साहित्येतर अनुवाद की आवश्यकता

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Course: साहित्यिक एवं साहित्येतर अनुवाद
Book: साहित्येतर अनुवाद की आवश्यकता
Printed by: Guest user
Date: Wednesday, 15 April 2026, 1:31 AM

Description


1. साहित्येतर अनुवाद की प्रकृति

साहित्येतर अनुवादजैसा कि नाम से ही स्पष्ट हैसूचना प्रधान सामग्री का अनुवाद होता है। ऐसी सामग्री तथ्य परक और प्रयोजनमूलक होती है जिसमें संदेश या message मुख्य होता हैऐसी सामग्री के अनुवाद में लक्ष्य यही होता है कि मूल पाठ का संदेश लक्ष्य भाषा के पाठक तक पहुँच रहा है कि नहीं इसलिए लक्ष्य भाषा के पाठक तक संदेश पहुँचाना साहित्येतर सामग्री के अनुवाद का प्रयोजन होता है इसी नाते जहाँ साहित्यिक सामग्री के अनुवाद में कल्पना, सर्जनात्मकता और अभिव्यंजना- सौंदर्य के कारण अनूदित पाठ एक तरह की पुनर्रचना बन जाता है, वहाँ साहित्येतर अनुवाद मूल पाठ से पूरी तरह प्रतिबद्ध होता है और वस्तुनिष्ठतथ्यपरक दृष्टि से मूल पाठ की प्रतिलिपि ही लक्ष्य भाषा में तैयार करने का प्रयास होता है। साहित्यिक अनुवाद मूलमुक्त होता है अर्थात् मूल पाठ के भाव को यथासंभव अक्षुण्ण रखते हुए, लेकिन आवश्यक स्वतंत्रता लेते हुए और परिवर्तन करते हुए लक्ष्य भाषा में पुनर्प्रस्तुत करता है, जबकि साहित्येतर अनुवाद यथासंभव मूलनिष्ठ होता है। साहित्येतर अनुवाद के लिए भावानुवाद होता है जबकि साहित्येतर अनुवाद में यथासंभव शब्दानुवाद का प्रयास होता है। साहित्यिक अनुवाद में लक्षणा और व्यंजना-शब्द-शक्तियों का प्रयोग होता है जबकि साहित्येतर में अभिधा के स्तर पर ही रहने की चेष्टा की जाती है। साहित्यिक अनुवाद में सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ी कठिनाइयाँ होती हैं, साहित्येतर अनुवाद में सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ी अभिव्यक्तियों को लेकर इतनी अधिक कठिनाई नहीं होती। साहित्येतर अनुवाद में मुख्यतः पारिभाषिक शब्दावली की आवश्यकता होती है। पारिभाषिक शब्द निश्चित-निर्धारित अर्थ वाले होते हैं। संदर्भ के अनुसार इसका प्रयोग करना होता है। साहित्येतर अनुवाद की भाषा इसी कारण निश्चित, निर्धारित, अर्थमयी, एकार्थी अभिव्यक्ति की भाषा होती है। बहु अर्थमयी, बहुभावमयी भाषा साहित्य की शोभा होती है, दुरूहता, अस्पष्टता, अनेक अर्थ स्तरों वाली व्यंजना प्राय: साहित्य का अलंकार होता है। साहित्य में जो कहा जाता है उससे अधिक अनकहा महत्वपूर्ण होता है। जो कहा जा रहा है उससे अधिक जो कहा जा सकता है- इसका अनुमान करना साहित्य के आस्वादन के लिए आवश्यक होता है। 'है, अभी कुछ और है, जो कुछ नहीं गया'- यह साहित्य का मुख्य अभिप्राय होता है, जिसके आगे संभावनाओं का अनंत आकाश होता है। जिसमें उड़ान भरने के लिए पाठक की कल्पना को मुक्त कर दिया जाता है। स्पष्ट है कि साहित्यिक अनुवाद में यही सब कुछ होगा जबकि साहित्येतर अनुवाद की सामग्री ही इतनी तथ्यपरकदो टूकएकार्थी होती है कि पाठक की कल्पना के लिए कुछ छोड़ा नहीं जाता । साहित्येतर अनुवाद क्रियोन्मुख होता है जैसे कार्यालयीन पत्रपरिपत्रसूचनाएँजिनमें विशेष प्रयोजन है और उस प्रयोजन की परिपूर्ति के लिए कोई न कोई कार्य व्यापार किया जाना होता है।

यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि साहित्येतर अनुवाद के क्षेत्र विविध स्तरीय हैंजिनमें वैज्ञानिक विषयों के अनुवादसरकारी कामकाज के पत्रपरिपत्रसूचनाएँ आदिविविध क्षेत्रों में न्यायालय के आदेशक़ानूनवाणिज्यव्यवसाय के क्षेत्र में बाज़ार भावविज्ञापन के साथ-साथ समाज विज्ञान जैसे अर्थशास्त्रराजनीति शास्त्र आदि का अनुवाद शामिल हैं- इसके अनुसार भाषा बदलती हैसाहित्येतर अनुवाद तो इन सभी क्षेत्रों के लिए दिया गया एक सुविधाजनक नाम हैइसके अंतर्गत अलग-अलग क्षेत्रों की भाषा अलग-अलग विशेषता लिए होती है। उदाहरण के लिए विज्ञापनों और बाज़ार भावों की भाषा में लक्षणा और व्यंजना शब्दशक्तियों का उपयोग समझे और आत्मसात किये बिना अनुवाद नहीं किया जा सकता ।


2. साहित्येतर अनुवाद

हमारे देश की स्वतंत्रता का संघर्ष केवल राजनैतिक स्तर पर नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक- सभी स्तरों पर मुक्ति प्राप्त करने के लिए था, इन्हीं में भाषिक स्तर पर स्वाधीन होने का लक्ष्य भी शामिल थादेश की आज़ादी के साथ हिंदी को राष्ट्रभाषा, राजभाषा और संपर्क भाषा- इन तीनों भूमिकाओं में सक्षम और संपन्न बनाने की आवश्यकता प्रबल हो उठीदेश की बहुमुखी उन्नति को संभव करने के लिए हिंदी को विज्ञान, विधि, वाणिज्य, प्रशासन, शिक्षा और साहित्य- सभी क्षेत्रों की भाषा बननी थीइसके लिए प्रचुर पाठ्य सामग्री और साहित्य और शब्दावली की आवश्यकता थी, जिसके लिए अंग्रेज़ी मुख्य स्रोत थी, जिससे अनुवाद करके ही हिंदी को संपन्न बनाया जा सकता था। अंग्रेज़ी प्रशासन की भाषा थी, हिंदी को उसकी जगह लेनी थी, इन सब वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर अंग्रेज़ी को हिंदी के साथ सह राजभाषा का दर्जा दिया गया और दोनों के बीच अनुवाद के माध्यम से आदान-प्रदान का संबंध बनाया गया।

आज सरकारी, ग़ैर-सरकारी और जनता के स्तर पर ऐसी सारी सुविधाएँ और व्यवस्थाएँ जुटाई जा रही हैं, जिससे हिंदी में अनुवाद के द्वारा अधिक से अधिक सामग्री लाई जा सके। पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण, अनुवाद ब्यूरो का संचालन, नेशनल बुक ट्रस्ट, केंद्रीय हिंदी निदेशालय और वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग के द्वारा विभिन्न क्षेत्रों में पाठ्य सामग्री, शब्दावली और अंग्रेज़ी-हिंदी की मानक अभिव्यक्तियों के कोश आदि का प्रकाशन कर साहित्येतर अनुवाद का कार्य बड़े पैमाने पर चलाया जा रहा है।


2.1. साहित्येतर अनुवाद : सामान्य संदर्भ

साहित्येतर अनुवाद यूँ तो मूल निष्ठ होता है किंतु कोरा शाब्दिक अनुवाद इसे निष्प्राण और दुर्बोध बना देता है। संदर्भ के अनुसार पर्यायों का चयन अनुवादक की क्षमता और विवेक को दर्शाता है। उदाहरण के लिए To dismiss शब्द लिया जा सकता है। इसके दो पर्याय हैं- ख़ारिज करना, बर्खास्त करना। यदि 'मामला' हो तो 'ख़ारिज' प्रयोग में आएगा और यदि 'व्यक्ति' हो तो 'बर्खास्त' का प्रयोग होगा। अनुवादक को विषय पर अधिकार होना चाहिए। पारिभाषिक शब्दावलियाँ तो अनेक हैं, किंतु कब, किस संदर्भ में किस पारिभाषिक शब्द का प्रयोग किया जाए, यह विषय ज्ञान के बिना संभव नहीं। इसी तरह कुछ और मुद्दे हैं, जो हमारे देश की बहुभाषिकता, शिक्षा और साक्षरता, एक सर्वमान्य भाषा-नीति से जुड़े हैं, जैसे आज भी साहित्येतर क्षेत्र में कार्यालयीन और पत्रकारिता के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में अनुवाद की गति धीमी है। वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद के लिए पर्याप्त संदर्भ कोशों का अभाव, अधिकारी और मर्मज्ञ अनुवादकों का अभाव, अनुवाद - अधिकार और स्वत्वाधिकार (कॉपी राइट) की समस्या आदि इसके कारण हैं। यह भी देखा जाना चाहिए कि अनूदित सामग्री का यथोचित उपयोग हो रहा है या नहीं।


