2. काव्यानुवाद

2.4. बिम्ब, प्रतीक और मिथकों का अनुवाद

कविता शब्दों के माध्यम से भावचित्र बनाने का संघर्ष है । कवि चित्रकार नहीं होता, उसके पास रंग, रूप और रेखाएँ नहीं होती, फिर भी कवि चेष्टा करता है कि शब्दों में अभिव्यक्त भाव को अधिक से अधिक चाक्षुष और इन्द्रियग्राह्य बनाये। इसके लिए कवि बिम्ब रचता है। जो बिम्ब किसी अर्थ-विशेष में रूढ़ हो जाते हैं, वे प्रतीक कहलाते हैं। बिम्बों और प्रतीकों को स्रोत भाषा से उठाकर लक्ष्य भाषा में उसी भाव और संदर्भ में रचना अनुवादक के लिए कठिन चुनौती भरा कार्य हैमिथक तो किसी जाति, देश और समाज की सांस्कृति धरोहर होते हैं इनका भी अनुवाद कठिन होता है।

मिथकों के अनुवाद में अनुवादकों ने कभी-कभी स्रोत भाषा से जुड़े मिथकों की जगह लक्ष्य भाषा के मिथकों को रख कर सफल और सम्प्रेष्य अनुवाद किया है। श्री जगन्नाथदास रत्नाकर ने एलेक्जेण्डर पोप की रचना ‘Essay on criticism' का 'समालोचनादर्श' के रूप में अनुवाद करते समय यही तरीका अपनाया, जहाँ उन्होंने पोप द्वारा प्रयुक्त मिथकों की जगह भारतीय पौराणिक चरित्रों-हनुमान व रावण का उपयोग किया। पोप की निम्नलिखित पंक्तियों के अनुवाद पर नज़र डालने से रत्नाकर जी की अनुवाद-कला स्पष्ट होती है- 

मूल पाठ

A Little Learning is a Dangerous thing.

Drink deep, or taste not the pierian spring.

अनुवाद

अनरथमूल महान क्षुद्र विद्या छिति माहीं ।

पीवहु सरसुतिरस अघाय कै चाखहु नाहीं ।

यहाँ पर 'सरसुतिरस' (सरस्वतीरस अर्थात) विद्या विशुद्ध भारतीय मिथक जिसे यूरोपीयन मिथक Pierian Spring की जगह रखा गया है।