इकाई 2: अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि

1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि

1.17. झ)   रूपान्तरण

क)    रूपान्तरण

मूल पाठ से यथासंभव मुक्त होकर एक नई रचना करने का नाम है, रूपान्तरण। यूँ तो भावानुवाद और छायानुवाद में भी अनुवादक मूल कृति से मुक्त होने की चेष्टा करता है, लेकिन रूपान्तरण का क्षेत्र बहुत व्यापक है। इसके अंतर्गत एक विधा की रचना को स्रोत भाषा से उठा कर लक्ष्य भाषा में दूसरी विधा में पुनर्प्रस्तुत किया जा सकता है। जैसे कहानी को एकांकी में परिवर्तित करना, नाटक को कहानी में बदलना, कविता की रंगमंचीय प्रस्तुति भी इसके अंतर्गत आती है। कहानी की रंगमंचीय प्रस्तुति काफ़ी दिनों से होती रही है। इसी के अंतर्गत किसी उपन्यास को फ़िल्म में बदलना, या नाटक को रेडियो प्रस्तुति के लिए ‘ध्वनि के रूपक’ में प्रस्तुत करना भी आता है। अर्थात् रूपांतरण की प्रक्रिया बहुस्तरीय होती है और इसका क्षेत्र भी व्यापक होता है।

कुछ अनुवादक मूल पाठ को लक्ष्य भाषा में ढालने की प्रक्रिया में संशोधन-संपादन का भी उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए तेलुगु उपन्यास ‘वेयिपडगलु’ का हिंदी अनुवाद करते समय अनुवादक श्री पी.वी. नरसिंहाराव ने मूल कृति के कुछ अंशों को छोड़ दिया। कई बार अनुवादक जटिल अभिव्यक्तियों या अननुवाद्य अंशों को छोड़कर अनुवाद करते हैं। कई बार मूल पाठ के कुछ अंशों का ही अनुवाद किया जाता है। ये सारी बातें अनुवाद के विशिष्ट प्रयोजन और लक्ष्य भाषा- भाषी प्रयोक्ता की आवश्यकता को देखकर निर्धारित की जाती है।