1. साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति

साहित्यिक अनुवाद से तात्पर्य है सर्जनात्मक साहित्य का अनुवाद, जैसे कविता, नाटक, उपन्यास-कहानी जिसमें रचना पूरी कल्पनात्मक होती है। भले ही उसका आधार, प्रेरणा और सूत्र जीवन के यथार्थ से लिया गया हो। इसी नाते अनुवाद पुनर्रचना या पुनर्सृजन होता है क्योंकि एक भाषा की रचना को दूसरी भाषा में उसी ऊर्जा, संवेदना और सौंदर्य के साथ प्रस्तुत करना कि वह एक ओर स्त्रोत भाषा से प्रतिबद्धता निभाए और दूसरी ओर लक्ष्य भाषा में भी उसकी पहचान बने, एक दुष्कर कार्य है। अनुवादक को दोहरा कार्य करना पड़ता है। एक ओर मूल पाठ की अंत:प्रेरणा, रचना-प्रक्रिया और प्रेषणीयता को आत्मसात् करना और दूसरी ओर लक्ष्य भाषा में उसकी पुनर्दृष्टि करना। इस दृष्टि से अनुवादक में कारयित्री और भावयित्री दोनों प्रकार की प्रतिभाओं का उन्मेष आवश्यक है। साहित्यिक रचनाओं के अनुवाद में अनुवादक को ज्ञान, रसग्राह्यता, संवेदना और कल्पना से काम लेना पड़ता है। कहा गया है कि रचनाकार, रचना करने के क्रम में 'परकाय प्रवेश' कर जीवन के व्यापक और वैयक्तिक सुख-दुःख, राग-विराग का अनुभव करता है ताकि उसे रचना के रूप में अभिव्यक्ति दे सके, ऐसी स्थिति में यह नि:संकोच कहा जा सकता है कि साहित्य का अनुवादक दो-दो बार 'परकाय प्रवेश' करता है, एक ओर मूल रचना के लेखक के अनुभव जगत में प्रवेश करता है और दूसरी बार लक्ष्य भाषा में उसे रचना की पुनर्प्रस्तुति के लिए वह जैसे स्वयं लेखक का अवतार लेता है साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति जटिल, बहु-आयामी और बहु-स्तरीय होती हैसाहित्य की मुख्यत: तीन विधाएँ हैं, कविता, नाटक और कथा (उपन्यास-कहानी) इन तीनों ही विधाओं की परस्पर भिन्नता के कारण साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति भी भिन्न हो जाती है साहित्यिक अनुवाद में अभिधा का बहुत कम उपयोग होता है, लक्षणा और व्यंजना का अधिक। साहित्येतर अनुवाद में सूचना प्रमुख होती है, तो साहित्यिक अनुवाद में सूचना के साथ और सूचना से अधिक अभिव्यंजना की शैली प्रमुख होती है।

साहित्यिक अनुवाद, साहित्यिक विधाओं की परस्पर भिन्नता के अनुरूप भिन्न समस्याओं और भिन्न अपेक्षाओं से युक्त होता है। साहित्य की मुख्यतः तीन विधाओं को पूर्णतः सर्जनात्मक या सृजनात्मक साहित्य के अंतर्गत रखा जाता है, वे हैं- कविता, नाटक और कथा इसके अनुसार काव्यानुवाद, नाटकानुवाद और कथानुवाद की समस्याओं पर विचार किया जाएगा।