साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति
| साइट: | Dr. B.R. Ambedkar Open University Online Learning Portal |
| कोर्स: | साहित्यिक एवं साहित्येतर अनुवाद |
| पुस्तक: | साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति |
| द्वारा छापा गया: | अतिथि उपयेागकर्ता |
| दिनांक: | बुधवार, 15 अप्रैल 2026, 1:44 AM |
1. साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति
साहित्यिक अनुवाद से तात्पर्य है सर्जनात्मक साहित्य का अनुवाद, जैसे कविता, नाटक, उपन्यास-कहानी जिसमें रचना पूरी कल्पनात्मक होती है। भले ही उसका आधार, प्रेरणा और सूत्र जीवन के यथार्थ से लिया गया हो। इसी नाते अनुवाद पुनर्रचना या पुनर्सृजन होता है क्योंकि एक भाषा की रचना को दूसरी भाषा में उसी ऊर्जा, संवेदना और सौंदर्य के साथ प्रस्तुत करना कि वह एक ओर स्त्रोत भाषा से प्रतिबद्धता निभाए और दूसरी ओर लक्ष्य भाषा में भी उसकी पहचान बने, एक दुष्कर कार्य है। अनुवादक को दोहरा कार्य करना पड़ता है। एक ओर मूल पाठ की अंत:प्रेरणा, रचना-प्रक्रिया और प्रेषणीयता को आत्मसात् करना और दूसरी ओर लक्ष्य भाषा में उसकी पुनर्दृष्टि करना। इस दृष्टि से अनुवादक में कारयित्री और भावयित्री दोनों प्रकार की प्रतिभाओं का उन्मेष आवश्यक है। साहित्यिक रचनाओं के अनुवाद में अनुवादक को ज्ञान, रसग्राह्यता, संवेदना और कल्पना से काम लेना पड़ता है। कहा गया है कि रचनाकार, रचना करने के क्रम में 'परकाय प्रवेश' कर जीवन के व्यापक और वैयक्तिक सुख-दुःख, राग-विराग का अनुभव करता है ताकि उसे रचना के रूप में अभिव्यक्ति दे सके, ऐसी स्थिति में यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि साहित्य का अनुवादक दो-दो बार 'परकाय प्रवेश' करता है, एक ओर मूल रचना के लेखक के अनुभव जगत में प्रवेश करता है और दूसरी बार लक्ष्य भाषा में उसे रचना की पुनर्प्रस्तुति के लिए वह जैसे स्वयं लेखक का अवतार लेता है साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति जटिल, बहु-आयामी और बहु-स्तरीय होती हैसाहित्य की मुख्यत: तीन विधाएँ हैं, कविता, नाटक और कथा (उपन्यास-कहानी) इन तीनों ही विधाओं की परस्पर भिन्नता के कारण साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति भी भिन्न हो जाती है साहित्यिक अनुवाद में अभिधा का बहुत कम उपयोग होता है, लक्षणा और व्यंजना का अधिक। साहित्येतर अनुवाद में सूचना प्रमुख होती है, तो साहित्यिक अनुवाद में सूचना के साथ और सूचना से अधिक अभिव्यंजना की शैली प्रमुख होती है।
साहित्यिक अनुवाद, साहित्यिक विधाओं की परस्पर भिन्नता के अनुरूप भिन्न समस्याओं और भिन्न अपेक्षाओं से युक्त होता है। साहित्य की मुख्यतः तीन विधाओं को पूर्णतः सर्जनात्मक या सृजनात्मक साहित्य के अंतर्गत रखा जाता है, वे हैं- कविता, नाटक और कथा इसके अनुसार काव्यानुवाद, नाटकानुवाद और कथानुवाद की समस्याओं पर विचार किया जाएगा।
2. काव्यानुवाद
साहित्यिक विधाओं के अनुवाद को सर्वाधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण बताया गया है। कुछ विचारकों के अनुसार तो काव्यानुवाद असंभव है। अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध विद्वान सैम्युअल जॉन्सन ने जैसे हार कर कह दिया था कि कविता का अनुवाद हो ही नहीं सकता। विक्टर ह्यूगो के अनुसार कविता के अनुवाद का विचार ही विवेकहीन और असंभव है। एच.डी. फॉरेस्ट स्मिथ ने कहा कि साहित्यिक कृति का अनुवाद पकाई हुई स्ट्रॉबेरी के समान स्वादहीन होता है। एक विद्वान ने विचार व्यक्त किया कि कविता का अनुवाद सूर्य की किरणों को तृण-रज्जु से बाँधने का प्रयास है। किसी ने कहा कि कविता के अनुवाद में जो अनूदित होने से छूट जाता है, वही कविता है। इसके बावजूद कविता का अनुवाद करने वाले अनुवादक हतोत्साहित हुए हों- ऐसी बात नहीं है। यह ठीक है कि कविता का अनुवाद करने में कठिनाइयाँ आती है, इसके लिए कविता की विशिष्ट संरचना ज़िम्मेदार है। कविता की रचना-प्रक्रिया, प्रेरणा और संपूर्ण संरचना में भाव प्रमुख होता है। भाव, अनुभूति और कल्पना का संश्लिष्ट वितान कविता है। काव्य, बिम्बों की सृष्टि करता है, काव्य का अनुवाद उन बिम्बों की पुनःसृष्टि करना है। इसलिए काव्य का लक्ष्य मात्र अर्थबोध कराना 'नहीं, बल्कि बिम्ब और चित्र के माध्यम से अनुभूति का सहभाग और सहभोग करना होता है। यह सहभाग और सहभोग करने वाला होता है सहृदय पाठक। अनुवादक को लक्ष्य भाषा के पाठकों को उसी अनुभूति का आस्वाद करना होता है, जो अनुभूति स्रोत भाषा में कविता के पाठकों को मिलती है।
कविता के प्रभाव और सम्प्रेषण की चर्चा करते समय यह बात भी ध्यान में रखी जानी चाहिए कि कविता में अकेले कथ्य का प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि कथ्य, शैली, शिल्प, संरचना और संवेदना की मिली-जुली सौंदर्यात्मक अनुभूति में पाठक को सहभागी बनाती है- कविता, इसलिए कविता के अनुवाद स्रोत भाषा से लक्ष्य भाषा की यात्रा के क्रम में इन सब तत्वों का सम्मिश्रण कर उसी मूल अनुभूति की पुनर्प्रस्तुति कठिन होती है। काव्य भी दो प्रकार का होता है- प्रबंध काव्य और मुक्तक काव्य । प्रबंध काव्य में कथा का आधार होने के कारण अनुवाद में भले ही थोड़ी आसानी हो, लेकिन मुक्तक काव्य, जिसके अंतर्गत गीत, प्रगीत, रुबाई, दोहे, क्षणिकाएँ आदि सब आते हैं- के अनुवाद में मूल पाठ के भाव और प्रभाव की पुनर्रचना करना बड़ा चुनौतीपूर्ण कार्य है । संक्षेप में काव्यानुवाद प्रमुख कठिनाइयाँ निम्नलिखित हैं-
(अ) छन्दोबद्ध कविता
(आ) छन्दमुक्त कविता
(इ) अलंकारों का अनुवाद
(ई) बिम्ब, प्रतीक और मिथकों का अनुवाद
(उ) अनुवादक का व्यक्तित्व
(ऊ) सौंदर्य एवं संवेदना का सम्प्रेषण
इनके अतिरिक्त काव्यानुवाद में सांस्कृतिक संदर्भ, शैली और संरचना से जुड़ी अन्य समस्याएँ भी होती हैं, जिनकी चर्चा हम इसी पाठ में साहित्यिक अनुवाद की सामान्य समस्याओं के अंतर्गत करेंगे। यहाँ उन्हीं समस्याओं पर विचार किया जा रहा है, जो काव्यानुवाद से विशेष संबद्ध हैं।
2.1. काव्यानुवाद : छन्दोबद्ध अनुवाद