2.2. साहित्येतर अनुवाद के क्षेत्र

साहित्येतर अनुवाद सामग्री और प्रयोग क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग रूप ग्रहण करता है। मुख्यतः ये क्षेत्र निम्नलिखित प्रकारों में रखे जा सकते हैं- विज्ञान, विधि, वाणिज्य-व्यवसाय और बैंकिंग, विज्ञापन, पत्रकारिता और जन संचार माध्यम, सामाजिक विज्ञान, प्रशासनिक आदि।

2.3. विज्ञान के क्षेत्र में अनुवाद

विज्ञान का अर्थ है- विशिष्ट ज्ञान। इस अर्थ में आजकल पदार्थ विज्ञानों, प्राकृतिक विज्ञानों के साथ-साथ सामाजिक अध्ययन को भी विज्ञान कहा जा रहा है, अर्थात् रसायन शास्त्र, भौतिकी, प्राणि विज्ञान, गणित आदि विज्ञान तो हैं ही- अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र आदि को भी विज्ञान ही की कोटि में रखा जा रहा है जबकि इन दोनों प्रकार के विज्ञानों में प्रकृतिगत अंतर है। रसायन शास्त्र के ढंग पर राजनीतिशास्त्र का अध्ययन नहीं किया जा सकता क्योंकि एक का क्षेत्र प्रयोगशाला है तो दूसरे का समाज, फिर भी इन दोनों को विज्ञान इसलिए माना जा रहा है कि दोनों में तथ्यपरक, वस्तुनिष्ठ, कारण-कार्य-क्रम में सीमित प्रविधि का उपयोग किया जाता है। यहाँ हम विज्ञान अर्थात् वैज्ञानिक साहित्य जैसे गणित, भौतिक विज्ञान, प्राणि तक ही अपनी चर्चा को सीमित रखेंगे।

आधुनिक भारत में ज्ञान-विज्ञान और शिक्षा के प्रसार के साथ-साथ वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद कार्य तेज़ी से हो रहा है। वैज्ञानिक ज्ञान और भाषा-शैली की स्पष्टता और एकार्थता। पारिभाषिक शब्दों का संदर्भानुसार प्रयोग अनुवादक तभी कर सकेगा जब उसे अनूदित विषय अर्थात् स्रोत भाषा पाठ के वर्ण्य विषय का समुचित ज्ञान होगा। उदाहरण के लिए Plant शब्द के दो पर्याय होते हैं- पौधा और संयंत्र ।

अगर वनस्पति विज्ञान का संदर्भ हो तो 'पौधा' अर्थ में प्रयुक्त किया जाएगा और अगर Atomic Plant की बात हो तो 'परमाण्विक संयंत्र' अनुवाद ठीक होगा। भाषा-शैली के अंतर्गत अनुवादक को अनूदित पाठ के लिए उपयुक्त संकेतों, प्रतीकों के साथ-साथ स्पष्ट और सरल वाक्य रचना की भी क्षमता प्राप्त होनी चाहिए। जैसे गणित की पुस्तक में पारिभाषिक शब्द, संकेत, सूत्र, प्रतीक आदि का ज्ञान होते हुए भी अनुवादक को कितना सावधान रहना पड़ता है, इसका उदाहरण डॉ. भोलानाथ तिवारी ने अपनी पुस्तक 'अनुवाद विज्ञान' में इस प्रकार दिया है-

 1) मूल वाक्य      :   A finite point set has no limit points.                 

     विषय से अल्प परिचित या अपरिचित अनुवाद का अनूदित पाठ-

     परिमित समुच्चय में सीमाबिंदु नहीं होते ।

    सही अनुवाद : परिमित समुच्चय के सीमाबिंदु नहीं होते ।

2) मूल पाठ : Gene Therapy is a new branch of clinical medicine that attempts to apply our recently acquired knowledge of the structure of the genetic material popularly called DNA to treat genetic diseases.

