अनुवाद का स्वरूप
| Site: | Dr. B.R. Ambedkar Open University Online Learning Portal |
| Course: | साहित्यिक एवं साहित्येतर अनुवाद |
| Book: | अनुवाद का स्वरूप |
| Printed by: | Guest user |
| Date: | Wednesday, 15 April 2026, 1:31 AM |
Description
एक भाषा (स्त्रोत भाषा) (भाषा1, (Source Language) की किसी सामग्री का दूसरी भाषा (लक्ष्य भाषा, भाषा2, Target Language) में रूपांतरण ही ‘अनुवाद’ है। पारिभाषिक शब्दों में कहें तो स्रोत भाषा में प्रस्तुत किसी सामग्री को उसे अर्थ में लक्ष्य भाषा में प्रस्तुत करना अनुवाद है। यह अनुवाद कार्य हिन्दी से भारतीय भाषाओं में (जैसे- तेलुगु, तमिल, मलयालम, गुजराती, उड़िया, बंगाली, पंजाबी आदि में) या भारतीय भाषाओं से हिन्दी में। इसके अलावा अंग्रेजी से हिन्दी, हिन्दी से अंग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाओं में (जैसे- जर्मन, रूसी, जापानी आदि)। अनुवाद के इसी विशिष्टता को दूसरे शब्दों में विस्तार दिया जाता है कि अनुवाद मूलभाषा की सामग्री के भावों की रक्षा करते हुए उसे दूसरी भाषा में बदल देना है।
1. अनुवाद : सामान्य परिचय
2. 'अनुवाद' : शाब्दिक अर्थ
संस्कृत में “प्राप्तस्य पुनः कथनम्' अर्थात् पहले कहे गये अर्थ को फिर स्पष्ट करने हेतु कहना अनुवाद कहा गया है।
'अनुवाद' शब्द का संबंध 'वद्' धातु से है। 'वद्' धातु का अर्थ है 'बोलना' या 'कहना' । 'वद्' धातु में 'धञ' प्रत्यय योग से 'वाद' शब्द निष्पन्न हुआ है। 'वाद' शब्द के पूर्व 'अनु' उपसर्ग के जुड़ने से 'अनुवाद' शब्द निष्पन्न होता है। 'अनु' उपसर्ग अनुवर्तिता आदि अर्थों
में प्रयुक्त है। 'अनु' उपसर्ग शब्दों के साथ लगकर पीछे, समान, साथ, बारंबार, प्रत्येक, योग्य आदि अर्थ देता है। 'वाद' शब्द के साथ समान, योग्य, बारंबार आदि अर्थ जुड़कर
अनुवाद के शाब्दिक अर्थ को पुष्ट करते हैं भाषा के संदर्भ में 'अनुवाद' का अर्थ- 'पुनः कथन' या 'किसी के कहने के बाद कहना' बनता है।
प्राचीनकाल में प्राय: सभी देशों में गुरु और शिष्य के बीच 'पुनः कथन' की प्रक्रिया चलती थी। गुरु कहता था और शिष्य उसको दुहराता था। इस दुहराने की प्रक्रिया को 'अनुवाद' कहते थे। इसके साथ-साथ अनुवचन, अनुवाक आदि शब्दों का प्रयोग भी मिलता है।
'अनुवाद' शब्द आजकल अंग्रेज़ी शब्द Translation (ट्रान्सलेशन) के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होता है यह शब्द लैटिन के Trans (ट्रान्स) और Lation (लेशन) के योग से बना है। 'ट्रान्स' का अर्थ है 'पार' तथा 'लेशन' का अर्थ है 'ले जाने की क्रिया' । इस तरह एक पार से दूसरे पार तक ले जाने की प्रक्रिया ही 'ट्रान्सलेशन' की प्रक्रिया है। भाषा के संदर्भ में एक भाषा में व्यक्त भाव और विचार को दूसरी भाषा में ले जाना ही 'ट्रान्सलेशन' है। यहाँ अर्थ प्रधान होता है यही संबंध अनुवाद या 'ट्रान्सलेशन' में प्रमुख है।
अनुवाद (Translation) का आधुनिक अर्थ है - दो भाषाओं के बीच परस्पर रूपांतरण। इसी अर्थ में आज हम अनुवाद शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। अनुवाद दो भाषाओं के बीच होने वाली भाषिक प्रक्रिया है। जिस से अनुवाद किया जाता है उसे मूल भाषा/स्त्रोत भाषा (Source Language (SL, L1))कहते हैं। जिस में अनुवाद होता है उसे लक्ष्य भाषा (Target Language (TL) (L2))कहते हैं।
