इस इकाई में अनुवाद की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों - पाठ के विश्लेषण, अर्थांतरण और पुनर्गठन का क्रमबद्ध अध्ययन कराया जाता है। इसमें अनुवाद की प्रमुख प्राविधियों एवं तकनीकों को स्पष्ट करते हुए उनके व्यवहारिक उपयोग पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, प्रभावी और सटीक अनुवाद के लिए आवश्यक सिद्धांतों एवं कौशलों को समझाया गया है। यह इकाई विद्यार्थियों को अनुवाद के व्यावहारिक पक्ष से परिचित कराते हुए उनकी अनुप्रयोगात्मक क्षमता का विकास करती है।
1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
1.14. च) सारानुवाद
क) सारानुवाद
मूल पाठ की प्रमुख बातों को सार-रूप में प्रस्तुत करना सारानुवाद कहलाता है। मूल पाठ कितना संक्षिप्त, अति संक्षिप्त या अत्यंत संक्षिप्त रूप हो सकता है, यह प्रयोक्ता या अनुवाद के ग्रहीता की आवश्यकता के अनुसार निर्धारित होता है। लंबे भाषणों का तुरंत अनुवाद इसी रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सारानुवाद में मूल पाठ के मुख्य भाव, केंद्रीय विचार, प्रमुख मुद्दा (Issue), लेकर उसे प्रयोक्ता की आवश्यकतानुसार संक्षेप में प्रस्तुत किया जाता है। इसका प्रयोग साहित्येतर सूचना प्रधान सामग्री के लिए किया जाता है। इसमें अनुवादक को यह ध्यान में रखना होता है कि वह किस प्रयोजन से, किस क्षेत्र में किस के लिए अनुवाद कर रहा है। मूल पाठ का सार सार- संक्षेप, सार-गर्भित तथा क्रमबद्ध और स्पष्ट होना चाहिए।
आज के सूचना प्रधान युग में सारानुवाद की उपयोगिता कई क्षेत्रों में हो रही है। विभिन्न पत्र- पत्रिकाओं के कार्यालयों में सूचनाएँ, रिपोर्ट, विवरण, समाचार आदि सार-अनुवाद के रूप में ही तैयार किए जाते हैं। जनसंचार के अन्य माध्यमों जैसे रेडियो, दूरदर्शन में भी सारानुवाद किया जाता है।