक दृष्टि को अपनाकर आगे बढ़ना होगा। भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण का संबंध संरचनात्मक विवरणों से और स्रोत भाषा-भाषियों की सांस्कृतिक-सामाजिक एवं मानसिक वास्तविकताओं से है। इस स्तर पर अनुवादक एक अध्येता और अनुसंधाता होता है, होना भी चाहिए। एक सच्चे पाठक की भूमिका निभाते हुए अनुवादक मूल पाठ के प्रति अपनी निष्ठा और प्रतिबद्धता का परिचय देता है। विषय के स्पष्ट ज्ञान के अभाव में अनुवाद सफल नहीं हो सकता।
पाठ विश्लेषण का महत्वपूर्ण अंश संदर्भ है। पाठ से संबंधित विषय वस्तु का विश्लेषण संदर्भ के साथ जोड़ कर करना अत्यंत आवश्यक है। संदर्भ के बिना अर्थ निर्धारण असंभव होता है। संदर्भ के साथ-साथ कुछ और ध्यातव्य पक्ष हैं, जिनकी ओर अनुवादक की दृष्टि जानी चाहिए। वे हैं- देश, समाज विशेष (ज्ञान विशेष), काल (ऐतिहासिक संदर्भ) और सांस्कृतिक एवं दार्शनिक भूमिका।
पाठ विश्लेषण के भाषिक पक्ष में भाषा संरचना विधान की सही पहचान अनुवादक के सामने आती है। इस संदर्भ में दो पक्ष उभरते हैं- संरचना पक्ष और प्रयोग पक्ष। संरचना पक्ष में मूल भाषा की भाषिक व्यवस्था की पहचान की बात है। इसके अंतर्गत शब्द, पदरूप, लिंग, वचन, समास रचना, नए शब्द सृजन की प्रक्रिया आदि का विश्लेषण होता है। प्रयोग पक्ष के संदर्भ में शब्द-शक्ति, व्यंग्यात्मक प्रयोग, मुहावरे और लोकोक्तियाँ, बलाघात, अनुतान आदि के द्वारा अर्थ संप्रेषण की स्थितियों का विवरण विश्लेषण प्रधानता प्राप्त करते हैं।
1.6. अंतरण-प्रक्रिया
पाठ विश्लेषण प्रक्रिया में पाठ द्वारा संवहित अर्थ को ग्रहण कर उसको लक्ष्य भाषा में ले जाना अंतरण के अंतर्गत आने वाली क्रिया है। प्रो. दिलीप सिंह ने इस अंतरण को चार स्थितियों में माना है- पूर्ण अंतरण, विश्लेषणात्मक अंतरण, संश्लेषणात्मक अंतरण और संरचनात्मक अंतरण।
अनुवाद कार्य वही है, जिसे अनुवादक भाषांतरीकरण की दृष्टि से एक भाषा-पाठ को स्वीकारता है। उसका संबंध स्रोत भाषा के संदेश को (या उसके द्वारा संप्रेषित ज्ञान-विज्ञान को) प्रथमशः अर्थ के स्तर पर शैली के साथ जोड़कर निकटतम एवं तुलनीय रूप में प्रस्तुत करने से होता है। पूर्ण अंतरण के संदर्भ में डॉ. चंद्रभान रावत का विचार यहाँ उद्धृत करना समीचीन होगा। उन्होंने ‘अर्थ : अनुवाद की सीमाएँ’ नामक लेख में स्पष्ट कहा है-
अनुवादक का प्रमुख सरोकार है- निभ्रांत अर्थ बोध और उसका भाषांतरण के द्वारा स्पष्ट प्रेषण। अर्थ एक गत्यात्मक मनोसामाजिक तत्व है, जो शब्द की आत्मा है। शब्द एक अर्थ का संवाहक या प्रेषक ध्वनि प्रतीक है। शब्द और अर्थ का प्रतीकात्मक संबंध भाषिक संरचना में प्रकट होकर सार्थक भाषा व्यवहार में परिणत होता है। अनुवाद के द्विभाषिक व्यवहार का संबंध शब्दार्थमय भाषिक संरचना के स्थानांतरण से है।