3. अनुवाद का महत्त्व
अनुवाद अन्य भाषाओं में प्राप्त उद्भावनाओं, संवेदनाओं, संवेगों, विचारों, ज्ञान-विज्ञानगत बोध और वि शेषताओं आदि को अपनी भाषा में संप्राप्त करने का एक सक्षम माध्यम है। जब कोई व्यक्ति या समाज मूल भाषा तक पहुँच नहीं सकता तब किसी मूल भाषा में प्राप्त एवं अपने लिए ग्राह्य के अवगाहन के लिए अनुवाद एक मात्र आधार बनता है। एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद प्रक्रिया की जटिलता को देखक र विचारकों में विश्वास फैला है कि यथा मूल अनुवाद असंभव है, फिर भी अनुवाद कार्य रुका नहीं। अनुवाद के क्षेत्र दिन-ब-दिन विस्तृत होते जा रहे हैं और अनुवाद को एक ओर गहन अध्ययन और शोध के आधार विज्ञान के धरातल पर प्रतिकृति करने के प्रयास हुए हैं तो दूसरी ओर पुन: सृजन एवं अनुसृजन की प्रक्रिया से युक्त होने के कारण उसे कला का दर्जा भी दिया गया है। आजकल अनुवाद अध्ययन को अनुप्रयुक्त भाषा विज्ञान (Applied linguistics) का गौरव भी मिला है। अनुप्रयुक्त भाषा वैज्ञानिक विश्लेषण अनुवाद के भाषिक पक्ष को अनेक कोणों से परीक्षण कर सैद्धांतिक रूप प्रदान करता हैपहले कहा जा चुका है कि आधुनिक युग अनुवाद का युग है। यह अनुवाद को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करता है अनुवाद कार्य को इतना महत्त्व क्यों? अनुवाद के द्वारा साध्य एवं मानव समूह के लिए लाभकारी तत्त्व कौन-कौन से हैं? आइए चलें इनके अन्वेषण में ।
4. अनुवाद से साध्य
अनुवाद से साध्य को दो स्तरों में देखा जा सकता है- प्रथम राष्ट्र के स्तर पर और द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय स्तर परसंसार में अनेक राष्ट्र हैं। उनमें कुछ राष्ट्रों की एक ही भाषा हैकुछ राष्ट्र बहुभाषी जन-समूहों के राष्ट्र हैंभारत बहुभाषी देश हैबहुभाषी देश या राष्ट्र के विविध प्रांतों की जनता के बीच भावात्मक एकता एवं समरसता की स्थापना प्रमुख लक्ष्य होता है। भिन्न भाषा-भाषी जनता के परस्पर अवगा हन तथा सौहार्द्रपूर्ण व्यवहारों के लिए एक दूसरे की जानकारी आवश्यक हैयह अनुवाद से ही संभव हैडॉ. रामुलु ने अपनी पुस्तक 'अनुवाद : स्वरूप और प्रक्रिया' में इस दिशा में संकेत करते हुए कहा है- “एक जीवित समाज के लिए भावी जीवन को प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए अनुवाद उपयोगी सिद्ध होगा। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी अनुवाद का महत्व प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।” (पृ. 2) विचारों और ज्ञान- विज्ञान के क्षेत्र आदान-प्रदान का एक मात्र आधार अनुवाद ही है। डॉ. रामुलु ने ऊपर प्रस्तावित पुस्तक में अनुवाद को महत्व प्रदान करने वाले निम्न ग्यारह उद्देश्यों को प्रतिपादित किया है-
भावात्मक एकता
आपसी समन्वय
ज्ञान वृद्धि
अन्य संस्कृतियों से परिचय
सांस्कृतिक एकता
अन्य राष्ट्रों की जानकारी
अभिव्यक्ति में प्रसार
विधि - न्याय संबंधी गवेषणाएँ
शोध कार्य व्यापार वृद्धि
परंपरा और संस्कृति की रक्षा