कविता मुख्यतः और प्रथमतः छन्दोबद्ध रचना होती है, छन्दमुक्त या मुक्तछन्द का प्रयोग बहुत बाद में होने लगा मूल पाठ यदि छंदोबद्ध हो तो अनुवादक को सबसे पहला निर्णय यह लेना होता है कि वह अनुवाद छन्दोबद्ध करे या मुक्तछन्द में या गद्यानुवाद । यदि छन्दोबद्ध अनुवाद करना हो तो दूसरी समस्या उठती है कि मूल पाठ में प्रयुक्त छन्द लक्ष्य भाषा में उपलब्ध है या नहीं, और यदि उपलब्ध हो भी तो अनुवादक क्या उसी छन्द का प्रयोग करना चाहेगा या कर सकेगा। अनुवाद के क्षेत्र में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब लक्ष्य भाषा में समान छन्द सुलभ न होने पर अनुवादक ने अपनी ओर से लक्ष्य भाषा में उसी छन्द को गढ़ा है। रामचरितमानस का रूसी भाषा में अनुवाद करते समय अनुवादक वरान्निकोव ने दोहा - चौपाई के अनुवाद के माध्यम छन्द का निर्माण किया तो अंग्रेज़ी छन्द सॉनेट का निर्माण त्रिलोचन ने हिंदी में किया। उर्दू शेर अग्रेज़ी में उपलब्ध नहीं है किंतु प्रो. शिव के. कुमार ने फ़ैज अहमद 'फ़ैज' की शायरी को अंग्रेज़ी में अ से पुनर्प्रस्तुत करते समय अंग्रेज़ी में 'शेर' छन्द को गढ़ा। किसी कृति का छन्द विधान अनुवादक इतना सम्मोहित कर जाता है कि अनुवाद करने के लिए उसकी प्राथमिकता-छन्द विधान ही बन जाती है। उदाहरणस्वरूप हिंदी की कालजयी कृति- 'कामायनी' को लिया जा सकता है। कामायनी का पहला अंग्रेज़ी अनुवाद श्री बी. एल. साहनी ने किया, जिसमें उन्होंने छन्द का अपना ही रूप रखा, इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि तुक मिलता है या नहीं। 'कामायनी' आधुनिक महाकाव्य है और महाकाव्य शर्तों के अनुसार इसमें अलग-अलग सगों में अलग-अलग छन्दों का प्रयोग हुआ है। 'कामायनी' की इस विशेषता से आकर्षित हुए श्री मनोहर बन्दोपाध्याय और उन्होंने अंग्रेज़ी में अनुवाद करते समय अंग्रेज़ी में वही, छन्द गढ़े जो मूल कृति में प्रयुक्त हुए थे।
2.2. छंदमुक्त अनुवाद
कम छन्दोबद्ध रचना का अनुवाद मुक्त छन्द में किया जा सकता है, इसे गद्यानुवाद भी कहा जाता है। मूल रचना भी मुक्त छन्द में हो सकती है। मुक्त छन्दानुवाद, या छन्दमुक्तानुवाद या गद्यानुवाद महत्वपूर्ण नहीं होता क्योंकि मुक्त छन्द की भी अपनी लय होती है, अपना प्रवाह होता है, अपनी सहजता होती है। इसके लिए अनुवादक को मूल पाठ में कुछ जोड़ना, कुछ छोड़ना और कुछ बदलना होता है। उदाहरण के लिए बोरिस पास्तरनाक की कविता 'The Wind' ली जा सकती है, जिसका अनुवाद धर्मवीर भारती ने किया है और प्रवाह व लय को बनाए रखने के लिए काफ़ी कुछ परिवर्तन किया है।
मूल पाठ
This is the end of me but you live on.
the wind, crying and complaining,
Rocks the house and the forest,
not each pine-tree separately with the whole boundless distance,
like the hulls of sailing ships. Ridding as anchor in a bay
It shakes them not out of mischief,
and not in aimless fury
but to find for you, out of its grief,
words of a lullaby.
अनुवाद
मैं व्यतीत हुआ, पर तुम अभी हो, रहो।
हवा, चीखती-चिल्लाती हुई हवा-झकझोर रही है
मकानों को, जंगलों को
चीड़ के अलग-अलग पेड़ों को नहीं
वरन् सबों को एक साथ-तमाम सीमाहीन दूरियों को-
किसी खाड़ी में लंगर डाले हुए, लहरों पर उठते-गिरते हुए
तमाम जहाज़ों की तरह
और हवा उन्हें झकझोर रही है
केवल चंचलतावश नहीं
न निष्प्रयोजन क्रोध से अंधी होकर वरन् अपनी चरम पीड़ा में से
मंथन में से,
तुम्हारी लोरी के लिए उपयुक्त शब्द
खोजते हुए।
2.3. अलंकारों का अनुवाद
अलंकार साहित्य-मात्र का अलंकरण करते हैं, किंतु कविता में इनकी विशिष्ट भूमिका होती है। अलंकारों में अर्थालंकार का अनुवाद हो भी सकता है, लेकिन शब्दालंकारों का अनुवाद लगभग असंभव है क्योंकि शब्दालंकार शब्द पर आश्रित होता है और लक्ष्य भाषा में समतुल्य शब्द मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं। उदाहरण के लिए यमक अलंकार को लिया जा सकता है, जो निम्नलिखित दोहे में प्रयुक्त हुआ है-
रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून ।
पानी गए न ऊबरे, मोती मानुस, चून ॥
यहाँ 'पानी' शब्द तीन बार आया है, लेकिन तीनों बार अलग-अलग अर्थों में। अब इस दोहे का किसी भी भाषा में अनुवाद करना हो, तो 'पानी' शब्द के तीन अर्थों - आभा, प्रतिष्ठा और जल को व्यंजित करने वाला एक ही शब्द मिलना मुश्किल होगा।
इसके विपरीत अर्थालंकार या अर्थमूलक अलंकार भी अनुवादक के लिए समस्या बन सकते हैं। जैसे प्रत्येक भाषा की अपनी संस्कृति और अपनी सौंदर्य चेतना होती है, जिसे अनुवाद के माध्यम से दूसरी भाषा में रचना कठिन होता है। उदाहरण के लिए जयशंकर प्रसाद रचित 'आँसू' में नायिका का रूप-वर्णन और उसका अंग्रेजी अनुवाद देखिए-
मूल पाठ
शशि- मुख पर घूँघट डाले
आँचल में दीप छिपाये
'जीवन की गोधूली
कौतूहल से - तुम आये
अनुवाद
with a thin veil drawn
over thy lunar face
and a light radiant hidden
in thy skirts
in the ovepucular ever tide of life
thou burst on me like curiosity
यहाँ पर अनुवादक ने संध्या समय दीप प्रज्ज्वलित करने जा रही स्त्री को लक्ष्य भाषा में उतारने की पूरी कोशिश की है, लेकिन अंग्रेज़ी से जुड़ी संस्कृति में 'घूँघट', 'आँचल' आदि का प्रचलन नहीं है। इसलिए भारतीय परिवेश और परिवेष्टन की पुनर्रचना अंग्रेज़ी में नहीं हो सकी, दूसरी 'जीवन की गोधूली' में कौतूहल से आने की जो प्रक्रिया उत्पेक्षा अलंकार द्वारा व्यंजित हुई है उसका भी प्रस्तुतीकरण नहीं हो सका। इसी प्रकार रूपक अलंकार भी अनुवाद कठिन होता है। उपमा, उत्प्रेक्षा अन्योक्ति, संदेह, आदि अलंकार भी अनुवाद के लिए चुनौती बने रहते हैं। कविता, तीन शब्द शक्तियों-अभिधा, लक्षणा और व्यंजना में लक्षणा और व्यंजना-से जुड़ी रहती है। इसलिए अलंकारों का प्रयोग कविता में सर्वाधिक होता है । यहाँ तक कि जिस कविता में अलंकारों का प्रयोग नहीं हुआ हो, वहाँ भी अनुवाद के क्रम में मूल पाठ की सादगी को पुनर्रचित करना मुश्किल होता है।2.4. बिम्ब, प्रतीक और मिथकों का अनुवाद
कविता शब्दों के माध्यम से भावचित्र बनाने का संघर्ष है । कवि चित्रकार नहीं होता, उसके पास रंग, रूप और रेखाएँ नहीं होती, फिर भी कवि चेष्टा करता है कि शब्दों में अभिव्यक्त भाव को अधिक से अधिक चाक्षुष और इन्द्रियग्राह्य बनाये। इसके लिए कवि बिम्ब रचता है। जो बिम्ब किसी अर्थ-विशेष में रूढ़ हो जाते हैं, वे प्रतीक कहलाते हैं। बिम्बों और प्रतीकों को स्रोत भाषा से उठाकर लक्ष्य भाषा में उसी भाव और संदर्भ में रचना अनुवादक के लिए कठिन चुनौती भरा कार्य हैमिथक तो किसी जाति, देश और समाज की सांस्कृति धरोहर होते हैं इनका भी अनुवाद कठिन होता है।
मिथकों के अनुवाद में अनुवादकों ने कभी-कभी स्रोत भाषा से जुड़े मिथकों की जगह लक्ष्य भाषा के मिथकों को रख कर सफल और सम्प्रेष्य अनुवाद किया है। श्री जगन्नाथदास रत्नाकर ने एलेक्जेण्डर पोप की रचना ‘Essay on criticism' का 'समालोचनादर्श' के रूप में अनुवाद करते समय यही तरीका अपनाया, जहाँ उन्होंने पोप द्वारा प्रयुक्त मिथकों की जगह भारतीय पौराणिक चरित्रों-हनुमान व रावण का उपयोग किया। पोप की निम्नलिखित पंक्तियों के अनुवाद पर नज़र डालने से रत्नाकर जी की अनुवाद-कला स्पष्ट होती है-
मूल पाठ
A Little Learning is a Dangerous thing.
