इस इकाई में अनुवाद की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों - पाठ के विश्लेषण, अर्थांतरण और पुनर्गठन का क्रमबद्ध अध्ययन कराया जाता है। इसमें अनुवाद की प्रमुख प्राविधियों एवं तकनीकों को स्पष्ट करते हुए उनके व्यवहारिक उपयोग पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, प्रभावी और सटीक अनुवाद के लिए आवश्यक सिद्धांतों एवं कौशलों को समझाया गया है। यह इकाई विद्यार्थियों को अनुवाद के व्यावहारिक पक्ष से परिचित कराते हुए उनकी अनुप्रयोगात्मक क्षमता का विकास करती है।
1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
1.6. अंतरण-प्रक्रिया
पाठ विश्लेषण प्रक्रिया में पाठ द्वारा संवहित अर्थ को ग्रहण कर उसको लक्ष्य भाषा में ले जाना अंतरण के अंतर्गत आने वाली क्रिया है। प्रो. दिलीप सिंह ने इस अंतरण को चार स्थितियों में माना है- पूर्ण अंतरण, विश्लेषणात्मक अंतरण, संश्लेषणात्मक अंतरण और संरचनात्मक अंतरण।
अनुवाद कार्य वही है, जिसे अनुवादक भाषांतरीकरण की दृष्टि से एक भाषा-पाठ को स्वीकारता है। उसका संबंध स्रोत भाषा के संदेश को (या उसके द्वारा संप्रेषित ज्ञान-विज्ञान को) प्रथमशः अर्थ के स्तर पर शैली के साथ जोड़कर निकटतम एवं तुलनीय रूप में प्रस्तुत करने से होता है। पूर्ण अंतरण के संदर्भ में डॉ. चंद्रभान रावत का विचार यहाँ उद्धृत करना समीचीन होगा। उन्होंने ‘अर्थ : अनुवाद की सीमाएँ’ नामक लेख में स्पष्ट कहा है-
अनुवादक का प्रमुख सरोकार है- निभ्रांत अर्थ बोध और उसका भाषांतरण के द्वारा स्पष्ट प्रेषण। अर्थ एक गत्यात्मक मनोसामाजिक तत्व है, जो शब्द की आत्मा है। शब्द एक अर्थ का संवाहक या प्रेषक ध्वनि प्रतीक है। शब्द और अर्थ का प्रतीकात्मक संबंध भाषिक संरचना में प्रकट होकर सार्थक भाषा व्यवहार में परिणत होता है। अनुवाद के द्विभाषिक व्यवहार का संबंध शब्दार्थमय भाषिक संरचना के स्थानांतरण से है।
अनुवाद भाषिक व्यवस्थाओं से संबंधित प्रक्रिया है। इसमें स्रोत भाषा से संबंधित भाषिक व्यवस्थाओं का अंतरण लक्ष्य-भाषा की व्यवस्थाओं में संपन्न किया जाता है। भाषा अपने में उप-व्यवस्थाओं की एक समग्र व्यवस्था है। यह संश्लिष्ट और सामासिक व्यवस्था है। भाषा से संबंधित प्रधान व्यवस्थाएँ हैं- (1) ध्वनि व्यवस्था (स्वन व्यवस्था) (2) रूप व्यवस्था (3) अर्थ व्यवस्था (4) वाक्य व्यवस्था तथा (5) लेखिम व्यवस्था (लिपि-व्यवस्था)। अनुवाद प्रक्रिया का संबंध जैसे पहले ही कहा जा चुका है केवल भाषा संरचनापरक ही नहीं बल्कि भाषा-समाजगत अनेक तत्वों से भी संबद्ध है। भाषा को प्रभावित करने वाले भाषेतर तत्व भी हैं- (1) सांस्कृतिक उपादान (2) भौतिक विकास (3) धार्मिक संस्कृत (4) भौगोलिक पर्यावरण एवं (5) सामाजिक व्यवस्था। इनकी सम्यक अवधारणा के साथ अनुवाद की संपूर्ण प्रक्रिया सुसंपन्न होती है।
अनुवाद की प्रक्रिया जहाँ तात्विक विवेचन के साथ वस्तु तत्व अथवा भाषा तत्व के अंतरण से संबद्ध होती है, वहाँ उसकी स्थितियों में अंतर मिलता है। संदेश का विश्लेषण करके उसके मूल तत्व का अंतरण हो तो वहाँ विश्लेषणात्मक अंश से जुड़कर उस कोटि में अनुवाद-प्रक्रिया आती है। जहाँ सब तत्वों का संश्लेषणात्मक रूप (मिली-जुली संयुक्त अवधारणा पर आधारित रूप) अलग प्रक्रिया को सूचित करता है। केवल भाषिक संरचना या वस्तु संरचना को आधार बनाकर अनुवाद प्रक्रिया चलती है, तो एक अन्य प्रकार के अनुबाद का आविष्कार हो जाता है। अंतरण की स्थिति और गति अनुवाद के वर्ग को सूचित करता है।