इस इकाई में अनुवाद की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों - पाठ के विश्लेषण, अर्थांतरण और पुनर्गठन का क्रमबद्ध अध्ययन कराया जाता है। इसमें अनुवाद की प्रमुख प्राविधियों एवं तकनीकों को स्पष्ट करते हुए उनके व्यवहारिक उपयोग पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, प्रभावी और सटीक अनुवाद के लिए आवश्यक सिद्धांतों एवं कौशलों को समझाया गया है। यह इकाई विद्यार्थियों को अनुवाद के व्यावहारिक पक्ष से परिचित कराते हुए उनकी अनुप्रयोगात्मक क्षमता का विकास करती है।
1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
1.9. क) मूलनिष्ठ अनुवाद
यहाँ अनुवाद के प्रकारों को एक एक से जानने का प्रयास करेंगे, अतः पहला प्रकार है :
मूलनिष्ठ अनुवाद :
अर्थात ऐसा अनुवाद जिसमें मूल पाठ का ही अनुकरण किया जाता है। मूल पाठ एक स्वायत्त इकाई है, जिसकी अपनी विषयवस्तु, संरचना, शैली, सामाजिक-सांस्कृतिक और तकनीकी संदर्भ और अभिव्यक्ति की विशिष्ट शर्ते होती हैं। ऐसे में अनुवादक अपने प्रयोजन, क्षमता और क्षेत्र की आवश्यकतानुसार मूल पाठ से यथासंभव जुड़े रहने की चेष्टा करता है। इसे दूसरे शब्दों में पाठ-धर्मी अनुवाद भी कहा जाता है।
मूल पाठ का यथावत अनुवाद करना अनुवादक के लिए कठिन होता है। मूल पाठ के हर शब्द की जगह लक्ष्य भाषा के शब्दों को रखते चलने से अनुवाद बहुत अटपटा हो जाता है। हर भाषा की एक अपनी अस्मिता होती है, जिसका विस्तार उसकी व्याकरणिक संरचना से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक-सौंदर्यात्मक संदर्भों तक व्याप्त होता है। इसलिए मूल पाठ को लक्ष्य भाषा में यथावत ले जाना लगभग असंभव माना जाता है। जब अनुवादक को मूल मुक्त होता है तो उसके आगे कई दिशाएँ खुल जाती हैं और अनुवाद के अन्य प्रकार सामने आते हैं।