अनुवाद भाषिक व्यवस्थाओं से संबंधित प्रक्रिया है। इसमें स्रोत भाषा से संबंधित भाषिक व्यवस्थाओं का अंतरण लक्ष्य-भाषा की व्यवस्थाओं में संपन्न किया जाता है। भाषा अपने में उप-व्यवस्थाओं की एक समग्र व्यवस्था है। यह संश्लिष्ट और सामासिक व्यवस्था है। भाषा से संबंधित प्रधान व्यवस्थाएँ हैं- (1) ध्वनि व्यवस्था (स्वन व्यवस्था) (2) रूप व्यवस्था (3) अर्थ व्यवस्था (4) वाक्य व्यवस्था तथा (5) लेखिम व्यवस्था (लिपि-व्यवस्था)। अनुवाद प्रक्रिया का संबंध जैसे पहले ही कहा जा चुका है केवल भाषा संरचनापरक ही नहीं बल्कि भाषा-समाजगत अनेक तत्वों से भी संबद्ध है। भाषा को प्रभावित करने वाले भाषेतर तत्व भी हैं- (1) सांस्कृतिक उपादान (2) भौतिक विकास (3) धार्मिक संस्कृत (4) भौगोलिक पर्यावरण एवं (5) सामाजिक व्यवस्था। इनकी सम्यक अवधारणा के साथ अनुवाद की संपूर्ण प्रक्रिया सुसंपन्न होती है।
अनुवाद की प्रक्रिया जहाँ तात्विक विवेचन के साथ वस्तु तत्व अथवा भाषा तत्व के अंतरण से संबद्ध होती है, वहाँ उसकी स्थितियों में अंतर मिलता है। संदेश का विश्लेषण करके उसके मूल तत्व का अंतरण हो तो वहाँ विश्लेषणात्मक अंश से जुड़कर उस कोटि में अनुवाद-प्रक्रिया आती है। जहाँ सब तत्वों का संश्लेषणात्मक रूप (मिली-जुली संयुक्त अवधारणा पर आधारित रूप) अलग प्रक्रिया को सूचित करता है। केवल भाषिक संरचना या वस्तु संरचना को आधार बनाकर अनुवाद प्रक्रिया चलती है, तो एक अन्य प्रकार के अनुबाद का आविष्कार हो जाता है। अंतरण की स्थिति और गति अनुवाद के वर्ग को सूचित करता है।
1.7. पुनर्गठन
पुनर्गठन की प्रक्रिया अनुवाद प्रक्रिया का अंतिम चरण है। मूल लेखक के द्वारा संप्रेषित सभी तत्वों को कृति में पहचानने, विश्लेषण करने और अनुवादक द्वारा सही रूप से समझने के बाद संपन्न होनेवाली प्रक्रिया पुनर्गठन है। इस स्थिति में अनुवादक स्वयं लेखक बनता है। मूल लेखक ने अपने ग्राहकों को जो देना चाहा था, उसे लक्ष्य भाषा-समाज को अनुवादक संवेद्य रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। यहाँ पर अनुवादित कृति को लक्ष्य-भाषा पाठकों की दृष्टि से संप्रेषणीय और बोधगम्य बनाने का प्रयत्न होता है। पुनर्गठन में मूल कृति का नया आविष्कार हो जाता है। यहाँ वह ‘सहपाठ’ या समान पाठ का अवतार ग्रहण करती है। इस प्रतिफलन में भाषिक पक्ष, अर्थ पक्ष, शैलीं पक्ष तथा सुश्राव्यता (या सुपाठ्यता) पक्ष, वस्तु पक्ष से जुड़कर पुनः स्थापित हो जाते हैं।
पुनर्गठन या पुनःसृजन के उपरांत अनूदित पाठ की परिणति कुछ निम्नलिखित विशेषताओं से युक्त होती हैं -
1) मूल पाठ लक्ष्य पाठ में सम तुल्य शब्द के सहारे प्रतिस्थापित हो जाता है। मूल अर्थ ग्रहण में व्यवधान से मुक्त भी रहता है।
2) मूल पाठ में निहित विचारों या परिकल्पनाओं का प्रतिस्थापन समग्र रूप में होता है।
3) मूल पाठ के समान कृति सहज प्रतीत होती है।
4) शैली की दृष्टि से लक्ष्य पाठ को अपनापन परिलक्षित होता है।
5) मूल कृति (पाठ) समय की दृष्टि से समकालीन भाषा होती है।
6) मूल लेखकीय विचार पाठक को सृजनात्मक़ संसार में ले जानेवाले हो जाते हैं।