यह साध्य लक्ष्यों की सूची और बढ़ सकती हैसंक्षेप में कहा जा सकता है कि विश्व चिंतन की दिशाओं से संसार के हर कोने में रहने वाला समूह संपर्क स्थापित कर अनुवाद के ज़रिए अपने को संपन्न बना सकता है। प्राचीन विश्वजनीन विचारों से लेकर वर्तमान के बहुमूल्य वैज्ञानिक, तकनीकी तथा शासकीय ज्ञान तक को अनुवादों के माध्यम से प्राप्त कर सकते हैं।
आज का युग सब प्रकार के ज्ञान को, सब प्रकार की आवश्यकताओं की जानकारी को सब लोगों तक पहुँचाने की दिशा में दौड़नेवाला युग है। ज्ञान-विज्ञान का विकास विश्व की विस्तृत सीमाओं में संपन्न हो रहा हैइस विकास को किसी प्रांत, देश, भाषा, मानव समुदाय से जोड़कर नहीं देखा जा सकता हैयह भी सत्य से दूर है कि आधुनिक विज्ञान का विकास मात्र अंग्रेज़ी के माध्यम से ही हो रहा हैवह सभी विकसित और विकासशील देशों में हो रहा है। विकास की सीमाएँ अनंत हैं। ज्ञान वास्तव में ज्ञान होता है, सत्य होता है, चाहे वह किसी भी भाषा के माध्यम से आविष्कृत हुआ होकोई भी समाज अपनी भाषा में इस प्रकार आविष्कृत ज्ञान-विज्ञान को किसी भी भाषा स्रोत से अवतरित करना चाहता है तो यह अनुवाद के माध्यम से ही होगाइस दिशा में आगे बढ़ना आप सबकी अपरिहार्य आवश्यकता है। इसीलिए 'अनुवाद' आज के युग में महत्वपूर्ण है।
5. अनुवाद की विभिन्न परिभाषाएँ
अनुवाद के पूर्ण स्वरूप को समझने के लिए यहाँ कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषाओं का उल्लेख किया जा रहा है :-
1. नाइडा : ‘अनुवाद का तात्पर्य है स्रोत-भाषा में व्यक्त सन्देश के लिए लक्ष्य-भाषा में निकटतम सहज समतुल्य सन्देश को प्रस्तुत करना। यह समतुल्यता पहले तो अर्थ के स्तर पर होती है फिर शैली के स्तर पर।’
2. जॉन कनिंगटन : ‘लेखक ने जो कुछ कहा है, अनुवादक को उसके अनुवाद का प्रयत्न तो करना ही है, जिस ढंग से कहा, उसके निर्वाह का भी प्रयत्न करना चाहिए।’
3. कैटफोड : ‘एक भाषा की पाठ्य सामग्री को दूसरी भाषा की समानार्थक पाठ्य सामग्री से प्रतिस्थापना ही अनुवाद है।’ 1.मूल-भाषा (भाषा) 2. मूल भाषा का अर्थ (संदेश) 3. मूल भाषा की संरचना (प्रकृति)
4. सैमुएल जॉनसन : ‘मूल भाषा की पाठ्य सामग्री के भावों की रक्षा करते हुए उसे दूसरी भाषा में बदल देना अनुवाद है।’
5. फॉरेस्टन : ‘एक भाषा की पाठ्य सामग्री के तत्त्वों को दूसरी भाषा में स्थानान्तरित कर देना अनुवाद कहलाता है। यह ध्यातव्य है कि हम तत्त्व या कथ्य को संरचना (रूप) से हमेशा अलग नहीं कर सकते हैं।’
6.. हैलिडे : ‘अनुवाद एक सम्बन्ध है जो दो या दो से अधिक पाठों के बीच होता है, ये पाठ समान स्थिति में समान प्रकार्य सम्पादित करते हैं।’
7. न्यूमार्क : ‘अनुवाद एक शिल्प है, जिसमें एक भाषा में व्यक्त सन्देश के स्थान पर दूसरी भाषा के उसी सन्देश को प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है।’
8. देवेन्द्रनाथ शर्मा : ‘विचारों को एक भाषा से दूसरी भाषा में रूपान्तरित करना अनुवाद है।’
9. भोलानाथ : ‘किसी भाषा में प्राप्त सामग्री को दूसरी भाषा में भाषान्तरण करना अनुवाद है, दूसरे शब्दों में एक भाषा में व्यक्त विचारों को यथा सम्भव और सहज अभिव्यक्ति द्वारा दूसरी भाषा में व्यक्त करने का प्रयास ही अनुवाद है।’
10. पट्टनायक : ‘अनुवाद वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा सार्थक अनुभव (अर्थपूर्ण सन्देश या सन्देश का अर्थ) को एक भाषा-समुदाय से दूसरी भाषा-समुदाय में सम्प्रेषित किया जाता है।’
