3. नाटकानुवाद

3.1. नाटकानुवाद के अनुवाद की समस्याएँ

नाटकों के अनुवाद की दो कोटियाँ बनती हैं – (एक) मंचीय नाटकानुवाद और (दो) पाठ्य नाटकानुवाद।  पाठ्य-नाटकानुवाद में नाटक के पाठ का शब्दानुसारी या वाक्यानुसारी अनुवाद किया जा सकता है जबकि मंचीय-नाटकानुवाद में अभियन, रस एवं प्रभाव को दृष्टि में रखकर, एक तरह का अनुसृजन करना होता है।  स्पष्ट है कि इस प्रकार के अनुवाद के लिए अनुवादक में नाट्य लेखन की क्षमता भी मौजूद होनी चाहिए। रंगमंच के लिए मंचीय अनुवाद का विशेष महत्त्व होता है और कभी-कभी पाठ्यानुवाद के आधार पर नया मंचीय नाटकानुवाद तैयार करना पड़ता है। अन्य भाषाओं के नाटकों को मंच पर प्रस्तुत करते समय ऐसा परिवर्तन प्रायः आवश्यक हो जाता है। नाटकों के अनुवाद की प्रमुख समस्याएँ को निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया जा सकता है-

(1) नाटकानुवाद की सबसे बुनियादी समस्या सांस्कृतिक परिवेश के अन्तरण की होती है। स्रोत एवं लक्ष्य भाषा के मध्य सांस्कृतिक परिवेश के अन्तर के कारण ही कभी-कभी रंगमंचीय नाटकानुवाद सफल नहीं हो पाता है। क्योंकि पाठ में व्यंजित अर्थ, अर्थ के आयाम, हास्य-व्यंग्य आदि सांस्कृतिक परिवेश में अभिन्न रूप से जुड़े रहते हैं।

नाटकों के अनुवाद में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ पायी जाती हैं। (1) स्रोत भाषा के परिवेश को लक्ष्य भाषा के परिवेश से स्थानापन्न करना और (2) लक्ष्य भाषा की सहजता को ध्यान में रखते हुए मूल की संस्कृति के तत्त्वों का अनुवाद करना या उनकी रक्षा करना।

नाट्यानुवाद की पहली प्रवृत्ति भारतेन्दु हरिश्चंद्र, जी.पी. श्रीवास्तव आदि पुराने नाटककारों के अनुवाद में पायी जाती है, जिसमें स्रोत भाषा के परिवेश को अनुवाद में लक्ष्य भाषा के परिवेश से स्थानापन्न किया जाता है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने ‘मर्चेन्ट आफ़ वेनिस’ नामक शेक्सपियर के नाटक के अनुवाद में (दुर्लभ बंधु 1880) भारतीय वातावरण उपस्थित करते हुए वेनिस का वंशपुर, एण्डोनिया को अजन्त, पोर्शिया को पुरश्री, शैलाक को शैलाक्ष, ईसाई को हिन्दू और यहूदी को जैन बना दिया था। जी.पी. श्रीवस्तव ने मोलियार के फ्रेंच नाटकों के अनुवाद में हास्य-व्यंग्य की अभिव्यक्ति समान भारतीय के स्थितियों की अभिव्यक्ति द्वारा किया गया है। उनके ‘नाक में दम’, ‘मियाँ की जूती मियाँ के सिर पर’ आदि अनुवादों में फ्रेंच वातावरण नहीं के बराबर है।

दूसरे प्रकार की प्रवृत्ति अनुसार नाटक के सांस्कृतिक परिवेश के संप्रेषण में  लक्ष्य भाषा की सहजता को ध्यान में रखते हुए मूल की संस्कृति के तत्त्वों का अनुवाद या उनकी रक्षा करने की कोशिश की जाती है। यह वास्तव में एक मध्यमार्ग ही है जिसमें पाठ की नाटकीय अन्विति एवं मूल सांस्कृतिक तत्त्वों के बीच एक सन्तुलन बिठाने का प्रयास किया जाता है। यही नाटकानुवाद में पुनः सृजन की प्रक्रिया है। समकालीन भारतीय नाटकानुवादक इसी विचारधारा से प्रेरित होकर कलात्मक नाटकानुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं।