7) अनुवाद-प्रक्रिया के स्वरूप में विश्वसनीयता एवं सच्चाई का योग हो जाता है।
8) अनुवादक मात्र अंतरण करने वाला न होकर स्वयं कृतिकार बन जाता है।
उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अनुवाद प्रक्रिया के विभिन्न चरणों से अवगत होने पर अनुवाद सुसंपन्न बन जाता है। प्रक्रिया के आधार पर अनुवाद के आंशिक, शाब्दिक, भावानुवाद और छायानुवाद के स्तर मिलते हैं। अनुवाद के प्रकार का परिचय आगे की इकाइयों में प्राप्त करेंगे। किंतु यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि पाठ धर्मी अनुवाद और प्रभाव धर्मी अनुवादों के स्वरूप अनुवादक की योग्यता और दृष्टि पर आधारित होकर बनते हैं।
1.8. प्रविधि
अनुवाद प्रक्रिया में प्रविधियों का निर्धारण क्लिष्ट कार्य है। इस दिशा में कहीं सार्वात्रिक सिद्धांत या सूत्र नहीं मिलते। अनुवाद के संदर्भ में तेलुगु आलोचक डॉ. बूदाराजु राधाकृष्ण निम्नलिखित परस्पर विरोधी सूत्रों का उल्लेख करते हैं-
1) अ. अनुवाद में मूल के शब्दों को ज्यों का त्यों अनूदित करना है।
आ. अनुवाद में मूल के भाव का अंतरण करना है।
2) अ. अनुवाद पढ़ने के लिए मूल रचना जैसा होना चाहिए।
आ. अनुवाद को अनुवाद ही भासित होना चाहिए।
3) अ. अनुवाद में मूल रचना शैली प्रतिबिंबित होनी चाहिए।
आ. अनुवाद में अनुवाद की शैली व्यक्त होनी चाहिए।
4) अ. अनुवाद को मूल रचना काल का ही भासित होना चाहिए।
आ. अनुवाद को समकालीन रचना लगना चाहिए।
5) अ. अनुवाद में मूल कृति के साथ परिवर्तन और जोड़-तोड़ नहीं होना चाहिए।
आ. अनुवाद में परिवर्तन और जोड़-तोड़ हो सकते हैं।
उक्त युगल अभिव्यक्तियों में परस्पर विरोधाभास मिलता है, किंतु यह अनुवाद प्रविधि को अवश्य सूचित करते हैं। इन्हीं सूत्रों के आधार पर अनुवाद के अनेक प्रकार बनते हैं। हर प्रकार अपने आप में प्रविधिपरक कुछ सूत्रों का अनुपालन करता है। उक्त सूत्रों के आधार पर अनुवाद के सिद्धांतों का भी प्रतिपादन हुआ है। इनके एक सामान्य अवगाहन से प्रविधियों का स्वरूप भी स्पष्ट हो जाता है।
अनुवाद की प्रकृति के आधार पर मूलनिष्ठ अनुवाद, मूल मुक्त अनुवाद, शब्दानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद, टीकानुवाद, वार्तानुवाद आदि कुछ भेद अनुवाद प्रक्रिया की विधि को निर्धारित करनेवाले हैं। इनका उपयोग साहित्यिक और साहित्येतर अनुवाद दोनों प्रकार में होता है। अतः इनका एक सामान्य विवरण देखिए ;
अनुवाद का प्रस्थान बिंदु है- मूल पाठ, जिसे लक्ष्य भाषा पाठ से प्रस्थापित करना ही अनुवादक का उद्देश्य होता है। इस प्रक्रिया में अनुवादक को यह निर्णय लेना होता है कि स्रोत भाषा पाठ या मूल पाठ की विषयवस्तु और संरचना को किस सीमा तक यथावत रखा जाए और किस सीमा तक उसमें परिवर्तन किया जाए। यह विशिष्ट प्रयोजन से और विशिष्ट क्षेत्र में किया जाता है।
1.9. क) मूलनिष्ठ अनुवाद
यहाँ अनुवाद के प्रकारों को एक एक से जानने का प्रयास करेंगे, अतः पहला प्रकार है :
मूलनिष्ठ अनुवाद :
