साहित्येतर अनुवाद की आवश्यकता
2. साहित्येतर अनुवाद
2.11. साहित्येतर अनुवाद : उपलब्धियाँ और सीमाएँ
हिंदी की विभिन्न भूमिकाओं- राजभाषा, राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा और माध्यम भाषा- को सुदृढ़ और प्रभावशाली बनाने में साहित्येतर अनुवाद का मुख्य योगदान रहा हैकिसी भी देश और जाति के विकास में सर्जनात्मक और प्रयोजनमूलक गतिविधियों का योग होता है। हमारे देश को स्वाधीन, स्वायत्त और स्वनिर्भर और स्वाभिमानी बनाने के लिए इन दोनों प्रकार की गतिविधियों को हमारी अपनी भाषाओं के धरातल पर संपन्न करने की ऐतिहासिक आवश्यकता को पूरा करने में अनुवाद का विशेष महत्व रहा है। साहित्य से इतर क्षेत्र तो अत्यंत विस्तृत हैं और निरंतर विकासशील हैं। ये क्षेत्र अपनी विशिष्ट सीमाओं और एक सार्वभौमिक स्तर- दोनों रूपों में विकास कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में साहित्येतर क्षेत्रों में अनुवादकों ने बड़ी निष्ठा और अत्यंत प्रतिबद्धता का परिचय दिया हैजहाँ पत्रकारिता, जन संचार के अन्य माध्यम और विज्ञापन जैसे व्यावसायिक क्षेत्रों में धीरे-धीरे अनुवाद से हटकर हिंदी भाषा का सहज, मौलिक रूप उभर रहा है, वहाँ विधि साहित्य, विज्ञान और प्रशासन के क्षेत्र में अब भी अंग्रेज़ी की छाया से ग्रस्त हिंदी के दर्शन हो रहे हैं। फिर भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि साहित्येतर क्षेत्रों में अनुवाद के कारण संवृद्धि हुयी है ।