11. विनोद गोदरे : ‘अनुवाद, स्रोत-भाषा में अभिव्यक्त विचार अथवा व्यक्त अथवा रचना अथवा सूचना साहित्य को यथासम्भव मूल भावना के समानान्तर बोध एवं संप्रेषण के धरातल पर लक्ष्य-भाषा में अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया है।’
12. रीतारानी पालीवाल : ‘स्रोत-भाषा में व्यक्त प्रतीक व्यवस्था को लक्ष्य-भाषा की सहज प्रतीक व्यवस्था में रूपान्तरित करने का कार्य अनुवाद है।’
13. दंगल झाल्टे : ‘स्रोत-भाषा के मूल पाठ के अर्थ को लक्ष्य-भाषा के परिनिष्ठित पाठ के रूप में रूपान्तरण करना अनुवाद है।’
14. बालेन्दु शेखर : अनुवाद एक भाषा समुदाय के विचार और अनुभव सामग्री को दूसरी भाषा समुदाय की शब्दावली में लगभग यथावत् सम्प्रेषित करने की सोद्देश्यपूर्ण प्रक्रिया है।’
6. अनुवाद के प्रकार : परिचय
साहित्यिक अनुवाद : प्रकार
स्थूल रूप से साहित्यिक अनुवाद तीन प्रकार के माने जाते हैं :
अ) शब्दानुवाद : मूल कृति या वक्तव्य का शब्दश: भाषांतर करना
उदा. : माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठित:
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा ।।
माँ, शत्रु और पिता दुश्मन जो बालक को पढ़ाते नहीं।
सभा के बीच वह नहीं शोभा देता जैसे हंसों के बीच कौआ ।
आ) भावानुवाद : मूल पाठ का भाव अनुवाद में लाना। यहाँ हर शब्द का तर्जुमा नहीं होता बल्कि भावार्थ होता है। वही उदाहरण लेते हैं जो माता-पिता अपनी संतान को अच्छी शिक्षा नहीं देते वे उसके जन्म-दाता नहीं बल्कि शत्रु होते हैं क्योंकि उचित शिक्षा, पठन-पाठन, संस्कार के अभाव में वह बालक समाज में समुचित व्यवहार न कर पाने के कारण, हंसों के मध्य कौए की भाँति हँसी का पात्र बन सकता है।
इ) छायानुवाद : ऐसे अनुवाद में शब्द या भावों के स्थान पर केवल मूल पाठ के कथन की छाया आती हैयह अनुवाद मूल पाठ से बड़ा भी हो सकता है और छोटा भी । वही उदाहरण : अपनी संतान को समुचित शिक्षा न देकर उनका केवल भरण- पोषण करने वाले माँ-बाप तो उनके दुश्मन ही हैं क्योंकि ऐसे बच्चे अपमानित जीवन जीने को बाध्य होते हैं।
साहित्यिक अनुवाद में इन भेदों के अलावा कई भेद और मिलते हैं जिन पर विचार किया जाना -अनुवादक के लिए ज़रूरी है।
क) पद्यरूप में अनुवाद : समश्लोकी, समान छंद में, अलग छंद में और मूल से छोटे या मूल से बड़े आकार में अनुवाद |
ख) गद्यरूप में अनुवाद : कथा-कहानी का अनुवाद, उपन्यास का अनुवाद । नाटकानुवाद आदि ।
इनके अलावा सिनेमा के लिए अनुवाद, टी.वी. (छोटे पर्दे) के धारावाहिकों के लिए अनुवाद, थाएँ, चरित्र, लीलाएँ, बालकों के लिए अनुवाद, किशोरों के लिए अनुवाद, पाठ्य पुस्तकों में (पाठ्यक्रम अनुसार) अनुवाद, गृह-काजी महिलाओं के लिए अनुवाद, ज्ञान एवं मनोरंजन के लिए अनुवाद, ज्ञान मनोरंजन दृष्टि से पहेलियाँ, मुहावरे आदि, विज्ञापनों का अनुवाद, फ़िल्मी गीतों का अनुवाद, भाषणों अनुवाद |
फिर विषय के अनुसार भी साहित्यिक अनुवाद के अनेक भेद होते हैं। उदा : सामाजिक, ऐतिहासिक, ननैतिक, वैज्ञानिक, धार्मिक, शैक्षणिक, चरित्र-आत्म- तिलिस्मी, सत्यकथा, जासूसी, काल्पनिक आदि ।
समग्र रूप से अनुवाद के प्रकारों को निम्न आरेख के माध्यम से समझ सकते हैं