अनुवाद 1:  जीन चिकित्सा नैदानिक आयुर्विज्ञान की एक नयी शाखा है, जिसमें वंशानुगत रोगों के उपचार के लिए डी. एन. ए. नामक आनुवंशिक पदार्थ की संरचना के बारे में हाल ही में ज्ञान जानकारी के उपयोग की संभावनाओं का पता लगाया जा रहा है।

अनुवाद 2: जीन वंशानुक्रम गुणों की इकाइयाँ हैं और डी. एन. ए. वह पदार्थ है जिसकी रासायनिक संरचना में वंशक्रम सूचना अंतर्निहित होती है। इस बारे में हाल ही में जो जानकारी मिली है, आनुवंशिक रोगों को ठीक करने में उसके उपयोग की संभावनाओं का पता लगाया जा रहा है। इस दिशा में अनुसंधान कार्य हो रहा है कि क्या डी. एन. ए. अणु में स्थित जीनों की संरचना में फेरबदल करने से ऐसे रोगों का उपचार हो सकता है? इस विधि को जीन चिकित्सा कहते हैं और यह नैदानिक आयुर्विज्ञान की एक नयी शाखा है।

इससे भी यह प्रतिपादित होता है कि वैज्ञानिक साहित्य को मूल से प्रतिबद्ध होते हुए भी अनूदित पाठ के पाठक के लिए बोधगम्य और प्रेषणीय होना चाहिए। वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद में अंतर्राष्ट्रीय पारिभाषिक शब्दावली, संकेतों और प्रतीकों का ही प्रयोग किया जाता है।





2.4. विधि के क्षेत्र में अनुवाद

विधि साहित्य की भाषा प्रकृति से ही जटिल होती है क्योंकि किसी आदेश, नियम, क़ानून आदि का उल्लेख करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि मूल बातें, विचार सूत्र और मुद्दे पूरी तरह से समाविष्ट और स्पष्ट हो जाएँ, किसी प्रकार के द्विअर्थीकरण, अन्यथाकरण, संदेह या भ्रम की गुंजाइश न रह जाए। स्पष्ट है कि इसके अनुवाद में भी इन्हीं सब बातों का ध्यान रखा जाएगा। फिर भी, यह तो अनुवादक को ध्यान में रखना ही पड़ेगा कि लक्ष्य-पाठक या संबंधित व्यक्ति तक अनुवाद अपने सही कथ्य के साथ पहुँचे, अर्थात् अनुवाद बोधगम्य हो, भले ही इसके लिए अनुवादक को कुछ अंशों की व्याख्या देनी पड़े। नीचे एक मूल पाठ के दो अनुवाद दिये जा रहे हैं, पहला मूल पाठ का शब्दशः अनुवाद है जबकि दूसरा व्याख्यात्मक शैली में किंतु बोधगम्य है।

मूल पाठ : Whoever cheats and thereby dishonestly induces the person deceived to deliver any property to and person or to make alter or destroy the whole or any part of a valuable security or anything which is signed or sealed, any which is capable of being converted into a valuable security, shall be punished with impris- onment of either description for a term which may extend to seven years, and shall also be liable to fine.

अनुवाद 1 : यदि कोई व्यक्ति छल करता है और एतद् द्वारा उस व्यक्ति को जिसे धोखा दिया गया है, बेईमानी से उत्प्रेरित करता है व कोई संपत्ति किसी व्यक्ति को परिदत्त कर दे या किसी मूल्यवान प्रतिभूति को, या किसी वस्तु को जो हस्ताक्षरित या मुद्रांकित है और जो मूल्यांकन में संपरिवर्तित किये जाने योग्य है, पूर्णतः या अंशतः रच दे, परिवर्तित कर दे या नष्ट कर दे तो दोनों में से किसी भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जायेगा और वह जुर्माने से भी दंडनीय होगा।

अनुवाद 2 : जो कोई धोखा देता है और इस भाँति धोखे के शिकार हुए व्यक्ति की संपत्ति को बेईमानी से दूसरे को दे देने के लिए फुसलाता है, किसी मूल्यवान प्रतिभूति को, किसी मुहरबंद या हस्ताक्षरित वस्तु को जो मूल्यवान प्रतिभूति बन सकती है, पूर्णतः बदल देता है, गढ़ता है या नष्ट कर देता है, उसे सात वर्ष तक के (कठोर या साधारण) दोनों में से किसी प्रकार का कारावास अथवा जुर्माने को दंड दिया जाएगा।