अर्थात ऐसा अनुवाद जिसमें मूल पाठ का ही अनुकरण किया जाता है। मूल पाठ एक स्वायत्त इकाई है, जिसकी अपनी विषयवस्तु, संरचना, शैली, सामाजिक-सांस्कृतिक और तकनीकी संदर्भ और अभिव्यक्ति की विशिष्ट शर्ते होती हैं। ऐसे में अनुवादक अपने प्रयोजन, क्षमता और क्षेत्र की आवश्यकतानुसार मूल पाठ से यथासंभव जुड़े रहने की चेष्टा करता है। इसे दूसरे शब्दों में पाठ-धर्मी अनुवाद भी कहा जाता है।
मूल पाठ का यथावत अनुवाद करना अनुवादक के लिए कठिन होता है। मूल पाठ के हर शब्द की जगह लक्ष्य भाषा के शब्दों को रखते चलने से अनुवाद बहुत अटपटा हो जाता है। हर भाषा की एक अपनी अस्मिता होती है, जिसका विस्तार उसकी व्याकरणिक संरचना से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक-सौंदर्यात्मक संदर्भों तक व्याप्त होता है। इसलिए मूल पाठ को लक्ष्य भाषा में यथावत ले जाना लगभग असंभव माना जाता है। जब अनुवादक को मूल मुक्त होता है तो उसके आगे कई दिशाएँ खुल जाती हैं और अनुवाद के अन्य प्रकार सामने आते हैं।
1.10. ख) मूलमुक्त अनुवाद
क) मूलमुक्त अनुवाद
मूल पाठ से बँधे न रहकर लक्ष्य भाषा की प्रकृति और प्रयोक्ता की आवश्यकता के अनुसार अनुवाद करना ही मूलमुक्त अनुवाद है। इसके अंतर्गत भावानुवाद, छायानुवाद, रूपांतरण, सारानुवाद, व्याख्यानुवाद आदि कई प्रकार होते हैं। मूल मुक्त अनुवाद के संदर्भ में यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि कोई भी अनुवाद पूरी तरह से मूलमुक्त नहीं हो सकता। मूल पाठ का कम या अधिक आधार लेना ही पड़ता है, इस दृष्टि से अनुवाद एक ऐसी प्रक्रिया है, जो रचनात्मक होते हुए भी परिसीमित होती है, क्योंकि अनुवाद मूल पाठ को लक्ष्य भाषा में ले जाने की प्रक्रिया है।
1.11. ग) शब्दानुवाद
क) शब्दानुवाद
कोई भी मूल पाठ सबसे पहले शाब्दिक संरचना होता है, इसलिए शब्द-प्रतिशब्द अनुवाद मूलनिष्ठ अनुवाद की पहली शर्त होती है। लेकिन ऐसा करने में अनुवाद अटपटा हो जाता है। उदाहरण के लिए-
मूल : I am going home.
अनुवाद : मैं जा रहा हूँ घर।
अँग्रेज़ी-हिंदी की वाक्य संरचना में भिन्नता के कारण यहाँ अटपटापन है। अँग्रेज़ी वाक्य-रचना में कर्ता के बाद क्रिया आ रही है जबकि हिंदी वाक्य में क्रिया अंत में होनी चाहिए, अर्थात अनुवाद होना चाहिए-मैं घर जा रहा हूँ।
इसका मतलब है कि शब्द-प्रतिशब्द अनुवाद में अनुवादक यदि लक्ष्य भाषा की संरचना को ध्यान में रखे और उसके अनुसार शब्दों को रखे तो अनुवाद ठीक होगा, लेकिन शब्दानुवाद या शाब्दिक अनुवाद की अपनी सीमाएँ हैं। जहाँ भाषा सतही सरंचना से गहन संरचना में प्रवेश करती है और अभिधा से बढ़कर लक्षणा और व्यंजना का प्रयोग होने लगता है, वहाँ शब्दानुवाद असफल हो जाता है। गहन अर्थ वाली अभिव्यक्तियाँ, सांस्कृतिक संदर्भों से जुड़ी अभिव्यक्तियाँ और अभिव्यंजना-सौंदर्य शब्दानुवाद के माध्यम से प्रकट नहीं हो सकते। जैसे-
मूल : डाक्टर ने मरीज़ की नब्ज़ देखी।
अनुवाद : The doctor saw the pulse of the patient.
