इस इकाई में अनुवाद की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों - पाठ के विश्लेषण, अर्थांतरण और पुनर्गठन का क्रमबद्ध अध्ययन कराया जाता है। इसमें अनुवाद की प्रमुख प्राविधियों एवं तकनीकों को स्पष्ट करते हुए उनके व्यवहारिक उपयोग पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, प्रभावी और सटीक अनुवाद के लिए आवश्यक सिद्धांतों एवं कौशलों को समझाया गया है। यह इकाई विद्यार्थियों को अनुवाद के व्यावहारिक पक्ष से परिचित कराते हुए उनकी अनुप्रयोगात्मक क्षमता का विकास करती है।
1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
1.13. ड.) छायानुवाद
क) छायानुवाद
मूल पाठ से केवल प्रभाव ग्रहण कर उसे लक्ष्य भाषा की सामाजिक-सांस्कृतिक आवश्यकताओं और अपेक्षाओं के अनुरूप पुनर्प्रस्तुत करना छायानुवाद कहलाता है। छायानुवाद में मूल पाठ का कथ्य तो वही रहता है, लेकिन लक्ष्य भाषा की आवश्यकताओं के अनुरूप संदर्भ और शैली बदल दी जाती है। नवजागरण युग में यूरोपीय और अँग्रेज़ी साहित्य से अपनी भाषाओं में किए गए अनुवाद कार्यों में अधिकांश छायानुवाद थे। उदाहरण के लिए भारतेंदु हरिश्चन्द्र द्वारा अनूदित शेक्सपियर के नाटक ‘मर्चेण्ट ऑफ़ वेनिस’ का हिंदी अनुवाद लिया जा सकता है।
भारतेंदु ने अपने हिंदी अनुवाद का शीर्षक रखा- ‘दुर्लभ बंधु व वंशपुर का महाजन’ इसमें स्थान, पात्र, वस्तुओं के नामों को भारतीय परिवेश के अनुरूप बदल दिया गया है। ‘वेनिस’ बदल कर वंशपुर बना तो ‘पोर्शिया’ का भारतीय नाम हुआ ‘पुरश्री’। छायानुवाद करने के लिए भी अनुवादक में सर्जनात्मक प्रतिभा होनी चाहिए।