स्पष्ट है कि विधि साहित्य की जाटिल और सम्मिश्र वाक्य संरचना को आवश्यकतानुसार तोड़कर छोटे- छोटे उपवाक्यों में अनुवाद करने से अनुवाद प्रेषणीय बनता है। अंग्रेज़ी की वाक्य-रचना SVO अर्थात् कर्त्ता-क्रिया-कर्म में होने के कारण हिंदी अनुवाद में बहुधा कुछ परिवर्तन तो करना ही पड़ता है क्योंकि हिंदी वाक्य में अन्विति SOV अर्थात् कर्त्ता-कर्म-क्रिया वाली होती है। इसके अतिरिक्त अंग्रेज़ी में कुछ शब्दों का पर्याय सावधानी से प्रयोग करना पड़ता है, जैसे shall, इसका अर्थ है- 'होगा' जबकि may का प्रयोग होना पड़ेगा- 'हो सकेगा'। उदाहरण के लिए Order shall be given का अनुवाद होता है- 'आदेश दिया जाएगा, जबकि Order may be given का अनुवाद होगा- 'आदेश दिया जा सकता है।'


2.5. वाणिज्य-व्यवसाय और बैंकिंग के क्षेत्र में अनुवाद

आज वाणिज्य-व्यवसाय का युग है। बैंक आज की वाणिज्यिक व्यवस्था के मुख्य अभिकरण हैं इसीलिए बैंकों में हिंदी अधिकारी, हिंदी अनुवादक के माध्यम से द्विभाषिक स्थिति अपरिहार्य है। बैंकों का कामकाज दो स्तरों पर चलता है- एक आंतरिक बैंक प्रशासन और दूसरा बाह्य संचालन अर्थात् ग्राहकों के साथ संपर्क। पहले स्तर पर- स्थाई फ़ॉर्म या ऐसा साहित्य जिसमें बैंकिंग की कार्यविधि, अनुदेश, पुस्तिकाएँ, कर्मचारियों की आचार संहिताएँ, सेवा पुस्तिकाएँ और मुख्य एवं शाखा कार्यालयों से किया गया पत्राचार होता है। दूसरे स्तर पर सभी प्रकार के प्रपत्र या फ़ॉर्म, आवेदन पत्र, जमा पर्चियाँ, चेक, सूचनाएँ, विज्ञापन सामग्री आदि का समावेश होता है। आज बैंकों में बाह्य और आंतरिक सभी क्षेत्रों में हिंदी का प्रयोग अनिवार्य है। अंग्रेज़ी से अनुवाद होने के कारण अनुवादक को ध्यान में रखना पड़ता है कि उसकी भाषा अंग्रेज़ी की छाया से मुक्त रहे, वाक्य जटिल व बोझिल न हों, पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग संदर्भानुसार हो। चूँकि बैंकिंग का संबंध वित्तीय क्षेत्र में होता है, यहाँ भी विधि साहित्य के अनुवाद के समान सटीक, एकार्थी, सुस्पष्ट और मूलनिष्ठ अनुवाद करना आवश्यक है, लेकिन इस अनुवाद को पाठकों/ग्राहकों के लिए बोधगम्य भी होना चाहिएउदाहरण के लिए Governor का अर्थ है 'राज्यपाल', लेकिन रिज़र्वबैंक के गवर्नर को राज्यपाल नहीं कहा जा सकता। इसलिए इसे 'गवर्नर' ही रहने दिया गया है। इसी प्रकार कई शब्द हैं, जिनका बैंकों में विशिष्ट अर्थो में प्रयुक्त प्रयोग होता है, जैसे - Draft = प्रारूप (लेकिन बैंक में बैंक ड्राफ़्ट); Credit = साख, ऋण (जमा करना, उधार, जमा-शेष); Security= सुरक्षा (प्रतिभूति); Book = पुस्तक ( खाता) आदिबैंकिंग में भी शब्दानुवाद हमेशा सही नहीं होतामूल पाठ के कथ्य को स्पष्ट करने में अनुवाद पर्याय कैसे चुने जाएँ। उदाहरण के लिए-

मूल पाठ      : The Cheque is out date.

अनुवाद- 1   : चेक गतावधिक है।

अनुवाद -2   : चेक की मियाद निकल चुकी है।

इनमें दूसरा अनुवाद बोधगम्य है जबकि पहला अनुवाद सही शब्दों का चयन होते हुए भी  ग्राहक की समझ से परे हैं  


2.6. विज्ञापन के क्षेत्र में अनुवाद

वाणिज्य-व्यवसाय से संबंधित लेकिन प्रकृति में कुछ अलग क्षेत्र है- विज्ञापन । विज्ञापन का नयोजन ही होता है उत्पाद (Product) या माल को बेचना। इसके लिए जितना आकर्षक विज्ञापन होगा, उतना ही ग्राहक उसकी ओर खिचेंगे। आज विज्ञापनों के क्षेत्र में भी अंग्रेज़ी के अनुकरण में हिंदी चल रही है, जैसे-

