इस इकाई में अनुवाद की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों - पाठ के विश्लेषण, अर्थांतरण और पुनर्गठन का क्रमबद्ध अध्ययन कराया जाता है। इसमें अनुवाद की प्रमुख प्राविधियों एवं तकनीकों को स्पष्ट करते हुए उनके व्यवहारिक उपयोग पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, प्रभावी और सटीक अनुवाद के लिए आवश्यक सिद्धांतों एवं कौशलों को समझाया गया है। यह इकाई विद्यार्थियों को अनुवाद के व्यावहारिक पक्ष से परिचित कराते हुए उनकी अनुप्रयोगात्मक क्षमता का विकास करती है।
1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
1.7. पुनर्गठन
पुनर्गठन की प्रक्रिया अनुवाद प्रक्रिया का अंतिम चरण है। मूल लेखक के द्वारा संप्रेषित सभी तत्वों को कृति में पहचानने, विश्लेषण करने और अनुवादक द्वारा सही रूप से समझने के बाद संपन्न होनेवाली प्रक्रिया पुनर्गठन है। इस स्थिति में अनुवादक स्वयं लेखक बनता है। मूल लेखक ने अपने ग्राहकों को जो देना चाहा था, उसे लक्ष्य भाषा-समाज को अनुवादक संवेद्य रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करता है। यहाँ पर अनुवादित कृति को लक्ष्य-भाषा पाठकों की दृष्टि से संप्रेषणीय और बोधगम्य बनाने का प्रयत्न होता है। पुनर्गठन में मूल कृति का नया आविष्कार हो जाता है। यहाँ वह ‘सहपाठ’ या समान पाठ का अवतार ग्रहण करती है। इस प्रतिफलन में भाषिक पक्ष, अर्थ पक्ष, शैलीं पक्ष तथा सुश्राव्यता (या सुपाठ्यता) पक्ष, वस्तु पक्ष से जुड़कर पुनः स्थापित हो जाते हैं।
पुनर्गठन या पुनःसृजन के उपरांत अनूदित पाठ की परिणति कुछ निम्नलिखित विशेषताओं से युक्त होती हैं -
1) मूल पाठ लक्ष्य पाठ में सम तुल्य शब्द के सहारे प्रतिस्थापित हो जाता है। मूल अर्थ ग्रहण में व्यवधान से मुक्त भी रहता है।
2) मूल पाठ में निहित विचारों या परिकल्पनाओं का प्रतिस्थापन समग्र रूप में होता है।
3) मूल पाठ के समान कृति सहज प्रतीत होती है।
4) शैली की दृष्टि से लक्ष्य पाठ को अपनापन परिलक्षित होता है।
5) मूल कृति (पाठ) समय की दृष्टि से समकालीन भाषा होती है।
6) मूल लेखकीय विचार पाठक को सृजनात्मक़ संसार में ले जानेवाले हो जाते हैं।
7) अनुवाद-प्रक्रिया के स्वरूप में विश्वसनीयता एवं सच्चाई का योग हो जाता है।
8) अनुवादक मात्र अंतरण करने वाला न होकर स्वयं कृतिकार बन जाता है।
उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अनुवाद प्रक्रिया के विभिन्न चरणों से अवगत होने पर अनुवाद सुसंपन्न बन जाता है। प्रक्रिया के आधार पर अनुवाद के आंशिक, शाब्दिक, भावानुवाद और छायानुवाद के स्तर मिलते हैं। अनुवाद के प्रकार का परिचय आगे की इकाइयों में प्राप्त करेंगे। किंतु यह स्पष्ट कहा जा सकता है कि पाठ धर्मी अनुवाद और प्रभाव धर्मी अनुवादों के स्वरूप अनुवादक की योग्यता और दृष्टि पर आधारित होकर बनते हैं।