होना चाहिए : The doctor felt the pulse of the patient
शाब्दिक अनुवाद प्रायः सूचना प्रधान साहित्य के अनुवाद में किया जाता है, जैसे कार्यालयीन प्रशासनिक साहित्य, वैज्ञानिक साहित्य, विधि साहित्य, तकनीकी व तथ्यपरक साहित्य। शब्दानुवाद के माध्यम से मूल कृति का प्रामाणिक और यथावत अनुवाद प्रस्तुत किया जाता है।
1.12. घ) भावानुवाद
क) भावानुवाद
भावानुवाद शब्दानुवाद का ठीक उल्टा है। इस प्रकार में मूल पाठ के भाव को आधार बनाकर अनुवादक लक्ष्य भाषा की स्वाभाविकता और सम्प्रेषणीयता को ध्यान में रखकर अनुवाद करता है। इसमें मूल पाठ के शब्दों और भाषा पर ध्यान नहीं रहता, बल्कि भाव और अर्थ पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। भावानुवाद कई स्तरों पर किया जाता है जैसे- पदबंध स्तर पर ‘भारत में पैदा होने वाला गेहूँ’ का अँग्रेज़ी अनुवाद- ‘Indian Wheat’, कभी कई वाक्यों-उपवाक्यों को मिलाकर एक वाक्य में भावानुवाद कर दिया जाता है, कभी पूरे एक अनुच्छेद का भावानुवाद दो-चार वाक्यों में कर दिया जाता है। भावानुवाद का उपयोग ऐसी विशिष्ट सांस्कृतिक और सौंदर्यात्मक अभिव्यक्तियों के लिए किया जाता है, जहाँ शब्दानुवाद संभव या उपयुक्त नहीं होता। उदाहरण के लिए-
मूल : Cock and bull story.
अनुवाद : बेसिर-पैर की बात।
मूल : Apple of discord.
अनुवाद : झगड़े की जड़।
भावानुवाद का प्रयोग विशेषकर मुहावरों और लोकोक्तियों के अनुवाद में होता है जहाँ मूल पाठ के समानार्थी भावों के सूचक पर्यायों का प्रयोग किया जाता है, जैसे-
मूल : Cast in the same mould.
अनुवाद : एक ही थैली के चट्टे-बड़े।
मूल : To rain cats and dogs.
अनुवाद : मूसलाधार पानी बरसना ।
साहित्यिक सामग्री के अनुवाद में विशेषकर भावानुवाद का प्रयोग ही किया जाता है, क्योंकि ऐसी सामग्री में शब्द नहीं, बल्कि अर्थ प्रधान होता है। कविता के अनुवाद में भावानुवाद लगभग अपरिहार्य बन जाता है, क्योंकि कविता शब्द, अर्थ और संवेदना से युक्त एक सौंदर्य-कृति होती है। फिट्ज़राल्ड की पंक्ति का हरिवंशराय बच्चन द्वारा किया गया अनुवाद देखिए-
मूल : I came like water, and like wind I go.