Drink deep, or taste not the pierian spring.
अनुवाद
अनरथमूल महान क्षुद्र विद्या छिति माहीं ।
पीवहु सरसुतिरस अघाय कै चाखहु नाहीं ।
यहाँ पर 'सरसुतिरस' (सरस्वतीरस अर्थात) विद्या विशुद्ध भारतीय मिथक जिसे यूरोपीयन मिथक Pierian Spring की जगह रखा गया है।
2.5. सौंदर्य एवं संवदेना का संप्रेषण
काव्यानुवाद को असंभव कहने का एक बड़ा कारण यह है कि अनुवादक चाहे जितना परिश्रम कर ले, मूल का सौंदर्य एवं संवदेना अनूदित पाठ में यथावत नहीं आ पाते। हाँ, अनुवाद की प्रक्रिया में अनूदित पाठ भी एक स्वतंत्र मौलिक रचना जैसा बन जाता है। कविता में कथ्य, भाव, शैली और संवदेना- सभी मिलकर एक समग्र प्रभाव उत्पन्न करते हैं। किसी एक तत्व से यह समग्र प्रभाव नहीं उत्पन्न होता। जैसे फूल का सौंदर्य उसकी पंखुड़ियों की समन्वित रचना, रंग, पराग, सुगंध आदि सभी का मिला-जुला सौंदर्य होता है, वैसा ही प्रभाव कविता का होता है। इसलिए कविता के अनुवाद में भी अनुवादक को ऐसा ही संपूर्ण प्रभाव उत्पन्न करना पड़ता है। उदाहरण के लिए प्रसिद्ध कवि मीर तक़ी 'मीर' का शेर देखिए-
मूल पाठ
उनके देखे से जो आ जाती है, रौनक़ मुँह पे,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
अनुवाद
उनके दर्शन से आ जाती है, मुख पर शोभा,
वो समझते हैं रोगी की दशा उत्तम है।
यह ख़राब अनुवाद है। मूल शेर की अभिव्यंजना का शब्दानुवाद कर दिया गया है, जिसके कारण अनुवाद मूल के अर्थ को प्रकट करने के बावजूद उसे हास्यास्पद बना देता है।
मूल पाठ को उसकी सांस्कृतिक चेतना, विचारधारात्मक आसंगों और अभिव्यंजना-सौंदर्य के सभी तत्वों के साथ लक्ष्य भाषा में ले जाने पर ही उसका प्रभाव और प्रेषण लक्ष्य भाषा के पाठकों तक पहुँचता है। उदाहरण के लिए अंग्रेज़ी में अनूदित 'Rubeite Omar Khayyam' के आधार पर हिंदी के कई कवियों ने जिनमें केशव प्रसाद पाठक, मैथिली शरण गुप्त, हरिवंशराय बच्चन, रघुवंशलाल गुप्त, सुमित्रानंदन पंत आदि मुख्य हैं- अपने-अपने अनुवाद प्रस्तुत किए। स्वयं एडवर्ड फ़िट्जराल्ड का अनुवाद फ़ारसी भाषा और संस्कृति को अंग्रेज़ी में लाने की चेष्टा तो इन हिंदी कवियों के हिंदी अनुवाद फ़िट्ज़राल्ड के अनुवाद पर आधारित हैं। अनुवाद-दर- अनुवाद का यह सिलसिला ही साहित्य और संस्कृति की परंपरा को आगे बढ़ाता हैं।
3. नाटकानुवाद
साहित्यिक विधाओं के अनुवाद में दूसरी चुनौतीपूर्ण विधा है-नाटक नाटक पाठ्य-रूप में और मंच पर अभिनीत दोनों ही रूपों में अनुवाद किया जा सकता है, या कहना चाहिए कि पहले किसी नाटक के लिखित रूप या पाठ (Text) को अनुवाद कर उसे मंच पर प्रस्तुत किया जाता है। नाटक के अनुवाद में सबसे पहले अनुवादक को रंगमंच का ज्ञान होना चाहिए। यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि मूल नाटक का अनुवाद किस काल की भाषा में किया जा रहा है या किया जाएगा। उदाहरण के लिए हिंदी में भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने शेक्सपियर के 'मर्चेण्ट ऑफ वेनिस' का शीर्षक 'दुर्लभ बंधु वा वंशपुर का महाजन' के रूप में किया तो उसकी भाषा उनके अपने समय की भाषा थी, उन्होंने नाटक में पात्रों, स्थानों के नामों का भी भारतीयकरण कर दिया जैसे 'पोर्शिया' को 'पुरश्री' बना दिया, 'एण्टोनी' को 'अनन्त'। लेकिन शेक्सपियर के ही नाटकों का वर्तमान काल में करने वाले हरिवंश राय बच्चन, रांगेय राघव, रघुवीर सहाय आदि ने समकालीन भाषा में ही अपना अनुवाद प्रस्तुत किया और नामों का सांस्कृतिक रूपांतरण भी उन्होंने नहीं किया। नाटक के अनुवादक को स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा की रंगमंच परम्पराओं का ज्ञान होना चाहिए। नाटकों में मंचों के लिए निर्देश दिए जाते हैं, अभिनेताओं की वेशभूषा, हावभाव आदि के लिए भी नाटककार निर्देश देता है, जिनका लक्ष्य भाषा में सही अनुवाद किया जाना चाहिए। जैसे 'स्वगत', 'आकाशवाणी' आदि निर्देश 'स्वगत का अर्थ है पात्र संवाद दर्शकों को संबोधित करके या अन्य पात्रों को संबोधित न करके स्वयं अपने आप में बोले, 'आकाशवाणी' अर्थात अलक्षित रूप में कुछ कहा जाए। इसी प्रकार अंग्रेजी के 'लिविंग रूम', 'गार्डन रूम', हिंदी-संस्कृत में 'उत्तरीय' जैसे वेशभूषा से संबंधित शब्दों का अनुवादक को ज्ञान होना चाहिए ताकि लक्ष्य भाषा में वह नाटक के प्रस्तुतीकरण में सहायता दे सके। नाटक का प्राण होते हैं-संवाद, जो अलग-अलग पात्रों की वर्ग स्थिति के अनुसार अलग-अलग कोटि की भाषा में होते हैं, जैसे पढ़ा-लिखा वर्ग, ग्रामीण वर्ग, श्रमिक वर्ग, पंडित-पुरोहित, राजा, सामंत, दरबारी गण। प्राचीन संस्कृत नाटकों में राजा और उच्च वर्गीय सामंत संस्कृत में संवाद बोलते थे, जबकि स्त्रियों और सेवक वर्ग की भाषा प्राकृत हुआ करती थी। नाटक के संवादों की भाषा प्रवाहपूर्ण और अभिनेय होनी. चाहिए। उदाहरण के लिए शेक्सपियर के कुछ नाटकों के बच्चन और रांगेय राघव द्वारा किए गए अनुवादों में नाटकीयता और रंगमंचीय प्रभाव नहीं है। इसलिए वे सफल नाटकानुवाद नहीं हैं। इसका कारण है इन दोनों अनुवादकों को रंगमंच का व्यावहारिक ज्ञान न होना। नाटक 'संकलन त्रय' के सिद्धांत पर चलता है अर्थात स्थान, काल और कार्य व्यापार की एकता-अनुवादक को इसका परिज्ञान होना चाहिए।
3.1. नाटकानुवाद के अनुवाद की समस्याएँ
नाटकों के अनुवाद की दो कोटियाँ बनती हैं – (एक) मंचीय नाटकानुवाद और (दो) पाठ्य नाटकानुवाद। पाठ्य-नाटकानुवाद में नाटक के पाठ का शब्दानुसारी या वाक्यानुसारी अनुवाद किया जा सकता है जबकि मंचीय-नाटकानुवाद में अभियन, रस एवं प्रभाव को दृष्टि में रखकर, एक तरह का अनुसृजन करना होता है। स्पष्ट है कि इस प्रकार के अनुवाद के लिए अनुवादक में नाट्य लेखन की क्षमता भी मौजूद होनी चाहिए। रंगमंच के लिए मंचीय अनुवाद का विशेष महत्त्व होता है और कभी-कभी पाठ्यानुवाद के आधार पर नया मंचीय नाटकानुवाद तैयार करना पड़ता है। अन्य भाषाओं के नाटकों को मंच पर प्रस्तुत करते समय ऐसा परिवर्तन प्रायः आवश्यक हो जाता है। नाटकों के अनुवाद की प्रमुख समस्याएँ को निम्न प्रकार से प्रस्तुत किया जा सकता है-
