इस इकाई में अनुवाद की प्रक्रिया के विभिन्न चरणों - पाठ के विश्लेषण, अर्थांतरण और पुनर्गठन का क्रमबद्ध अध्ययन कराया जाता है। इसमें अनुवाद की प्रमुख प्राविधियों एवं तकनीकों को स्पष्ट करते हुए उनके व्यवहारिक उपयोग पर प्रकाश डाला गया है। साथ ही, प्रभावी और सटीक अनुवाद के लिए आवश्यक सिद्धांतों एवं कौशलों को समझाया गया है। यह इकाई विद्यार्थियों को अनुवाद के व्यावहारिक पक्ष से परिचित कराते हुए उनकी अनुप्रयोगात्मक क्षमता का विकास करती है।
1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
1.2. विषय प्रवेश
मानवीय भाषा व्यवहार द्विमुखी है। यह दो व्यक्तियों के बीच सामान्यतः समस्त व्यवहारों की साधिका है। ऐसी भाषा की व्याप्ति भाषा-भाषी समूह तक रहती है और उस भाषा-भाषी समूह में ही भाषा जन्म लेती है, विकास पाती है तथा भाषा-व्यवहार प्रक्रिया में जीवित रहती है। इससे समस्त भाषा- समाज परिचित होता है। अनुवाद व्यवहार की दृष्टि से त्रिमुखी है। अर्थात तीन व्यक्तियों से संबद्ध भाषा- व्यवहार है, वे हैं : मूल भाषा प्रयोक्ता, अनुवादक और लक्ष्य भाषा का ग्राहक। अनुवाद की दो स्थितियाँ होती हैं- मौखिक और लिखित। दोनों स्थितियों में मूल भाषा प्रयोक्ता और अनुवादक एक-एक व्यक्ति अलग रहते हैं, पर ग्राहक एक या अनेक हो सकते हैं। उपयोगी काल की दृष्टि से अनुवाद अल्पकालिक और दीर्घ कालिक होता है। अल्पकालिक अनुवाद प्रायः मौखिक (आशु) अनुवाद होता है। समाचार पत्रों, अन्य अल्पकालिक व्यवहार सिद्धि के लिए और उपयोगी सूचना-प्रधान माध्यमों के लिए लिखित अनुवाद भी होते हैं। कुछ अनुवादों का लक्ष्य शाश्वत, दीर्घकालीन और विश्वजनीत भी होता है। ऐसे लिखित अनुवाद मौलिक जीवन-सत्यों, मूल्यों एवं प्रयोजनों से संबद्ध होते हैं। ज्ञान-विज्ञान से युक्त ये अनुवाद लिखित रूप में ही अवतरित होते हैं। ऐसे ही अनुवादों की सिद्धि हेतु अनुवाद की प्रक्रिया एवं प्रविधि का निर्धारण होता है। पर यहाँ ध्यान देने की बात है कि अनुवाद प्रक्रिया तीन व्यक्तियों के बीच विचार अंतरण की प्रक्रिया है और सभी स्थितियों में महत्वपूर्ण है। चलिए, इस प्रक्रिया और प्रविधि की यथासंभव जानकारी प्राप्त कर लें।