इस इकाई में अनुवाद की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों - पाठ के विश्लेषण, अर्थांतरण और पुनर्गठन का क्रमबद्ध अध्ययन कराया जाता है। इसमें अनुवाद की प्रमुख प्राविधियों एवं तकनीकों को स्पष्ट करते हुए उनके व्यवहारिक उपयोग पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, प्रभावी और सटीक अनुवाद के लिए आवश्यक सिद्धांतों एवं कौशलों को समझाया गया है। यह इकाई विद्यार्थियों को अनुवाद के व्यावहारिक पक्ष से परिचित कराते हुए उनकी अनुप्रयोगात्मक क्षमता का विकास करती है।
1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
1.4. पाठ चयन
अनुवाद में पाठ-चयन का महत्वपूर्ण स्थान है। अनुवाद्य कृति या विषय-पाठ का चयन प्रायः अनुवादक ही अपनी रुचि के अनुसार करता है। अनुवाद की भूमिका में अनुवादक ‘स्वान्तः सुखाय’ की भावना से अधिक प्रेरित होता है। एक और स्थिति में अनुवादक दूसरे स्रोतों से भी प्रेरणा प्राप्त करता है। जहाँ अनुवादक स्वतंत्र है वहाँ पर ‘कृति’ या विषय पाठ का चयन स्वयं करता है। दूसरी स्थिति में आर्थिक आवश्यकता, सामाजिक उपयोगिता, अन्य व्यक्तियों की इच्छा, संस्थाओं के लक्ष्य आदि अनुवादक को अनुवाद के लिए प्रेरित करते हैं। तेलुगु का आदि काव्य ‘महाभारत’ के अनुवाद में अनुवादक आदि कवि नन्नया को आश्रयदाता राजा राजनरेंद्र से अनुवाद की प्रेरणा और आदेश मिला है। उसी संदर्भ में पाठ चयन की बात पर चर्चा हुई। अनुवाद के लिए स्वीकृत कृति या वस्तु के संदर्भ में कहा गया है-
एयदि हृद्यमपूर्व,
बेयदि येद्दानिविनिन समग्रं
बैयुंड, नधनिबर्हण
बेयदि यक्कथय विनग निघृमु माकुन् ।।
(आंध्र महाभारतम्, 1/30)
उक्त छंद में जो विचार व्यक्त किया गया है, उसके अनुसार जो कथ्य हृदय को आनंद देने वाला है, वह अपूर्व, उस समय से पहले नहीं कहा गया है, जिसको सुनने से ज्ञान समग्र होता है। उसी वस्तु को अनुवाद के लिए ग्रहण करना है। यह कथन अनुवाद कृति के संदर्भ में चयन की स्थिति को स्पष्ट करता है।
बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में साहित्यिक पाठों के अनुवाद के साथ-साथ तकनीकी, चिकित्सा, विधि और प्रशासन के क्षेत्रों में भी अनुवाद शुरू हुआ। ऐसे में अनुवादक के लिए पाठ चयन महत्वपूर्ण होने लगा। यदि पाठ को परिभाषित किया जाए तो- पाठ वाक्यों की श्रृंखला है जिसका संयोजन किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया हो और जिसका संप्रेष्य अर्थ और लक्ष्य हो। उद्देश्य, अर्थ और लक्ष्य से युक्त पाठ का चयन अनुवाद प्रक्रिया का प्रथम चरण होता है।
पाठ चयन की प्रक्रिया तभी आरंभ हो जाती है, जब अनुवादक को मूल कृति (लेखक सहित) की संदर्भीय पहचान हो जाती है। अनुवाद्य पाठ की लक्ष्य भाषा-भाषियों के पाठकों के लिए अनिवार्यता का बोध होता है। अनुवादक की (कतिपय संदर्भों में अनुवाद कराने वाले की) जीवन-दृष्टि, ज्ञान-पिपासा, जिज्ञासा आदि मूल पाठ को अनुवाद के लिए प्रेरित करती हैं।
स्रोत भाषा पाठ का परिचय अनुवादक को मिलता है। उस परिचय से वह जीवन संदर्भ को पहचानता है। जीवन-दृष्टि से प्रेरित अनुवादक लक्ष्य भाषा-भाषियों के लिए उसकी उपादेयता को रेखांकित कर लेता है। उपादेयता और व्यावहारिकता के संतुलन से संतुष्ट होकर लक्ष्य भाषा में अंतरित करने के लिए कटिबद्ध होता है। इस तरह अनुवाद एक सामाजिक-सांस्कृतिक कार्य हो जाता है। अनुवाद पाठ (Text) के चयन से संतुष्ट अनुवादक की यात्रा वास्तविक अनुवाद प्रक्रिया से जुड़ती है।