Thundering cool= तूफ़ानी ठंडा

Made for each other = एक दूजे के लिए

Neighbour's envy, Owner's pride = पड़ोसियों की जले जान, आपकी बढ़े शान।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि विज्ञापनों का अनुवाद विशुद्ध सूचनापरक नहीं हो सकता। यद्यपि विज्ञापनों का प्रयोजन शुद्ध व्यावसायिक होता है, किंतु इसके भाव, भाषा, शैली और अभिव्यंजना अपने व्यावसायिक उद्देश्य को छिपा कर ग्राहक को विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि वह वस्तु-विशेष ( जिसका कि विज्ञापन किया जा रहा है) ग्राहक के अपने हित में है और विज्ञापनदाता ग्राहक के सच्चे शुभसूचक ! विज्ञापनों का अनुवाद सूचना से रचना के बीच का कार्य है, अर्थात् ग्राहक को न केवल उत्पाद के गुणों के बारे में सूचित करना है बल्कि उसे उत्प्रेरित भी करना है कि वह उस वस्तु को प्राप्त करने के लिए क्रियाशील हो जाए। आजकल बैंकों के, जीवन बीमा निगम के, गृह ऋण या अन्य प्रकार के ऋण देने वाली संस्थाओं के एक से एक लुभावने विज्ञापन इसी उद्देश्य से निकाले जा रहे हैं अतएव अनुवादक को भी अपनी रचनात्मक प्रतिभा का भरपूर उपयोग करना पड़ता हैI

2.7. पत्रकारिता और जनसंचार माध्यमों में अनुवाद

पत्रकारिता एवं जनसंचार अन्य माध्यमों में अनुवाद की महत्वपूर्ण भूमिका है। जन संचार माध्यमों को दो वर्गों में रखा जा सकता है- इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया या मुद्रित माध्यम । इलेक्ट्रॉटिक माध्यम के अंतर्गत दूरदर्शन व रेडियो में साहित्येतर अनुवाद मुख्यतः लेखों, समाचारों और सूचना - तंत्र की अन्य प्रयुक्तियों में किया जाता है। जबकि मुद्रित माध्यम के अंतर्गत पत्रकारिता आज बहुत विकसित और प्रभावपूर्ण क्षेत्र है । पत्रकारिता का क्षेत्र भी बहुत व्यापक है- जैसे समाचार पत्रों में दिये गये समाचार जिनमें राजनीतिक गतिविधियों से लेकर दुर्घटनाओं तक की ख़बरें होती हैं। समाचार देते समय शब्दानुवाद ही करने की कोशिश की जाती है जिससे मूलनिष्ठता और तथ्यपरकता बनी रह सके। पत्रकारिता की अपनी शब्दावली होती है, जिसका आवश्यकतानुसार निर्माण हुआ है। जैसे खेल-कूद पत्रकारिता में 'गोल', 'रन' जैसे शब्द अंग्रेज़ी से यथावत ले लिये गये हैं, लेकिन कुछ का अनुवाद हुआ है जैसे 'मैच का ड्रा' रहा का भी प्रयोग होता है और 'मैच अनिर्णीत रहा' का भी प्रयोग होता है। 'ओपनिंग बैट्समैन' के लिए 'सलामी बल्लेबाज़' भावानुवाद का उदाहरण है। फ़िल्म पत्रकारिता में 'बॉक्स ऑफ़िस' के लिए 'टिकट खिड़की' इसी तरह का अनुवाद है। पत्रकारिता के अपने पारिभाषिक शब्द होते हैं, जिनका अनुवाद करने के लिए अनुवादक को क्षेत्र और संदर्भ की जानकारी होनी चाहिए। जैसे-

 

Running matter       धारावाही सामग्री

Margin                      हाशिया

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Review                        समीक्षा आदि

यद्यपि हिंदी में समाचार पत्रों और पत्रकारिता की सुदृढ़ और गौरवशाली परंपरा चली आ रही है, फिर भी आज समाचारों का मुख्य स्रोत अंग्रेज़ी होने के कारण कई बार हिंदी समाचारों की भाषा अंग्रेज़ी का शब्दानुवाद लगती है। अनुवादक को यहाँ सावधानी से काम लेना होता है ताकि लक्ष्य भाषा-पाठकों के लिए अनुवाद बोझिल न बने। 