(1) नाटकानुवाद की सबसे बुनियादी समस्या सांस्कृतिक परिवेश के अन्तरण की होती है। स्रोत एवं लक्ष्य भाषा के मध्य सांस्कृतिक परिवेश के अन्तर के कारण ही कभी-कभी रंगमंचीय नाटकानुवाद सफल नहीं हो पाता है। क्योंकि पाठ में व्यंजित अर्थ, अर्थ के आयाम, हास्य-व्यंग्य आदि सांस्कृतिक परिवेश में अभिन्न रूप से जुड़े रहते हैं।
नाटकों के अनुवाद में दो प्रकार की प्रवृत्तियाँ पायी जाती हैं। (1) स्रोत भाषा के परिवेश को लक्ष्य भाषा के परिवेश से स्थानापन्न करना और (2) लक्ष्य भाषा की सहजता को ध्यान में रखते हुए मूल की संस्कृति के तत्त्वों का अनुवाद करना या उनकी रक्षा करना।
नाट्यानुवाद की पहली प्रवृत्ति भारतेन्दु हरिश्चंद्र, जी.पी. श्रीवास्तव आदि पुराने नाटककारों के अनुवाद में पायी जाती है, जिसमें स्रोत भाषा के परिवेश को अनुवाद में लक्ष्य भाषा के परिवेश से स्थानापन्न किया जाता है। भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने ‘मर्चेन्ट आफ़ वेनिस’ नामक शेक्सपियर के नाटक के अनुवाद में (दुर्लभ बंधु 1880) भारतीय वातावरण उपस्थित करते हुए वेनिस का वंशपुर, एण्डोनिया को अजन्त, पोर्शिया को पुरश्री, शैलाक को शैलाक्ष, ईसाई को हिन्दू और यहूदी को जैन बना दिया था। जी.पी. श्रीवस्तव ने मोलियार के फ्रेंच नाटकों के अनुवाद में हास्य-व्यंग्य की अभिव्यक्ति समान भारतीय के स्थितियों की अभिव्यक्ति द्वारा किया गया है। उनके ‘नाक में दम’, ‘मियाँ की जूती मियाँ के सिर पर’ आदि अनुवादों में फ्रेंच वातावरण नहीं के बराबर है।
दूसरे प्रकार की प्रवृत्ति अनुसार नाटक के सांस्कृतिक परिवेश के संप्रेषण में लक्ष्य भाषा की सहजता को ध्यान में रखते हुए मूल की संस्कृति के तत्त्वों का अनुवाद या उनकी रक्षा करने की कोशिश की जाती है। यह वास्तव में एक मध्यमार्ग ही है जिसमें पाठ की नाटकीय अन्विति एवं मूल सांस्कृतिक तत्त्वों के बीच एक सन्तुलन बिठाने का प्रयास किया जाता है। यही नाटकानुवाद में पुनः सृजन की प्रक्रिया है। समकालीन भारतीय नाटकानुवादक इसी विचारधारा से प्रेरित होकर कलात्मक नाटकानुवाद प्रस्तुत कर रहे हैं।
(2) नाटकानुवाद की दूसरी प्रमुख समस्या संवादों के अनुवाद की है। नाटकानुवाद की भाषिक सफलता संवादों के प्रभावपूर्ण अनुवाद पर निर्भर करती है। नाटक-भाषा की प्रमुख विशेषताएँ हैं- सरलता एवं तीव्र संवेदन-क्षमता। अनुवाद की भाषा में भी ये दोनों गुण अत्यंत आवश्यक हैं। नाटकानुवाद में पात्रानुकूल भाषा-शैली के परिवर्तन पर अनुवादक को विशेष ध्यान देना पड़ता है। नाटक की भाषा अक्सर शिष्ट एवं अनौपचारिक-जनभाषा का समन्वित रूप होती है। अनुवाद को जीवंत बनाने के लिए मूल के इस भाषा-मिश्रण की कला की पहचान आवश्यक है। उस मिश्रण-कला के अनुरूप ही लक्ष्य भाषा में वैसे ही जीवंत मुहावरों का प्रयोग करना पड़ता है। नाटक में संवादों का बहुत महत्त्व होता है। संवाद को प्रभावी बनाने के लिए अक्सर शब्दालंकारों, बिंबों और प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है। अनुवाद को इन सब पर ध्यान देना पड़ता है। इसके अतिरिक्त वाक्य का नाटकीय प्रभाव भी अत्यन्त महत्त्पूर्ण होता है। इसलिए वाक्य रचना को प्रवाहपूर्ण एवं गतिशील बनाये रखना आवश्यक है। यहाँ तक कि छन्दों के अनुवाद में भी नाट्य प्रभाव का भी पूरा ख्याल रखना पड़ता है। हरिवंशराय बच्चन के ‘मैकबैथ’ और प्रतिभा अग्रवाल द्वारा किया गया बादल सरकार के ‘एवं इंद्रजित’ के काव्यांशों में अनुवाद आदि छंदों के नाटकानुकूल अनुवाद के अच्छे उदाहरण हैं। छन्दों का नीरस गद्यानुवाद नाटकीयता को वहन करने में प्रायः असफल होता है।
(3) नाटकानुवाद की तीसरी समस्या स्रोत एवं लक्ष्य भाषा की भिन्न प्रकृति से संबंधित है। स्रोत एवं लक्ष्य भाषाओं की नाट्य परंपराओं की भिन्नता के कारण अनुवादक को नाटकों के अनुवाद में कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना पड़ता है। पाश्चात्य नाटकों के अनुवाद भारतीय भाषाओं में और भारतीय नाटकों के अनुवाद पश्चिमी भाषाओं में करते समय यह समस्या विशेष रूप से उपत्न्न होती है। रंगनिर्देश, नाटकीय औपचारिकताएं, लोकरंग-मंच की युक्तियाँ आदि के रूपान्तरण में अनुवादक को अपनी कुशलता, सजगता एवं सृजनात्मकता का परिचय देना होता है। पाश्चात्य क्लासिकी नाटकों के मंचीय अनुवाद एवं प्रस्तुति में अल्काजी तथा अन्य कई भारतीय निर्देशकों एवं अनुवादकों ने भारतीय रंगमंचीय परंपराओं का भी समावेश करके नाटक को प्रस्तुत किया है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि सफल मंचीय अनुवाद, मंच-शिल्पी निर्देशक एवं अनुवादक के सम्मिलित प्रयत्नों, प्रयोगों एवं अनुभवों से ही संभव है।
(4) नाटक की सफलता भाव एवं रस की व्यंजना पर निर्भर करती है। नाटकानुवाद की सफलता भी इन्हीं तत्त्वों पर आधारित होती है। नाटकानुवाद में सृजनवत्ता और कला के तत्त्व की ज्यादा और निरे शब्दानुवाद की गुंजाइस कम होती है। इसी कारण श्रेष्ठ नाट्यानुवाद किसी भी साहित्य के अभिन्न अंग बन जाते हैं। हिन्दी में राजा लक्ष्मण सिंह की ‘शकुन्तला’ (1863), भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के ‘कर्पूर मंजरी’, ‘मुद्रराक्षस’, ‘रत्नावली’ आदि अनुवाद, बांग्ला से रूपनारायण पांडेय, प्रतिभा अग्रवाल आदि के अनुवाद तथा मराठी से विजय तेन्दुलकर आदि के अनुवाद हिन्दी नाट्य साहित्य के अभिन्न अंग माने जाते हैं। इन सब नाटकानुवादों की सफलता का कारण सृजनवत्ता ही है। वैसे तो प्रेमचन्द ने गालस वर्दी (1930-31) का लक्ष्मीनारायण मिश्र ने इब्सन का राजेन्द्र यादव ने चेखव (1957) के नाटकों अनुवाद करके यह सिद्ध किया है कि नाटकानुवाद मौलिक-लेखन जैसा ही महत्त्वपूर्ण सृजनात्मक कार्य है।
