इस इकाई में अनुवाद की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों - पाठ के विश्लेषण, अर्थांतरण और पुनर्गठन का क्रमबद्ध अध्ययन कराया जाता है। इसमें अनुवाद की प्रमुख प्राविधियों एवं तकनीकों को स्पष्ट करते हुए उनके व्यवहारिक उपयोग पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, प्रभावी और सटीक अनुवाद के लिए आवश्यक सिद्धांतों एवं कौशलों को समझाया गया है। यह इकाई विद्यार्थियों को अनुवाद के व्यावहारिक पक्ष से परिचित कराते हुए उनकी अनुप्रयोगात्मक क्षमता का विकास करती है।
1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
1.8. प्रविधि
अनुवाद प्रक्रिया में प्रविधियों का निर्धारण क्लिष्ट कार्य है। इस दिशा में कहीं सार्वात्रिक सिद्धांत या सूत्र नहीं मिलते। अनुवाद के संदर्भ में तेलुगु आलोचक डॉ. बूदाराजु राधाकृष्ण निम्नलिखित परस्पर विरोधी सूत्रों का उल्लेख करते हैं-
1) अ. अनुवाद में मूल के शब्दों को ज्यों का त्यों अनूदित करना है।
आ. अनुवाद में मूल के भाव का अंतरण करना है।
2) अ. अनुवाद पढ़ने के लिए मूल रचना जैसा होना चाहिए।
आ. अनुवाद को अनुवाद ही भासित होना चाहिए।
3) अ. अनुवाद में मूल रचना शैली प्रतिबिंबित होनी चाहिए।
आ. अनुवाद में अनुवाद की शैली व्यक्त होनी चाहिए।
4) अ. अनुवाद को मूल रचना काल का ही भासित होना चाहिए।
आ. अनुवाद को समकालीन रचना लगना चाहिए।
5) अ. अनुवाद में मूल कृति के साथ परिवर्तन और जोड़-तोड़ नहीं होना चाहिए।
आ. अनुवाद में परिवर्तन और जोड़-तोड़ हो सकते हैं।
उक्त युगल अभिव्यक्तियों में परस्पर विरोधाभास मिलता है, किंतु यह अनुवाद प्रविधि को अवश्य सूचित करते हैं। इन्हीं सूत्रों के आधार पर अनुवाद के अनेक प्रकार बनते हैं। हर प्रकार अपने आप में प्रविधिपरक कुछ सूत्रों का अनुपालन करता है। उक्त सूत्रों के आधार पर अनुवाद के सिद्धांतों का भी प्रतिपादन हुआ है। इनके एक सामान्य अवगाहन से प्रविधियों का स्वरूप भी स्पष्ट हो जाता है।
अनुवाद की प्रकृति के आधार पर मूलनिष्ठ अनुवाद, मूल मुक्त अनुवाद, शब्दानुवाद, छायानुवाद, सारानुवाद, टीकानुवाद, वार्तानुवाद आदि कुछ भेद अनुवाद प्रक्रिया की विधि को निर्धारित करनेवाले हैं। इनका उपयोग साहित्यिक और साहित्येतर अनुवाद दोनों प्रकार में होता है। अतः इनका एक सामान्य विवरण देखिए ;
अनुवाद का प्रस्थान बिंदु है- मूल पाठ, जिसे लक्ष्य भाषा पाठ से प्रस्थापित करना ही अनुवादक का उद्देश्य होता है। इस प्रक्रिया में अनुवादक को यह निर्णय लेना होता है कि स्रोत भाषा पाठ या मूल पाठ की विषयवस्तु और संरचना को किस सीमा तक यथावत रखा जाए और किस सीमा तक उसमें परिवर्तन किया जाए। यह विशिष्ट प्रयोजन से और विशिष्ट क्षेत्र में किया जाता है।