अनुवाद : लिए आया था अश्रु प्रवाह छोड़ता जाता हूँ उच्छ्वास।
यहाँ शाब्दिक अनुवाद होता - मैं आया पानी की तरह, और जाता हूँ हवा की तरह। लेकिन बच्चन जी ने इसके मूल भाव को पकड़ा और अनुवाद में उसे उतारने की कोशिश की। भावानुवाद में अनुवादक की रचनात्मक प्रतिभा की ज़रूरत होती है।
1.13. ड.) छायानुवाद
क) छायानुवाद
मूल पाठ से केवल प्रभाव ग्रहण कर उसे लक्ष्य भाषा की सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के अनुरूप पुनर्प्रस्तुत करना छायानुवाद कहलाता है। छायानुवाद में मूल पाठ का कथ्य तो वही रहता है, लेकिन लक्ष्य भाषा की आवश्यकताओं के अनुरूप संदर्भ और शैली बदल दी जाती है। नवजागरण युग में यूरोपीय और अँग्रेज़ी साहित्य से अपनी भाषाओं में किए गए अनुवाद कार्यों में अधिकांश छायानुवाद थे। उदाहरण के लिए भारतेंदु हरिश्चन्द्र द्वारा अनूदित शेक्सपियर के नाटक ‘मर्चेण्ट ऑफ़ वेनिस’ का हिंदी अनुवाद लिया जा सकता है।
भारतेंदु ने अपने हिंदी अनुवाद का शीर्षक रखा- ‘दुर्लभ बंधु व वंशपुर का महाजन’ इसमें स्थान, पात्र, वस्तुओं के नामों को भारतीय परिवेश के अनुरूप बदल दिया गया है। ‘वेनिस’ बदल कर वंशपुर बना तो ‘पोर्शिया’ का भारतीय नाम हुआ ‘पुरश्री’। छायानुवाद करने के लिए भी अनुवादक में सर्जनात्मक प्रतिभा होनी चाहिए।
1.14. च) सारानुवाद
क) सारानुवाद
मूल पाठ की प्रमुख बातों को सार-रूप में प्रस्तुत करना सारानुवाद कहलाता है। मूल पाठ कितना संक्षिप्त, अति संक्षिप्त या अत्यंत संक्षिप्त रूप हो सकता है, यह प्रयोक्ता या अनुवाद के ग्रहीता की आवश्यकता के अनुसार निर्धारित होता है। लंबे भाषणों का तुरंत अनुवाद इसी रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सारानुवाद में मूल पाठ के मुख्य भाव, केंद्रीय विचार, प्रमुख मुद्दा (Issue), लेकर उसे प्रयोक्ता की आवश्यकतानुसार संक्षेप में प्रस्तुत किया जाता है। इसका प्रयोग साहित्येतर सूचना प्रधान सामग्री के लिए किया जाता है। इसमें अनुवादक को यह ध्यान में रखना होता है कि वह किस प्रयोजन से, किस क्षेत्र में किस के लिए अनुवाद कर रहा है। मूल पाठ का सार सार- संक्षेप, सार-गर्भित तथा क्रमबद्ध और स्पष्ट होना चाहिए।
आज के सूचना प्रधान युग में सारानुवाद की उपयोगिता कई क्षेत्रों में हो रही है। विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं के कार्यालयों में सूचनाएँ, रिपोर्ट, विवरण, समाचार आदि सार-अनुवाद के रूप में ही तैयार किए जाते हैं। जनसंचार के अन्य माध्यमों जैसे रेडियो, दूरदर्शन में भी सारानुवाद किया जाता है।
1.15. छ) व्याख्यानुवाद
क) व्याख्यानुवाद
यह सारानुवाद का लगभग उल्टा है। सारानुवाद में जहाँ मूल पाठ का संक्षेप किया जाता है, वहीं व्याख्यानुवाद में मूल पाठ की व्याख्या की जाती है। मूल पाठ को लक्ष्य भाषा के पाठकों के लिए अधिक से अधिक ग्राह्य बनाने के लिए व्याख्यानुवाद का सहारा लिया जाता है। अनुवाद के इस प्रकार प्रयोग प्राचीन साहित्य के संदर्भ में शुरू हुआ। ग्रीक भाषा, संस्कृत भाषा के महाकाव्य और प्राचीन धार्मिक साहित्य के संदर्भ में व्याख्यानुवाद का उपयोग एक लंबे समय से होता आ रहा है। इस संदर्भ में इसे टीकानुवाद या भाष्य अनुवाद भी कहा जाता है। प्राचीन धर्म, दर्शन और विचारधारा से जुड़े ग्रंथों को संस्कृत से अन्य भाषाओं में रूपान्तरित करते समय कठिन अंशों की व्याख्या की जाती रही है। गीता के कई व्याख्यानुवाद हुए हैं। लोकमान्य तिलक का ‘गीतानुवाद’ ‘कर्मयोग रहस्य’ इसी का उदाहरण है।
व्याख्यानुवाद का उपयोग साहित्यिक अनुवाद और साहित्येतर अनुवाद में भी होता है। साहित्यिक अनुवाद में सांस्कृतिक विश्वासों, कर्मकाण्डों और संदर्भों से जुड़े शब्दों, भाषिक-सांस्कृतिक प्रयोग, दार्शनिक- विचाराधारात्मक प्रतीक और संकल्पनाएँ व्याख्यानुवाद के माध्यम से लक्ष्य भाषा में प्रस्तुत की जाती है। उदाहरण के लिए कुछ प्रयोग देखिए-
मूल : गंगा नहाना
अनुवाद : To bathe in the Ganges to wash away the sins.