4. कथानुवाद
साहित्य की तीसरी विधा है कथा जो उपन्यास और कहानी के माध्यम से व्यक्त होती है। नाटक में भी कथा होती है किंतु संवाद और अभिनेयता इसे उपन्यास कहानी से अलग करते हैं। उपन्यास कहानी में मुख्य तत्व छह होते हैं-कथानक, चरित्र, देश-काल-वातवरण, भाषा-शैली, संवाद एवं अंतिम उद्देश्य। अनुवादक को इन सभी तत्वों को लक्ष्य भाषा में ले जाना होता है। कथा साहित्य की भाषा दो स्तरों पर चलती है, एक तो वर्णन की भाषा जो वाचक (Narrator) प्रयोग करता है, दूसरी संवादों की भाषा। उदाहरण के लिए 'उसने कहा था' में आरंभ के अनुच्छेद में लेखक वर्णन करता है, लेकिन उसके बाद अलग-अलग पात्रों के अलग-अलग स्थितियों में संवाद होते हैं, जिनमें 'कुड़माई', 'सालू' जैसे शब्द आते हैं, सिख सैनिकों के आपस में बाले जाने वाले पंजाबी मिश्रित संवाद होते हैं अनुवादक को इन सब को लक्ष्य भाषा में पुनर्रचित करना होता है।
गद्य-साहित्य का फलक बहुत व्यापक होता है। इसमें कहानी, उपन्यास, नाटक, संस्मरण, आत्मकथा, जीवनी, निबंध, यात्रावृत्तांत, रेखाचित्र आदि कई विधाएँ आती हैं। जैसा कि पिछली इकाई में स्पष्ट किया गया कि साहित्यिक अनुवाद में कुछ सामान्य तत्त्व होते हैं जिनके अनुवाद की समस्या साहित्य की लगभग सभी विधाओं के अनुवाद में सामान्य रूप से पाई जाती हैं, फिर भी साहित्य के रूप-भेद या विधा-भेद के अनुसार और उनके अनुवाद की प्रकृति तथा तत्संबंधित समस्याएँ भिन्न होती हैं। उदाहरण के लिए काव्यानुवाद की प्रकृति एवं उसकी समस्याएँ कथा-साहित्य के अनुवाद की प्रकृति एवं उसकी समस्याओं से भिन्न होती हैं। उसी प्रकार नाटकानुवाद की प्रकृति एवं समस्याएँ निबंध या आत्मकथा आदि के अनुवाद से भिन्न होती हैं। पिछली इकाई में काव्यानुवाद की समस्याओं पर चर्चा की जा चुकी है, प्रस्तुत इकाई में कथा-साहित्य (कहानी और उपन्यास), नाटक एवं गद्य-साहित्य की अनुवाद विधाओं के अनुवाद की समस्याओं पर विचार किया जा रहा है।
4.1. कथा-साहित्य (कहानी एवं उपन्यास) के अनुवाद की समस्याएँ
कथा-साहित्य से अभिप्राय मुख्य रूप से उपन्यास और कहानी से है। वैसे व्यापक अर्थ में देखा जाए तो कथा-साहित्य में लोक-कथाएँ, लघु-कहानी, लंबी-कहानी आदि को भी समाहित किया जा सकता है, जिनकी प्रकृति लगभग समान होती है। कथा-साहित्य भाषा की सीमाओं को आसानी से तोड़ता है। यही कारण है कि साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कथा-साहित्य के अनुवाद की माँग प्रायः अधिक रहती है। शरत् चंद्र चटोपाध्याय (बांग्ला), प्रेमचंद(हिन्दी), आर.के. नारायण (अंग्रेजी), अमृता प्रीतम (पंजाबी), महाश्वेता देवी (बांग्ला) , विष्णु सखाराम खंडेकर (मराठी), पी.एल. देशपाण्डेय (मराठी), गुरुजाडा अप्पाराव (तेलुगु), यू.आर. अनंतमूर्ति (कन्नड़) आदि के उपन्यास अनुवाद के माध्यम से पूरे देश में पहुँचे हैं। इसी तरह एन्ना करेनीना (Anna Karenina), गैब्रियल गार्लिया मार्खेज (Garbiel Garlia Marquez), लियो तालस्ताय (Leo Tolstoy), दास्तोवस्की(Dostoevsky), होनोर डी बाल्जाक (Honoré de Balzac), अंतोन चेखव (Anton Chekhov), चार्ल्स डिकेंस (Charles Dickens), ई.एम. फोस्टर (EM Foster), टोनी मोरिसन (Toni Morrison), रवीन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमचन्द आदि कथाकार अपनी भाषाओं की सीमा को लाँघ कर विश्व भर में लोकप्रिय हो चुके हैं। वास्तव में कथा साहित्य के अनुवाद ने ही विश्व साहित्य की परिकल्पना को साकार किया है।
अक्सर कहा जाता है कि काव्यानुवाद की तुलना में कथा-साहित्य का अनुवाद तो बहुत सरल होता है, पर यह सत्य नहीं है। कथा-साहित्य का अनुवाद भी काव्यानुवाद की भाँति कठिन हो सकता है। क्योंकि कथा-साहित्य भी काव्य की भाँति एक सर्जनात्मक विधा है। सृजनात्मक साहित्य की जो विशेषताएँ होती हैं और उसके अनुवाद में जो समस्याएँ आती हैं, वे सभी समस्याएँ कथा-साहित्य के अनुवाद में भी आ सकती हैं। कथा-साहित्य में कथन को आकर्षक एवं प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जिन शब्द-शक्तियों, मिथकों, प्रतीकों, विशिष्ट भाषिक एवं साँस्कृतिक अभिव्यक्तियों आदि प्रयोग होता है, उन सभी का अनुवाद सरल नहीं होता है।
कथा-साहित्य की विशिष्टता कथा-तत्त्व और उसके कहने की शैली पर निर्भर करती है। आधुनिक उपन्यासों में तो नवीन शिल्प-रचना के भिन्न-भिन्न प्रयोग मिलते हैं । अतः कथा-साहित्य के अनुवाद में भाषा-शैली तथा शिल्प-रचना की विशेषताओं, अर्थ-छायाओं, व्यंग्याग्यात्मक अभिव्यक्तियों, प्रतीकात्मक एवं काव्यात्मक प्रयोगों आदि पर बहुत अधिक ध्यान देना पड़ता है। मूल लेखक की शैली और उसके सूक्ष्म तत्त्वों के अध्ययन के लिए लेखक की अन्य रचनाओं तथा उसके व्यक्तित्व से परिचित होना भी आवश्यक हो जाता है। सामाजिक एवं दार्शनिक उपन्यासों के संदर्भ में कभी-कभी लेखक के सामाजिक एवं दार्शनिक चिंतन की पृष्ठभूमि को समझना भी अत्यन्त आवश्यक होता है। इनके साथ-साथ दार्शनिक, मिथकीय परिकल्पनाओं एवं पारिभाषिक शब्दों की अर्थ-छटाओं का संकेत भी अनुवादक को देना होता है। इसके अतिरिक्त कथा-साहित्य के अनुवाद के लिए अनुवादक के पास कहानी-कला या उपन्यास-कला की अच्छी जानकारी भी आवश्यक है। इन सबके अभाव में कथा-साहित्य का सफल अनुवाद संभव नहीं है। इसलिए यह कहना सही है कि कथा-साहित्य के अनुवाद में अनुवादक को काव्यानुवाद की भाँति सर्जनात्मक शक्ति की आवश्यकता रहती है।