2.8. सामाजिक विज्ञानों का अनुवाद

साहित्येतर सामग्री का एक रूप है वैज्ञानिक साहित्य तो दूसरा पक्ष है- समाज वैज्ञानिक साहित्य । विज्ञान और वैज्ञानिक साहित्य प्राकृतिक विज्ञानों और मनुष्य व प्रकृति के बीच संबंधों का लेखा-जोखा है तो समाज वैज्ञानिक साहित्य मनुष्य और मनुष्य के बीच संबंधों का आईना होता है। इसलिए समाज विज्ञानों का अनुवाद सूचनापरक होने के साथ-साथ भावपरक भी होता है। यह पूरी तरह तथ्यपरक तो होता है लेकिन उस अर्थ में वस्तुनिष्ठ नहीं हो सकता जिस अर्थ में प्राकृतिक विज्ञान होते हैं। राजनीति, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शन, मनोविज्ञान, इतिहास आदि के अनुवाद में पारिभाषिक शब्दावली की आवश्यकता तो पड़ती ही है, स्रोत भाषा की छाया से लक्ष्य भाषा को बचाकर एक सहज, सुबोध, प्रभावी अनुवाद प्रस्तुत करने के कठिन कार्य से अनुवादक को गुज़रना ही पड़ता है।


2.9. प्रशासनिक क्षेत्र में

'अनुवाद हिंदी को संघ की राजभाषा और कुछ अनिवार्य कारणों से अंग्रेज़ी को सह राजभाषा घोषित करने और अनिश्चित काल तक इस द्विभाषिक स्थिति को बनाये रखने के परिणामस्वरूप प्रशासन के क्षेत्र में अनुवाद में मात्रात्मक और गुणात्मक परिवर्तन हुआ है। केंद्र एवं राज्यों के बीच और अपने-अपने क्षेत्र में प्रशासनिक कार्यालयों के मध्य कार्यालयीन प्रयुक्ति की एक जटिल, बहुस्तरीय और बहुमुखी संरचना विकसित हो चली हैकार्यालयी अनुवाद की सामग्री मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं, एक सांविधानिक- अर्थात् स्थाई सामग्री जिसके अंतर्गत संविधान, अधिनियम, अध्यादेश, बिलअनुबंध-पत्र आदिदूसरी- असांविधानिक-जिसके अंतर्गत मैन्युअल, नियम पुस्तिकाएँ, कार्यालयीन पत्राचार परिपत्र, ज्ञापन आदि । कहा जा सकता है कि सांविधिक सामग्री मुख्यत: विधि क्षेत्र की सामग्री होती है जबकि असांविधिक सामग्री प्रशासन के व्यावहारिक प्रयोजनों की सामग्री होती है। कार्यालयीन अनुवाद में भी यह ध्यातव्य है कि मूलनिष्ठता के नाम पर बोझिल, निरर्थक, शब्दानुवाद न हो जाए, जैसे Approved as per remarks in the margin= हाशिए की अभ्युक्ति के अनुसार अनुमोदित । यह अनुवाद शब्दश: सही है लेकिन बोधगम्य नहींहोना चाहिए- 'हाशिए में व्यक्त विचार के साथ अनुमोदित' इसी प्रकार एक सामान्य-सा वाक्य है- Marked absent जिसका शाब्दिक अनुवाद किया गया- 'अनुपस्थित लगा दिया गया, जबकि बोधगम्यता की दृष्टि से 'अनुपस्थित माना गया' सही होगा।

कार्यालयी अनुवाद में व्यक्ति नामों और पदनामों के अनुवाद की समस्या मुख्य होती है, जैसे एक पद के अनेक जगह अनेक पर्याय होना, जैसे Manager- प्रबंधक, व्यवस्थापक; Chancellor- अधिपति, कुलपति; Engineer= यंत्री (मध्य प्रदेश में), अभियंता आदि। इसी प्रकार व्यक्तिनामों का संक्षेपण भी तब तक हिंदी में नहीं किया जा सकता जब तक कि पूरे नाम का पता न हो, जैसे Sri V.V. Giri - वी.वी. गिरि, हिंदी एवं भारतीय भाषाओं की मर्यादानुसार यह संक्षेपण होगा- वा. वें. गिरि, लेकिन इसके लिए पूरे नाम 'वाराह गिरि वेंकट गिरि' की जानकारी होनी चाहिए। अंग्रेज़ी से अनुवाद करने में शब्दानुकरण और अंग्रेज़ी की छाया से ग्रस्त हिंदी प्रयोग का सबसे अधिक दोषारोपण कार्यालयीन क्षेत्र में ही लगाया जाता रहा है। इसके लिए अनुवादक को मौलिक लेखन का अभ्यास करने और अनुवादकीय सूझबूझ के सहारे अनूदित पाठ को अधिक से अधिक सहज, सुबोध और प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता है। इस कमी को पूरा करने के प्रयास भी हो रहे हैं।