यहाँ पर ‘गंगा नहाना’ से जुड़े हुए सांस्कृतिक विश्वास को लक्ष्य भाषा अँग्रेज़ी में व्याख्यात्मक अंश जोड़कर ही अनुवाद किया गया है, ताकि भारतीय संस्कृति से अपरिचित अँग्रेज़ी पाठकों को इसका अर्थ पूर्णतः हृदयंगम हो सके। साहित्येतर अनुवाद में व्याख्यानुवाद का प्रयोग तकनीकी प्रयोगों, प्रशासनिक अभिव्यक्तियों और वैज्ञानिक एवं विधि साहित्य जैसी सामग्री के अनुवाद में किया जाता है। व्याख्यानुवाद का प्रयोग करते समय अनुवाद को लक्ष्य पाठक का ध्यान अवश्य रखना होता है। उदाहरण के लिए एक अभिव्यक्ति और उसके अनुवाद देखिए-
मूल : No entry
अनुवाद 1 : प्रवेश निषेध।
अनुवाद 2 : अंदर आना मना है।
इसमें पहला अनुवाद शब्दानुवाद है, जो सुशिक्षित पाठकों के लिए ग्राह्य है। किंतु दूसरा अनुवाद अल्प शिक्षित और सामान्य जन को ध्यान में रखकर किया गया है।
1.16. ज) वार्तानुवाद अथवा आशु अनुवाद
क) वार्तानुवाद अथवा आशु अनुवाद
वार्तानुवाद अथवा आशु अनुवाद का उपयोग विशेषकर मौखिक रूप से होता है। जब दो भिन्न भाषा-भाषी आपस में चर्चा करते हैं, तो उन्हें द्विभाषी या Interpreter की आवश्यकता पड़ती है। द्विभाषिया उनके बीच चलने वाले वार्तालाप को अनुवाद करके दोनों के बीच संवाद संभव बनाता है। इसे आशु अनुवाद इसलिए कहा जाता है कि इसमें द्विभाषिया को तत्क्षण अनुवाद करना होता है। द्विभाषिया को इस मौखिक वार्ता का सद्य अनुवाद करना पड़ता है। उसे कोई संदर्भ ग्रंथ देखने या चिंतन करने का अवसर नहीं रहता। निश्चय ही आशु अनुवाद करने के लिए अनुवादक को मानसिक रूप से सतर्क और तैयार रहना पड़ता है।
आशु अनुवाद की आवश्यकता आजकल कई क्षेत्रों में हो गई है। अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियों, दो देशों के बीच राजनैतिक और कूटनीतिक संबंधों, विदेशी अतिथियों के आगमन, दो देशों के बीच समझौतों, संधियों और इस प्रकार के अन्य कूटनीतिक प्रस्तावों के संदर्भ में आशु अनुवाद की आवश्यकता पड़ती है। किसी भी देश के पर्यटन और अन्य प्रकार के व्यापारिक व औद्योगिक विकास के लिए आशु अनुवाद आवश्यक हो गया है।
1.17. झ) रूपान्तरण
क) रूपान्तरण
मूल पाठ से यथासंभव मुक्त होकर एक नई रचना करने का नाम है, रूपान्तरण। यूँ तो भावानुवाद और छायानुवाद में भी अनुवादक मूल कृति से मुक्त होने की चेष्टा करता है, लेकिन रूपान्तरण का क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसके अंतर्गत एक विधा की रचना को स्रोत भाषा से उठा कर लक्ष्य भाषा में दूसरी विधा में पुनर्प्रस्तुत किया जा सकता है। जैसे कहानी को एकांकी में परिवर्तित करना, नाटक को कहानी में बदलना, कविता की रंगमंचीय प्रस्तुति भी इसके अंतर्गत आती है। कहानी की रंगमंचीय प्रस्तुति काफ़ी दिनों से होती रही है। इसी के अंतर्गत किसी उपन्यास को फ़िल्म में बदलना, या नाटक को रेडियो प्रस्तुति के लिए ‘ध्वनि के रूपक’ में प्रस्तुत करना भी आता है। अर्थात् रूपांतरण की प्रक्रिया बहुस्तरीय होती है और इसका क्षेत्र भी व्यापक होता है।
