2. साहित्येतर अनुवाद

2.9. प्रशासनिक क्षेत्र में

'अनुवाद हिंदी को संघ की राजभाषा और कुछ अनिवार्य कारणों से अंग्रेज़ी को सह राजभाषा घोषित करने और अनिश्चित काल तक इस द्विभाषिक स्थिति को बनाये रखने के परिणामस्वरूप प्रशासन के क्षेत्र में अनुवाद में मात्रात्मक और गुणात्मक परिवर्तन हुआ है। केंद्र एवं राज्यों के बीच और अपने-अपने क्षेत्र में प्रशासनिक कार्यालयों के मध्य कार्यालयीन प्रयुक्ति की एक जटिल, बहुस्तरीय और बहुमुखी संरचना विकसित हो चली हैकार्यालयी अनुवाद की सामग्री मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं, एक सांविधानिक- अर्थात् स्थाई सामग्री जिसके अंतर्गत संविधान, अधिनियम, अध्यादेश, बिलअनुबंध-पत्र आदिदूसरी- असांविधानिक-जिसके अंतर्गत मैन्युअल, नियम पुस्तिकाएँ, कार्यालयीन पत्राचार परिपत्र, ज्ञापन आदि । कहा जा सकता है कि सांविधिक सामग्री मुख्यत: विधि क्षेत्र की सामग्री होती है जबकि असांविधिक सामग्री प्रशासन के व्यावहारिक प्रयोजनों की सामग्री होती है। कार्यालयीन अनुवाद में भी यह ध्यातव्य है कि मूलनिष्ठता के नाम पर बोझिल, निरर्थक, शब्दानुवाद न हो जाए, जैसे Approved as per remarks in the margin= हाशिए की अभ्युक्ति के अनुसार अनुमोदित । यह अनुवाद शब्दश: सही है लेकिन बोधगम्य नहींहोना चाहिए- 'हाशिए में व्यक्त विचार के साथ अनुमोदित' इसी प्रकार एक सामान्य-सा वाक्य है- Marked absent जिसका शाब्दिक अनुवाद किया गया- 'अनुपस्थित लगा दिया गया, जबकि बोधगम्यता की दृष्टि से 'अनुपस्थित माना गया' सही होगा।

कार्यालयी अनुवाद में व्यक्ति नामों और पदनामों के अनुवाद की समस्या मुख्य होती है, जैसे एक पद के अनेक जगह अनेक पर्याय होना, जैसे Manager- प्रबंधक, व्यवस्थापक; Chancellor- अधिपति, कुलपति; Engineer= यंत्री (मध्य प्रदेश में), अभियंता आदि। इसी प्रकार व्यक्तिनामों का संक्षेपण भी तब तक हिंदी में नहीं किया जा सकता जब तक कि पूरे नाम का पता न हो, जैसे Sri V.V. Giri - वी.वी. गिरि, हिंदी एवं भारतीय भाषाओं की मर्यादानुसार यह संक्षेपण होगा- वा. वें. गिरि, लेकिन इसके लिए पूरे नाम 'वाराह गिरि वेंकट गिरि' की जानकारी होनी चाहिए। अंग्रेज़ी से अनुवाद करने में शब्दानुकरण और अंग्रेज़ी की छाया से ग्रस्त हिंदी प्रयोग का सबसे अधिक दोषारोपण कार्यालयीन क्षेत्र में ही लगाया जाता रहा है। इसके लिए अनुवादक को मौलिक लेखन का अभ्यास करने और अनुवादकीय सूझबूझ के सहारे अनूदित पाठ को अधिक से अधिक सहज, सुबोध और प्रभावशाली बनाने की आवश्यकता है। इस कमी को पूरा करने के प्रयास भी हो रहे हैं।