4. कथानुवाद
4.1. कथा-साहित्य (कहानी एवं उपन्यास) के अनुवाद की समस्याएँ
कथा-साहित्य से अभिप्राय मुख्य रूप से उपन्यास और कहानी से है। वैसे व्यापक अर्थ में देखा जाए तो कथा-साहित्य में लोक-कथाएँ, लघु-कहानी, लंबी-कहानी आदि को भी समाहित किया जा सकता है, जिनकी प्रकृति लगभग समान होती है। कथा-साहित्य भाषा की सीमाओं को आसानी से तोड़ता है। यही कारण है कि साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कथा-साहित्य के अनुवाद की माँग प्रायः अधिक रहती है। शरत् चंद्र चटोपाध्याय (बांग्ला), प्रेमचंद(हिन्दी), आर.के. नारायण (अंग्रेजी), अमृता प्रीतम (पंजाबी), महाश्वेता देवी (बांग्ला) , विष्णु सखाराम खंडेकर (मराठी), पी.एल. देशपाण्डेय (मराठी), गुरुजाडा अप्पाराव (तेलुगु), यू.आर. अनंतमूर्ति (कन्नड़) आदि के उपन्यास अनुवाद के माध्यम से पूरे देश में पहुँचे हैं। इसी तरह एन्ना करेनीना (Anna Karenina), गैब्रियल गार्लिया मार्खेज (Garbiel Garlia Marquez), लियो तालस्ताय (Leo Tolstoy), दास्तोवस्की(Dostoevsky), होनोर डी बाल्जाक (Honoré de Balzac), अंतोन चेखव (Anton Chekhov), चार्ल्स डिकेंस (Charles Dickens), ई.एम. फोस्टर (EM Foster), टोनी मोरिसन (Toni Morrison), रवीन्द्रनाथ टैगोर, प्रेमचन्द आदि कथाकार अपनी भाषाओं की सीमा को लाँघ कर विश्व भर में लोकप्रिय हो चुके हैं। वास्तव में कथा साहित्य के अनुवाद ने ही विश्व साहित्य की परिकल्पना को साकार किया है।
अक्सर कहा जाता है कि काव्यानुवाद की तुलना में कथा-साहित्य का अनुवाद तो बहुत सरल होता है, पर यह सत्य नहीं है। कथा-साहित्य का अनुवाद भी काव्यानुवाद की भाँति कठिन हो सकता है। क्योंकि कथा-साहित्य भी काव्य की भाँति एक सर्जनात्मक विधा है। सृजनात्मक साहित्य की जो विशेषताएँ होती हैं और उसके अनुवाद में जो समस्याएँ आती हैं, वे सभी समस्याएँ कथा-साहित्य के अनुवाद में भी आ सकती हैं। कथा-साहित्य में कथन को आकर्षक एवं प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने के लिए जिन शब्द-शक्तियों, मिथकों, प्रतीकों, विशिष्ट भाषिक एवं साँस्कृतिक अभिव्यक्तियों आदि प्रयोग होता है, उन सभी का अनुवाद सरल नहीं होता है।
कथा-साहित्य की विशिष्टता कथा-तत्त्व और उसके कहने की शैली पर निर्भर करती है। आधुनिक उपन्यासों में तो नवीन शिल्प-रचना के भिन्न-भिन्न प्रयोग मिलते हैं । अतः कथा-साहित्य के अनुवाद में भाषा-शैली तथा शिल्प-रचना की विशेषताओं, अर्थ-छायाओं, व्यंग्याग्यात्मक अभिव्यक्तियों, प्रतीकात्मक एवं काव्यात्मक प्रयोगों आदि पर बहुत अधिक ध्यान देना पड़ता है। मूल लेखक की शैली और उसके सूक्ष्म तत्त्वों के अध्ययन के लिए लेखक की अन्य रचनाओं तथा उसके व्यक्तित्व से परिचित होना भी आवश्यक हो जाता है। सामाजिक एवं दार्शनिक उपन्यासों के संदर्भ में कभी-कभी लेखक के सामाजिक एवं दार्शनिक चिंतन की पृष्ठभूमि को समझना भी अत्यन्त आवश्यक होता है। इनके साथ-साथ दार्शनिक, मिथकीय परिकल्पनाओं एवं पारिभाषिक शब्दों की अर्थ-छटाओं का संकेत भी अनुवादक को देना होता है। इसके अतिरिक्त कथा-साहित्य के अनुवाद के लिए अनुवादक के पास कहानी-कला या उपन्यास-कला की अच्छी जानकारी भी आवश्यक है। इन सबके अभाव में कथा-साहित्य का सफल अनुवाद संभव नहीं है। इसलिए यह कहना सही है कि कथा-साहित्य के अनुवाद में अनुवादक को काव्यानुवाद की भाँति सर्जनात्मक शक्ति की आवश्यकता रहती है।
कथा-साहित्य एक संश्लिष्ट साहित्यिक विधा है। इसमें कविता, नाटक, संस्मरण, रेखाचित्र आदि अन्य विधाओं के गुण भी समाविष्ट रहते हैं। कविता की भाँति कहानी एवं उपन्यास में भी मिथकों और प्रतीकों का प्रयोग होता है। इसमें भी अंलंकारिक शैली का प्रयोग होता है। इसमें भी लय होता है, गद्यात्मक लय, जो पद्यात्मक लय से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होता है। नाटक के पात्रों के समान उपन्यास और कहानी के पात्र भी अपनी-अपनी पृष्ठभूमि के अनुसार अलग-अलग शैली में अपने भाव व्यक्त करते हैं। वास्तव में कथाकार अपनी भावभूमि को अचेतन की गहराइयों से चेतन की भाषा में ढालने का प्रयास करता है। इसमें लक्षणा, व्यंजना और अनेकार्थता भी होती है। कथा-साहित्य के संवादों में मात्र सपाट-बयानी नहीं होती वरन् इसमें भी कविता और नाटक की भाँति काव्यात्मकता और सर्जनात्मकता का समावेश होता है।
वैसे तो कथा-साहित्य के अनुवाद की समस्याओं के अंतर्गत वे सारे तत्त्व समाहित हो जाते हैं, जिनकी चर्चा सामान्य अनुवाद की समस्याओं के संदर्भ में की जाती है, जैसे कि समतुल्य शब्दों चयन की समस्या, स्रोत एवं लक्ष्य भाषा के मध्य भाषिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक भिन्नताओं के कारण उत्पन्न होने वाली समस्याएँ आदि। किंतु गद्य-साहित्य की एक विधा के रूप में कथा-साहित्य के अनुवाद की कुछ विशिष्ट समस्याएँ हैं, उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण समस्याओं की चर्चा यहाँ की जाएगी।