कथा-साहित्य एक संश्लिष्ट साहित्यिक विधा है। इसमें कविता, नाटक, संस्मरण, रेखाचित्र आदि अन्य विधाओं के गुण भी समाविष्ट रहते हैं। कविता की भाँति कहानी एवं उपन्यास में भी मिथकों और प्रतीकों का प्रयोग होता है। इसमें भी अंलंकारिक शैली का प्रयोग होता है। इसमें भी लय होता है, गद्यात्मक लय, जो पद्यात्मक लय से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होता है। नाटक के पात्रों के समान उपन्यास और कहानी के पात्र भी अपनी-अपनी पृष्ठभूमि के अनुसार अलग-अलग शैली में अपने भाव व्यक्त करते हैं। वास्तव में कथाकार अपनी भावभूमि को अचेतन की गहराइयों से चेतन की भाषा में ढालने का प्रयास करता है। इसमें लक्षणा, व्यंजना और अनेकार्थता भी होती है। कथा-साहित्य के संवादों में मात्र सपाट-बयानी नहीं होती वरन् इसमें भी कविता और नाटक की भाँति काव्यात्मकता और सर्जनात्मकता का समावेश होता है।
वैसे तो कथा-साहित्य के अनुवाद की समस्याओं के अंतर्गत वे सारे तत्त्व समाहित हो जाते हैं, जिनकी चर्चा सामान्य अनुवाद की समस्याओं के संदर्भ में की जाती है, जैसे कि समतुल्य शब्दों चयन की समस्या, स्रोत एवं लक्ष्य भाषा के मध्य भाषिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक भिन्नताओं के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याएँ आदि। किंतु गद्य-साहित्य की एक विधा के रूप में कथा-साहित्य के अनुवाद की कुछ विशिष्ट समस्याएँ हैं, उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण समस्याओं की चर्चा यहाँ की जाएगी।
4.2. (क) पाठ का एक इकाई के रूप में प्रस्तुतीकरण
उपन्यास और कहानी में कई बार विभिन्न अंश एक-दूसरे के साथ जुड़े होते हैं। कई बार एक अंश को जाने बगैर दूसरे अंश का अर्थ स्पष्ट नहीं होता है। इस दृष्टि से पूरी कहानी या उपन्यास एक प्रोक्ति या इकाई होती है। अतः पाठ का सटीक अनुवाद तभी हो पाता है जब पूरी रचना को एक इकाई के रूप में ग्रहण किया जाता है।
अतः कथा-साहित्य के अनुवाद में उपन्यास को खंडों या अंशों में विभाजित कर उनका अनुवाद करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। कथा-साहित्य में पूरी कृति को एक इकाई के रूप में ग्रहण करने से पर ही उस कृति का वास्तविक अर्थ स्पष्ट हो पाता है। क्योंकि उपन्यास या कहानी के अंश परस्पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और उनके तारतम्य को देखे बिना अर्थ स्पष्ट नहीं होता। किसी उपन्यास या कहानी का पहला अनुच्छेद कृति के अंतिम अनुच्छेद से जुड़ा हो सकता है। अतः पहला अनुच्छेद समूची कृति की कुंजी होती है और अंतिम अनुच्छेद उसकी भावभूमि का आधार, इसका एक उत्तम उदाहरण भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ़ की दावत’ है।
एक बात और, समग्र पाठ को एक इकाई के रूप में ग्रहण करने से अनुवादक की सर्जनात्मकता की जानकारी भी मिलती है, जो वाक्य-प्रति-वाक्य अथवा अध्याय-प्रति-अध्याय के अनुवाद में संभव नहीं है। इसलिए कथा-साहित्य के अनुवाद में सम्पूर्ण पाठ को एक इकाई के रूप में ग्रहण करते हुए अनुवाद करना चाहिए।
4.3. (ख) सर्जनात्मक प्रयोग
सृजनात्मक साहित्य के अनुवाद में कई बार स्रोत एवं लक्ष्य भाषा के सामाजिक, एवं सांस्कृतिक स्तर पर भिन्नता के कारण अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अनुवादक को एक रचनाकार की भाँति पाठ के कथ्य एवं शिल्प को ध्यान में रखते हुए कई बार अनुवाद में कुछ जोड़ना पड़ता है या कुछ छोड़ना पड़ता है। और कई बार, मूल लेखक के संदेश अथवा मंतव्य को बनाए रखते हुए मूल पाठ की अभिव्यक्ति के लिए लक्ष्य भाषा में स्थानापन्न अभिव्यक्ति देनी पड़ती है। कई बार विभिन्न विकल्पों में से सटीक विकल्प ढूँढना पड़ता है और कई बार सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक संदर्भों के अनुसार शब्दों का चयन करना पड़ता है। कई बार उसकी व्याख्या करनी पड़ती है और कई बार लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुसार समुचित उपमान, प्रतीक, रूपक आदि का सर्जनात्मक प्रयोग करना पड़ता है, तभी वह अनूदित पाठ मूल पाठ का सहपाठ बन पाता है। केन्याई लेखक गूगी वा थियोंगो (Ngugi wa Thiongo) के उपन्यास ‘Matigari’ के मूल अंश ”Wake up zebra! One of them punched him. He woke up”. का हिन्दी अनुवाद “ उठ भैंसे! एक ने उस पर घूँसा जड़ दिया। वह जाग उठा ”। अफ्रीकी समाज के इस उपन्यास का हिन्दी अनुवाद करते हुए ‘zebra’ शब्द के स्थान पर ‘भैंसे’ शब्द का प्रयोग भारतीय संदर्भ में किया गया है, क्योंकि भारत में ‘ज़ेब्रा’ नहीं होता और यहाँ ‘भैंसा’ शब्द ‘जेब्रा’ के भारीपन का लाक्षणिक अर्थ सटीक बैठता है।
4.4. (ग) समतुल्य भाषिक अभिव्यक्ति
कथा-साहित्य के अनुवाद में समतुल्य भाषिक-अभिव्यक्तियाँ नहीं मिल पाना एक महत्त्वपूर्ण समस्या होती है। जब स्रोत और लक्ष्य भाषा की भाषिक-प्रकृति में समानता हो तो वहाँ समतुल्य भाषिक-अभिव्यक्तियाँ मिलने में कोई समस्या नहीं होती है परंतु जब भाषिक-प्रकृति में भिन्नता हो तो अनुवाद-कार्य उतना ही कठिन हो जाता है। भाषिक-अभिव्यक्तियों की समानता उन भाषाओं की सांस्कृतिक समानताओं पर भी निर्भर करती है। इसलिए भाषा और संस्कृति की परस्पर टकराहट से कई बार अनुवाद में कठिनाई पैदा हो जाती है। एक भाषा की संस्कृति में ‘चूड़ियों का टूटना’ और ‘सिंदूर का पुँछ जाना’ वैधव्य का प्रतीक होते हैं तो दूसरी संस्कृति में इनका कोई महत्त्व नहीं होता।
समतुल्य भाषिक अभिव्यक्ति के अनुवाद की समस्या को हम ‘कफ़न’ कहानी एक संवाद के माध्यम से भी समझ सकते हैं : (1) ‘मेरी औरत जब मरी थी’ का अंग्रेजी अनुवाद (अ) When your mother (आ) my mother (इ)my wife died मिलते हैं, उनमें ‘मेरी औरत’ की तीन अभिव्यक्तियों में my wife समतुल्य भारतीय संदर्भ में अधिक सटीक बैठता है। वास्तव में women शब्द में पत्नी का भाव नहीं आता और your mother में माता-पुत्र का संबंध अधिक प्रधान हो पाया है न कि पति-पत्नी का। (2) ‘सिरहाने बैठे हैं’ के अंग्रेजी समतुल्य (अ) to sit her side और (आ) to keep watch by her bed side में दूसरी अभिव्यक्ति की समतुल्यता अधिक उचित जान पड़ती है क्योंकि इसमें रोगी की देखभाल का अधिक संकेत मिलता है।
