इकाई -1: अनुवाद : अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और क्षेत्र

1. अनुवाद : अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और क्षेत्र

1.7. अनुवाद का स्वरूप

अनुवाद के स्वरूप को समझने की दिशा में अनुवाद से संबद्ध कुछ अन्य अवधारणाओं को भी समझना जरूरी है। अनुवाद (Translation) के अतिरिक्त इस प्रक्रिया के साथ निम्न शब्द भी प्रचलित हैं-

1) लिप्यंतरण    (Transliteration)

2) अनुसृजन      (Trans creation)

3) अनुलिपिकरण (Transcription)

4) रूपांतरण     (Transformation)

5) अभिग्रहण     (Adoption)

'लिप्यंतरण' में मात्र लिपि का परिवर्तन होता है। एक भाषा लिपि में प्रस्तुत पाठ दूसरी भाषा की लिपि में ज्यों का त्यों प्रस्तुत होता है। इसमें भाषा का परिवर्तन नहीं होता।

'अनु सृजन' नितांत मौलिक प्रक्रिया है। एक भाषा पाठ को दूसरी भाषा में पुनः सृजित किया जाता है। इस सृजन की प्रक्रिया में अनुवादक स्वतंत्र होता है। सही अनुवाद प्रक्रिया में मूल का अनुसरण उसकी समस्त व्यवस्थाओं के साथ होता है। किंतु अनुसृजन में भाव, कल्पना, विचारों आदि में आवश्यक परिवर्तनों की गुंजाइश रहती है। सामान्य रूप से काव्य ग्रंथों के अनुवाद में यह प्रक्रिया अधिक देखी- पहचानी जा सकती है।

'अनुलिपिकरण' यह मात्र प्रतिलिपि की प्रक्रिया है। इसे प्रतिलेखन भी कहा जा सकता है। इसके समान अर्थ में Duplicating or copy writing शब्दों को लिया जा सकता है।

'रूपांतरण' मूल कृति के एक रूप (Form) से दूसरे रूप में अंतरित करना है। काव्य से नाटक में, नाटक से उपन्यास में रूपांतरण इसी प्रकार के अंतर्गत है। यह रूपांतरण प्रक्रिया एक पाठ से दूसरे पाठ में भी संभव है। अर्थात् एक भाषा में प्राप्त उपन्यास को दूसरी भाषा में नाटक के रूप में भी सृजित किया जा सकता है।

'अभिग्रहण' प्रक्रिया मूल पाठ की सामग्री, भाव, विचार आदि को अपनी रुचि के अनुसार (अनुवादक की रुचि के अनुसार) ग्रहण करके पुनर्निर्मित करना अभिग्रहण प्रक्रिया में होता है।

उक्त सभी प्रक्रियाओं में अनुवाद (ट्रान्सलेशन) सर्वोपरि है। अनुवाद की बहु आयामिता का विश्लेषण करते हुए प्रो. उमाशंकर उपाध्याय ने कहा है- "मूल पाठ चाहे साहित्यिक हो अथवा साहित्येतर, 'संदेश' की स्थिति अनिवार्यतः महत्वपूर्ण होती है और संदेश के अंतरण का अनुपात ही यह निर्धारित करता है कि अनूदित पाठ कितना उपयुक्त और स्तरीय है।" (अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य - उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, द. भा. हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद)। इस वक्तव्य से यह विदित है कि 'संदेश' की प्रमुखता और उपयोगिता अनुवाद को महत्व प्रदान करती हैं। अनुवाद में इसके साथ-साथ चयन, कथ्य और अर्थ का संयोजन उसके स्वरूप को निष्पन्न करने वाला होता है। अनुवाद को महत्व प्रदान करने वाले अंशों में भाषा की संरचना, शैली, भावात्मकता, सांस्कृतिक पक्ष, वैचारिक दृष्टिकोण आदि उभरते हैं। इनका सम्यक् निर्वहण अनुवाद के स्वरूप को आकर्षक एवं स्थायी बनाता है।