इकाई 2: अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
1. अनुवाद की प्रक्रिया और प्राविधि
1.15. छ) व्याख्यानुवाद
क) व्याख्यानुवाद
यह सारानुवाद का लगभग उल्टा है। सारानुवाद में जहाँ मूल पाठ का संक्षेप किया जाता है, वहीं व्याख्यानुवाद में मूल पाठ की व्याख्या की जाती है। मूल पाठ को लक्ष्य भाषा के पाठकों के लिए अधिक से अधिक ग्राह्य बनाने के लिए व्याख्यानुवाद का सहारा लिया जाता है। अनुवाद के इस प्रकार प्रयोग प्राचीन साहित्य के संदर्भ में शुरू हुआ। ग्रीक भाषा, संस्कृत भाषा के महाकाव्य और प्राचीन धार्मिक साहित्य के संदर्भ में व्याख्यानुवाद का उपयोग एक लंबे समय से होता आ रहा है। इस संदर्भ में इसे टीकानुवाद या भाष्य अनुवाद भी कहा जाता है। प्राचीन धर्म, दर्शन और विचारधारा से जुड़े ग्रंथों को संस्कृत से अन्य भाषाओं में रूपान्तरित करते समय कठिन अंशों की व्याख्या की जाती रही है। गीता के कई व्याख्यानुवाद हुए हैं। लोकमान्य तिलक का ‘गीतानुवाद’ ‘कर्मयोग रहस्य’ इसी का उदाहरण है।
व्याख्यानुवाद का उपयोग साहित्यिक अनुवाद और साहित्येतर अनुवाद में भी होता है। साहित्यिक अनुवाद में सांस्कृतिक विश्वासों, कर्मकाण्डों और संदर्भों से जुड़े शब्दों, भाषिक-सांस्कृतिक प्रयोग, दार्शनिक- विचाराधारात्मक प्रतीक और संकल्पनाएँ व्याख्यानुवाद के माध्यम से लक्ष्य भाषा में प्रस्तुत की जाती है। उदाहरण के लिए कुछ प्रयोग देखिए-
मूल : गंगा नहाना
अनुवाद : To bathe in the Ganges to wash away the sins.
यहाँ पर ‘गंगा नहाना’ से जुड़े हुए सांस्कृतिक विश्वास को लक्ष्य भाषा अँग्रेज़ी में व्याख्यात्मक अंश जोड़कर ही अनुवाद किया गया है, ताकि भारतीय संस्कृति से अपरिचित अँग्रेज़ी पाठकों को इसका अर्थ पूर्णतः हृदयंगम हो सके। साहित्येतर अनुवाद में व्याख्यानुवाद का प्रयोग तकनीकी प्रयोगों, प्रशासनिक अभिव्यक्तियों और वैज्ञानिक एवं विधि साहित्य जैसी सामग्री के अनुवाद में किया जाता है। व्याख्यानुवाद का प्रयोग करते समय अनुवाद को लक्ष्य पाठक का ध्यान अवश्य रखना होता है। उदाहरण के लिए एक अभिव्यक्ति और उसके अनुवाद देखिए-
मूल : No entry
अनुवाद 1 : प्रवेश निषेध।
अनुवाद 2 : अंदर आना मना है।
इसमें पहला अनुवाद शब्दानुवाद है, जो सुशिक्षित पाठकों के लिए ग्राह्य है। किंतु दूसरा अनुवाद अल्प शिक्षित और सामान्य जन को ध्यान में रखकर किया गया है।