2.10. साहित्येतर अनुवाद : सामान्य संदर्भ

साहित्येतर अनुवाद के क्षेत्र विविध स्तरीय हैं, विविध हैं और व्यापक हैं। ऊपर की चर्चा में हम देख चुके हैं कि इन क्षेत्रों की कुछ अपनी समस्याएँ हैं। इसके बावजूद कुछ सामान्य संदर्भों को रेखांकित किया जा सकता है, जिनके आधार पर साहित्येतर अनुवाद की सामान्य चुनौतियों, कठिनाइयों और विशेषताओं को परिगणित किया जा सके। साहित्येतर अनुवाद यूँ तो मूल निष्ठ होता है किंतु कोरा शाब्दिक अनुवाद इसे निष्प्राण और दुर्बोध बना देता है। संदर्भ के अनुसार पर्यायों का चयन अनुवादक की क्षमता और विवेक को दर्शाता है। उदाहरण के लिए To dismiss शब्द लिया जा सकता है। इसके दो पर्याय हैं- ख़ारिज करना, बर्खास्त करना। यदि 'मामला' हो तो 'ख़ारिज' प्रयोग में आएगा और यदि 'व्यक्ति' हो तो 'बर्खास्त' का प्रयोग होगा। अनुवादक को विषय पर अधिकार होना चाहिए। पारिभाषिक शब्दावलियाँ तो अनेक हैं, किंतु कब, किस संदर्भ में किस पारिभाषिक शब्द का प्रयोग किया जाए, यह विषय ज्ञान के बिना संभव नहीं। इसी तरह कुछ और मुद्दे हैं, जो हमारे देश की बहुभाषिकता, शिक्षा और साक्षरता, एक सर्वमान्य भाषा-नीति से जुड़े हैं, जैसे आज भी साहित्येतर क्षेत्र में कार्यालयीन और पत्रकारिता के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में अनुवाद की गति धीमी है। वैज्ञानिक साहित्य के अनुवाद के लिए पर्याप्त संदर्भ कोशों का अभाव, अधिकारी और मर्मज्ञ अनुवादकों का अभाव, अनुवाद - अधिकार और स्वत्वाधिकार (कॉपी राइट) की समस्या आदि इसके कारण हैं। यह भी देखा जाना चाहिए कि अनूदित सामग्री का यथोचित उपयोग हो रहा है या नहीं।


2.11. साहित्येतर अनुवाद : उपलब्धियाँ और सीमाएँ

हिंदी की विभिन्न भूमिकाओं- राजभाषा, राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा और माध्यम भाषा- को सुदृढ़ और प्रभावशाली बनाने में साहित्येतर अनुवाद का मुख्य योगदान रहा हैकिसी भी देश और जाति के विकास में सर्जनात्मक और प्रयोजनमूलक गतिविधियों का योग होता है। हमारे देश को स्वाधीन, स्वायत्त और स्वनिर्भर और स्वाभिमानी बनाने के लिए इन दोनों प्रकार की गतिविधियों को हमारी अपनी भाषाओं के धरातल पर संपन्न करने की ऐतिहासिक आवश्यकता को पूरा करने में अनुवाद का विशेष महत्व रहा है। साहित्य से इतर क्षेत्र तो अत्यंत विस्तृत हैं और निरंतर विकासशील हैं। ये क्षेत्र अपनी विशिष्ट सीमाओं और एक सार्वभौमिक स्तर- दोनों रूपों में विकास कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में साहित्येतर क्षेत्रों में अनुवादकों ने बड़ी निष्ठा और अत्यंत प्रतिबद्धता का परिचय दिया हैजहाँ पत्रकारिता, जन संचार के अन्य माध्यम और विज्ञापन जैसे व्यावसायिक क्षेत्रों में धीरे-धीरे अनुवाद से हटकर हिंदी भाषा का सहज, मौलिक रूप उभर रहा है, वहाँ विधि साहित्य, विज्ञान और प्रशासन के क्षेत्र में अब भी अंग्रेज़ी की छाया से ग्रस्त हिंदी के दर्शन हो रहे हैं। फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि साहित्येतर क्षेत्रों में अनुवाद के कारण संवृद्धि हुयी है ।


3. साहित्यिक और साहित्येतर अनुवाद में अंतर