2. साहित्येतर अनुवाद
हमारे देश की स्वतंत्रता का संघर्ष केवल राजनैतिक स्तर पर नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक- सभी स्तरों पर मुक्ति प्राप्त करने के लिए था, इन्हीं में भाषिक स्तर पर स्वाधीन होने का लक्ष्य भी शामिल थादेश की आज़ादी के साथ हिंदी को राष्ट्रभाषा, राजभाषा और संपर्क भाषा- इन तीनों भूमिकाओं में सक्षम और संपन्न बनाने की आवश्यकता प्रबल हो उठीदेश की बहुमुखी उन्नति को संभव करने के लिए हिंदी को विज्ञान, विधि, वाणिज्य, प्रशासन, शिक्षा और साहित्य- सभी क्षेत्रों की भाषा बननी थीइसके लिए प्रचुर पाठ्य सामग्री और साहित्य और शब्दावली की आवश्यकता थी, जिसके लिए अंग्रेज़ी मुख्य स्रोत थी, जिससे अनुवाद करके ही हिंदी को संपन्न बनाया जा सकता था। अंग्रेज़ी प्रशासन की भाषा थी, हिंदी को उसकी जगह लेनी थी, इन सब वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर अंग्रेज़ी को हिंदी के साथ सह राजभाषा का दर्जा दिया गया और दोनों के बीच अनुवाद के माध्यम से आदान-प्रदान का संबंध बनाया गया।
आज सरकारी, ग़ैर-सरकारी और जनता के स्तर पर ऐसी सारी सुविधाएँ और व्यवस्थाएँ जुटाई जा रही हैं, जिससे हिंदी में अनुवाद के द्वारा अधिक से अधिक सामग्री लाई जा सके। पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण, अनुवाद ब्यूरो का संचालन, नेशनल बुक ट्रस्ट, केंद्रीय हिंदी निदेशालय और वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग के द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में पाठ्य सामग्री, शब्दावली और अंग्रेज़ी-हिंदी की मानक अभिव्यक्तियों के कोश आदि का प्रकाशन कर साहित्येतर अनुवाद का कार्य बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा है।