इसी प्रकार समतुल्य भाषिक अभिव्यक्ति के प्रति अनुवादक को सजग और सतर्क रहना आवश्यक होता है। यह समतुल्यता उपमानों के संदर्भ में भी देखी जा सकती है। उदाहरण के लिए हिन्दी समाज में ‘उल्लू’ का लक्षणार्थ ‘मूर्ख’ है, किंतु जापानी और यूरोपीय समाज में ‘उल्लू’ के समतुल्य क्रमशः Fukro और owl बुद्धिमत्त के प्रतीक हैं। अतः इस उपमान के समतुल्य कोई अन्य उपमान खोजना पड़ेगा जिसमें ‘मूर्खता’ का अर्थ निहित हो।
प्रत्येक समाज की भाषा में आंचलिक शब्द, गाली-गलौज, ताने और चुभते-व्यंग्य अलग-अलग होते हैं। कभी-कभी भाषा का लच्छेदार रूप भी मिलता है। फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ में मिथिला अंचल (पूर्णिया जनपद) की भाषा, मैथिली और राही मासूम रज़ा के उपन्यास ‘आधा गाँव’ में भोजपुरी भाषा के प्रयोग मिलते हैं। कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’ की भाषा में आंचलिक शब्दों के साथ-साथ गाली-गलौज, ताने और व्यंग्य का भी काफ़ी प्रयोग मिलता है। इनके अनुवाद में समतुल्य-पर्यायवाची अभिव्यक्ति पाना न तो सरल है और ना ही इनके तीखापन, बेबाकीपन और उज्जड़पन को उसी प्रभाव के से अनूदित करना संभव है।
4.5. (घ) मुहावरे और लोकोक्तियों का पुनर्विन्यास
कई बार लेखक उपन्यास या कहानी में मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग करता है। कथा साहित्य में मुहावरे और लोकोक्तियों के प्रयोग से संप्रेषण में पैनापन आता है और संदेश की अभिव्यक्ति सहज तथा यथार्थ रूप में होती है। अतः मुहावरे और लोकोक्तियों के अनुवाद में यह ध्यान रखना पड़ता है कि लक्ष्य भाषा में इनके समतुल्य अपने प्रकार्य में वही विशिष्ट भूमिका निभाए। इस प्रक्रिया में कभी-कभी पुनर्विन्यास का सहारा लेना भी पड़ता है। उदाहरण के लिए – (1) Jack of all trades, (2) to escape by a hair’s breath , (3) Better late than never का पुनर्विन्यास हिन्दी में क्रमशः ‘हरफ़न मौला’, ‘बाल-बाल बचना’, ‘देर आए दुरस्त आए’ के रूप में किया जाता है। किंतु कई बार भाषा की सामाजिक सांस्कृतिक, पौराणिक, ऐतिहासिक, पृष्ठभूमि के कारण मुहावरे अलग-अलग अर्थ लिए होते हैं, इनके समतुल्यों के निर्धारण में अनुवादक को सतर्कता बरतनी पड़ती है। उदाहरण के लिए – अंग्रेजी भाषा में lamb (मेमना) सीधेपन का प्रतीक है जो हिन्दी में ‘गऊ’ या ‘गाय’ के रूप में मिलता है। ‘He is like a lamb’ का हिन्दी अनुवाद ‘वह गऊ या गाय है’ सटीक है। किंतु ‘lamb’ की हर अभिव्यक्ति के लिए ‘गऊ’ या ‘गाय’ का समतुल्य अर्थ नहीं हो सकता। जैसे –‘ईसा मसीह’ के लिए अंग्रेजी में ‘The lamb’ या ‘lamb of the god’ अभिव्यक्ति का प्रयोग होता है। इसी प्रकार ‘lamb’ से संबंधित अन्य मुहावरे भी हैं : (1) Mutton dressed like a lamb – बूढ़ी घोड़ी लाल लगाम, (2) Wolf in a lamb’s kind – रंगा सियार और (3) God tempers the wind to the shorn lamb – जाको राखे साइयाँ मार सके न कोय; बाल न बाँका कर सके, जो जब बैरी होय।
5. साहित्यिक अनुवाद और सांस्कृतिक संदर्भ
साहित्यिक अनुवाद एक भाषा की संस्कृति का भी दूसरी भाषा में अंतरण है। इसलिए सांस्कृतिक अनुवादक के लिए बड़ी चुनौती बनता है। भाषा, संस्कृति की संवाहिका होती है और देश, जाति या समाज के आचार-विचार का समन्वित रूप होती है। आचार का संबंध जीवन-स्थितियों की भौतिक अभिव्यक्ति से है, जिसमें रहन-सहन के तौर-तरीके, मकान, भवन, रास्ते-उनका निर्माण और अलंकरण, वेशभूषा, खान-पान, अभिवादन के तरीके, शिष्टाचार आदि सभी गोचर रूप से आते हैं, जबकि विचार पक्ष के अंतर्गत मूल्य, विश्वास, कर्मकाण्ड, अनुष्ठान, मान्यताएँ, रीति-रिवाज, दर्शन, कला, सौंदर्य चेतना आदि सूक्ष्म रूप होते हैं। अनुवादक के लिए कठिनाई यहीं होती है। सूत्र रूप में इसे यूँ समझा जा सकता है कि स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा के बीच सांस्कृतिक रूप से दूरी जितनी अधिक होगी, अनुवाद उतना नहीं कठिन होगा, यह दूरी जितनी कम होगी, अनुवाद उतना ही सरल होगा। भारतीय भाषाएँ एक सांस्कृतिक परिवेश से जुड़ी हुई है, इसलिए एक भारतीय भाषा से दूसरी भारतीय भाषा में सांस्कृतिक संदर्भ का अंतरण अंग्रेज़ी और अन्य विदेशी भाषाओं की तुलना में आसान होता है। ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। 'कामायनी' के अंग्रेजी अनुवादकों में से एक भी 'यज्ञ' शब्द का समतुल्य अनुवाद करने में सफल नहीं हुआ क्योंकि यह संभव ही नहीं है। 'यज्ञ' एक कर्मकाण्ड है, अनुष्ठान है, न तो Bonafire इसका समानार्थी हो सकता है, न Holy fire और न ही Fire, जबकि 'कामयानी' के तेलुगू और संस्कृत अनुवादों में यह समस्या आई ही नहीं। इसी प्रकार प्रेमचंद्र की कहानी 'बाबाजी का भोग' का दो लोगों ने अंग्रेजी में अनुवाद किया। इसमें 'साधु' शब्द के लिए अंग्रेजी अनुवादक ने 'Wandering holy man' के रूप में व्याख्यात्मक अनुवाद किया जबकि भारतीय अनुवादक पी. लाल ने 'Sadhu' शब्द ही रहने दिया। सांस्कृतिक संदर्भों के अनुवाद में प्रायः अनुवादक मूल शब्द को ज्यों का त्यों रहने देते हैं और पाद-टिप्पणी दे देते हैं। यही हाल विचारधारात्मक प्रतीकों का होता है। 'कामायनी' के अंग्रेजी अनुवाद में ऐसे शब्द हैं, जो मूल पाठ के प्राण हैं, लेकिन उनका सटीक अनुवाद नहीं हो सकता, जैसे Bliss का उपयोग 'आनंद' के लिए नहीं किया जा सकता क्योंकि 'आनंद' केवल अनुभूति नहीं, एक दार्शनिक प्रतिपति है। एक अनुवादक ने 'आनंद' के लिए 'Joy' शब्द का प्रयोग किया जो मूल अर्थ अन्याय है। सांस्कृतिक संदर्भ में मुहावरे और लोकोक्तियों का अनुवाद भी आता है। अनुवादक के लिए सामाजिक संबंधों या रिश्तों-नातों की शब्दावली का अनुवाद भी कठिन होता है, क्योंकि अलग-अलग भाषाओं में ये संबंध अलग-अलग अर्थ- छवि लिये होते हैं। अंग्रेजी में सास-ससुर, बहू, दामाद, बहनोई, भाभी के लिए, Father-in-law, Mother-in-Law, Daughter-in-law, Son-in-law आदि शब्द हैं, जिनमें जुड़ा हुआ in law शब्द इन संबंधों की आत्मीयता को खंडित करता प्रतीत होता है। भारत में विशेष कर दक्षिण भारत में नाते-रिश्ते की शब्दावली कुछ भिन्नता लिये होती है, उदाहरण के लिए 'मामा' शब्द माँ के भाई के लिए भी प्रयुक्त होता है और 'ससुर' के लिए। 'अत्ता' शब्द 'बुआ' के लिए भी है और 'सास' के लिए भी। सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ी शब्दावली को डॉ. अर्जुन चह्वान ने अपनी पुस्तक 'अनुवाद: समस्याएँ एवं समाधान' में कुल 10 उपशीर्षकों के अंतर्गत विस्तार से विवेचित कर संभावित समाधान भी सुझाये हैं।