(2) नाटकानुवाद की दूसरी प्रमुख समस्या संवादों के अनुवाद की है। नाटकानुवाद की भाषिक सफलता संवादों के प्रभावपूर्ण अनुवाद पर निर्भर करती है। नाटक-भाषा की प्रमुख विशेषताएँ हैं- सरलता एवं तीव्र संवेदन-क्षमता। अनुवाद की भाषा में भी ये दोनों गुण अत्यंत आवश्यक हैं। नाटकानुवाद में पात्रानुकूल भाषा-शैली के परिवर्तन पर अनुवादक को विशेष ध्यान देना पड़ता है। नाटक की भाषा अक्सर शिष्ट एवं अनौपचारिक-जनभाषा का समन्वित रूप होती है। अनुवाद को जीवंत बनाने के लिए मूल के इस भाषा-मिश्रण की कला की पहचान आवश्यक है। उस मिश्रण-कला के अनुरूप ही लक्ष्य भाषा में वैसे ही जीवंत मुहावरों का प्रयोग करना पड़ता है। नाटक में संवादों का बहुत महत्त्व होता है। संवाद को प्रभावी बनाने के लिए अक्सर शब्दालंकारों, बिंबों और प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है। अनुवाद को इन सब पर ध्यान देना पड़ता है। इसके अतिरिक्त वाक्य का नाटकीय प्रभाव भी अत्यन्त महत्त्पूर्ण होता है। इसलिए वाक्य रचना को प्रवाहपूर्ण एवं गतिशील बनाये रखना आवश्यक है। यहाँ तक कि छन्दों के अनुवाद में भी नाट्य प्रभाव का भी पूरा ख्याल रखना पड़ता है। हरिवंशराय बच्चन के मैकबैथ और प्रतिभा अग्रवाल द्वारा किया गया बादल सरकार के एवं इंद्रजित के काव्यांशों में अनुवाद आदि छंदों के नाटकानुकूल अनुवाद के अच्छे उदाहरण हैं। छन्दों का नीरस गद्यानुवाद नाटकीयता को वहन करने में प्रायः असफल होता है।

(3) नाटकानुवाद की तीसरी समस्या स्रोत एवं लक्ष्य भाषा की भिन्न प्रकृति से संबंधित है।  स्रोत एवं लक्ष्य भाषाओं की नाट्य परंपराओं की भिन्नता के कारण अनुवादक को नाटकों के अनुवाद में कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना पड़ता है। पाश्चात्य नाटकों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में और भारतीय नाटकों के अनुवाद पश्चिमी भाषाओं में करते समय यह समस्या विशेष रूप से उपत्न्न होती है। रंगनिर्देश, नाटकीय औपचारिकताएं, लोकरंग-मंच की युक्तियाँ आदि के रूपान्तरण में अनुवादक को अपनी कुशलता, सजगता एवं सृजनात्मकता का परिचय देना होता है। पाश्चात्य क्लासिकी नाटकों के मंचीय अनुवाद एवं प्रस्तुति में अल्काजी तथा अन्य कई भारतीय निर्देशकों एवं अनुवादकों ने भारतीय रंगमंचीय परंपराओं का भी समावेश करके नाटक को प्रस्तुत किया है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि सफल मंचीय अनुवाद, मंच-शिल्पी निर्देशक एवं अनुवादक के सम्मिलित प्रयत्नों, प्रयोगों एवं अनुभवों से ही संभव है।

(4) नाटक की सफलता भाव एवं रस की व्यंजना पर निर्भर करती है। नाटकानुवाद की सफलता भी इन्हीं तत्त्वों पर आधारित होती है। नाटकानुवाद में सृजनवत्ता और कला के तत्त्व की ज्यादा और निरे शब्दानुवाद की गुंजाइस कम होती है। इसी कारण श्रेष्ठ नाट्यानुवाद किसी भी साहित्य के अभिन्न अंग बन जाते हैं। हिन्दी में राजा लक्ष्मण सिंह की ‘शकुन्तला’ (1863), भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के ‘कर्पूर मंजरी’, ‘मुद्रराक्षस’, ‘रत्नावली’ आदि अनुवाद, बांग्ला से रूपनारायण पांडेय, प्रतिभा अग्रवाल आदि के अनुवाद तथा मराठी से विजय तेन्दुलकर आदि के अनुवाद हिन्दी नाट्य साहित्य के अभिन्न अंग माने जाते हैं। इन सब नाटकानुवादों की सफलता का कारण सृजनवत्ता ही है। वैसे तो प्रेमचन्द ने गालस वर्दी (1930-31) का लक्ष्मीनारायण मिश्र ने इब्सन का राजेन्द्र यादव ने चेखव (1957) के नाटकों अनुवाद करके यह सिद्ध किया है कि नाटकानुवाद मौलिक-लेखन जैसा ही महत्त्वपूर्ण सृजनात्मक कार्य है।