कुछ अनुवादक मूल पाठ को लक्ष्य भाषा में ढालने की प्रक्रिया में संशोधन-संपादन का भी उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए तेलुगु उपन्यास ‘वेयिपडगलु’ का हिंदी अनुवाद करते समय अनुवादक श्री पी.वी. नरसिंहाराव ने मूल कृति के कुछ अंशों को छोड़ दिया। कई बार अनुवादक जटिल अभिव्यक्तियों या अननुवाद्य अंशों को छोड़कर अनुवाद करते हैं। कई बार मूल पाठ के कुछ अंशों का ही अनुवाद किया जाता है। ये सारी बातें अनुवाद के विशिष्ट प्रयोजन और लक्ष्य भाषा- भाषी प्रयोक्ता की आवश्यकता को देखकर निर्धारित की जाती है।
1.18. सारांशतः
मानवीय व्यवहार भाषा संप्रेषण से चालित है। जब दो व्यक्तियों या समूहों के बीच भाषा संप्रेषण प्रक्रिया में बाधा उपस्थित होती है तो तीसरा व्यक्ति बीच में उपस्थित होता है। वह दोनों की भाषाओं का जानकार होता है। उसके द्वारा संपन्न होनेवाली व्यावहारिक भाषिक प्रक्रिया अनुवाद है। इससे उक्त दोनों के बीच का व्यवहार संपन्न होता है। यह अनुवाद प्रक्रिया दो रूपों में चलती है, मौखिक और लिखित। इसके अल्पकालिक और दीर्घकालिक दो पक्ष हैं। दीर्घकाल तक उपयोग में रहने वाला अनुवाद शाश्वत या विश्वजनीन ज्ञान-विज्ञान संबंधी या विचारों से संबंधित होता है। इसके संदर्भ में अनुवाद की प्रक्रिया को समझने के प्रयास हुए हैं और होते आ रहे हैं। सबका लक्ष्य अनुवाद को सुसंपन्न बनाना ही है।
अनुवाद-प्रक्रिया से संबंधित अनुचिंतन साहित्य शास्त्रियों और भाषा-वैज्ञानिकों ने ही नहीं अन्य शास्त्रकारों ने भी किया है। यह प्रक्रिया अनुप्रयुक्त भाषिक प्रक्रिया है। इसमें प्रतिस्थापन एवं अंतरण की प्रक्रियाएँ चलती हैं। इसमें भाषिक एवं भाषेतर तत्वों का समग्र समायोजन होता है, यह प्रक्रिया चार सोपानों पर चलती है- पाठ चयन, पाठ विश्लेषण, अंतरण और पुनर्गठन। सही वस्तु या पाठ चयन से लेकर पुनर्गठन या पुनर्निर्माण (पुनः सृजन) की प्रक्रिया तक की यात्रा इस प्रक्रिया से संबंधित है। चाहे भाषिक अंतरण की प्रक्रिया ही क्यों न हो, अनुवाद की संपन्नता से संबंधित प्रविधि अनुवादक के दृष्टिकोण के अनुसार लक्ष्य स्वरूप पर आधारित होकर चलती है। इसकी प्रकृति के आधार पर मूलनिष्ठ, मूल मुक्त, शब्दानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद आदि भेदों में परिणत होकर उभरती है।