6. साहित्यिक रचनाओं के शीर्षकों का अनुवाद
किसी भी रचना का शीर्षक बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह उस रचना के मूल कथ्य या संदेश का सूचक होता है। कई बार शीर्षक किसी सांस्कृतिक प्रथा या विश्वास से जुड़े होते हैं, जैसे 'गोदान का अनुवाद 'Gift of a cow' किया गया, जो मूल अर्थ को प्रतिध्वनित नहीं करता। 'दान' Gift नहीं हो सकता। इस कठिनाई को समझकर दूसरे अनुवादक पी. लाल ने इसे 'गोदान' ही रखा। अर्थात अनुवादक ऐसी स्थिति में या तो मूल रचना का यथावत अनुवाद करता है या लिप्यंतरण कर देता है, या भावानुवाद करता है या सर्वदा नया शीर्षक दे देता है। तेलुगु उपन्यास 'वैवि पालु' का हिंदी अनुवाद 'सहस्रफण' इसलिए आसान हुआ कि हज़ार फण वाले नाग का मिथक भारतीय संस्कृति में मौजूद है। अंग्रेज़ी के 'मर्चेण्ट ऑफ़ वेनिस' का अनुवाद 'वंशपुर का महाजन या दुर्लभ बंधु' है, जो भावानुवाद या रूपांतरण है। इसी प्रकार शिव के कुमार के अंग्रेजी उपन्यास 'The bones of prayer का हिंदी अनुवाद सर्वथा नये शीर्षक 'आत्महत्या' के साथ किया गया है। कन्नड़ उपन्यास 'संस्कार' के हिंदी अनुवाद में ही नहीं, बल्कि अंग्रेजी अनुवाद में भी 'संस्कार' ही रखा गया क्योंकि उपन्यास के तीन-तीन अर्थ स्तरों को वहन करने वाला 'संस्कार' शब्द का अंग्रेजी पर्याय मिल ही नहीं सका।
7. साहित्यिक अनुवाद : कुछ उदाहरण
साहित्यिक अनुवाद : कुछ उदाहरण
यहाँ हम हिंदी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, उर्दू, साहित्य के कुछेक उदाहरण देखेंगे ।
हिंदी के उदाहरण :
1) लीक पुरानी ना तजै कायर, कुटिल, कपूत ।
लीक पुरानी ना रहै शायर, सिंह, सपूत ।
कायर (Timid), धोखेबाज़ (Crooked) और कुपुत्र (unworthy son) अपनी आदतों से बाज़ नहीं आते जबकि कवि, सिंह और सुपुत्र अपना धर्म नहीं छोड़ते
2) पराधीनता पाप है जान लेहु रे मीत
पराधीन मानुस से कोई करै न कबहू प्रीत (संत रैदास)
भारतीय जन-मानस में आज़ादी अर्थात् स्वतंत्रता की ललक प्राचीन काल से जागृत रही हैयह चेतना साधू-संतों में भी रही हैअकबर के समकालीन संत रैदास कहते हैं कि पराधीनता पाप है यह जान लोजो पराधीन होता है वह कभी भी किसी का भी प्रिय नहीं होता।
संस्कृत के उदाहरण :
3) वीशपत्रो नगजाति हारी
कुमारतातः शशिखंड मौलिः ।
लंकेश संपूजित पादपद्म
पायदनादिः परमेश्वरो नः ।।
यह छंद शब्द- चमत्कृति का बड़ा सुंदर उदाहरण है।
गवीश याने नंदी जिसका वाहन है वह नगजा + आर्तिहर=नगजा यानी पर्वत की पुत्री पार्वती का क्लेश हरण करने वालेकुमार-तात याने कार्तिकस्वामी के पिता; शशिखंडमौली यानी जिनके शिर पर (शशि) चंद्र का खंड (चंद्रिका) विराजित है। लंकेश यानी रावण द्वारा जिनकी पूजा हुई ऐसे शंकर परमेश्वर हमारा रक्षण करेंविशेष यह कि 'पायादनादि' इस शब्द में विष्णु के लिए अनेक अर्थ समाहित हैं।
कुछ भाषाओं के अनुवाद में, ख़ासकर अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद में, एक महत्वपूर्ण द्वंद्व हमेशा उपस्थित रहता हैवह है संस्कृत-निष्ठ हिंदी का प्रयोग बनाम फ़ारसी - अरबी लफ़्ज़ों से भरी हिंदी का प्रयोग। लेकिन कुशल अनुवादक ऐसे द्वंद्व में फँसता नहीं है। वह स्रोत सामग्री के परिवेश और संदर्भ के अनुसार शब्दों का चयन करता है और स्वाभाविक शैली में अनुवाद प्रस्तुत करता है।
अंग्रेज़ी के उदाहरण :
4) My country is the world and my religion is to do good.
'मेरा देश ही विश्व है और भलाई करना मेरा धर्म है । ' - टॉमस पेन
5) If peace cannot be maintained with honour, it is no longer peace.
यदि शांति सम्मानपूर्वक नहीं रखी जा सकती, तो वह शांति हो नहीं सकती। - जॉन रसेल
6) My concern is not whether God is on our side,
My great concern is, to be on God's side;
for God is always right.
मेरे लिए महत्व की बात यह नहीं है कि ईश्वर हमारे पक्ष में है या नहीं
मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है कि मैं ईश्वर के पक्ष में रहूँ क्योंकि ईश्वर
सदैव सही (सत्य) होता है।
- अब्राहम लिंकन
उर्दू के उदाहरण :
हिंदुस्तान में उर्दू जाननेवाले शासकों का राज्य कई वर्षों तक रहा तब उर्दू यहाँ के कुछ प्रांतों की - भाषा थी, आज भी हैउर्दू को किसी मज़हब विशेष से जोड़ना अनुचित है। लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले - शंकरदयाल ‘खुश्तर' द्वारा रचित शक्ति चालिसी का छंद उदाहरण के रूप में दृष्टव्य है ।
7) नुमायां है जनब में, रास में, कैवा में नैय्यर में
ज़ोहल में, ज़ोहर में, मिर्रीख में, माहे मुनव्वर में
शज़र में, शाख़ में, गुल में, समर में, बर्ग में, बर में,
चमन में, दश्त मैं, कोहसार में, दीवार में, दर में । ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै
देवि तुझे नमन । तू राहु में, केतु में, शनि में, सूरज में, अणु में, कण में, सूर्य-मंडल में, पूर्ण- चंद्र में, वृक्षों में, शाखों में, फूलों में, फलों में, पत्तों में, प्रकट-अप्रकट में, वनों में, पर्वतमालाओं में, हर क़दम पर, दरो-दीवार में सर्वत्र व्याप्त है।