साहित्येतर अनुवाद की आवश्यकता

1. साहित्येतर अनुवाद की प्रकृति

साहित्येतर अनुवादजैसा कि नाम से ही स्पष्ट हैसूचना प्रधान सामग्री का अनुवाद होता है। ऐसी सामग्री तथ्य परक और प्रयोजनमूलक होती है जिसमें संदेश या message मुख्य होता हैऐसी सामग्री के अनुवाद में लक्ष्य यही होता है कि मूल पाठ का संदेश लक्ष्य भाषा के पाठक तक पहुँच रहा है कि नहीं इसलिए लक्ष्य भाषा के पाठक तक संदेश पहुँचाना साहित्येतर सामग्री के अनुवाद का प्रयोजन होता है इसी नाते जहाँ साहित्यिक सामग्री के अनुवाद में कल्पना, सर्जनात्मकता और अभिव्यंजना- सौंदर्य के कारण अनूदित पाठ एक तरह की पुनर्रचना बन जाता है, वहाँ साहित्येतर अनुवाद मूल पाठ से पूरी तरह प्रतिबद्ध होता है और वस्तुनिष्ठतथ्यपरक दृष्टि से मूल पाठ की प्रतिलिपि ही लक्ष्य भाषा में तैयार करने का प्रयास होता है। साहित्यिक अनुवाद मूलमुक्त होता है अर्थात् मूल पाठ के भाव को यथासंभव अक्षुण्ण रखते हुए, लेकिन आवश्यक स्वतंत्रता लेते हुए और परिवर्तन करते हुए लक्ष्य भाषा में पुनर्प्रस्तुत करता है, जबकि साहित्येतर अनुवाद यथासंभव मूलनिष्ठ होता है। साहित्येतर अनुवाद के लिए भावानुवाद होता है जबकि साहित्येतर अनुवाद में यथासंभव शब्दानुवाद का प्रयास होता है। साहित्यिक अनुवाद में लक्षणा और व्यंजना-शब्द-शक्तियों का प्रयोग होता है जबकि साहित्येतर में अभिधा के स्तर पर ही रहने की चेष्टा की जाती है। साहित्यिक अनुवाद में सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ी कठिनाइयाँ होती हैं, साहित्येतर अनुवाद में सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ से जुड़ी अभिव्यक्तियों को लेकर इतनी अधिक कठिनाई नहीं होती। साहित्येतर अनुवाद में मुख्यतः पारिभाषिक शब्दावली की आवश्यकता होती है। पारिभाषिक शब्द निश्चित-निर्धारित अर्थ वाले होते हैं। संदर्भ के अनुसार इसका प्रयोग करना होता है। साहित्येतर अनुवाद की भाषा इसी कारण निश्चित, निर्धारित, अर्थमयी, एकार्थी अभिव्यक्ति की भाषा होती है। बहु अर्थमयी, बहुभावमयी भाषा साहित्य की शोभा होती है, दुरूहता, अस्पष्टता, अनेक अर्थ स्तरों वाली व्यंजना प्राय: साहित्य का अलंकार होता है। साहित्य में जो कहा जाता है उससे अधिक अनकहा महत्वपूर्ण होता है। जो कहा जा रहा है उससे अधिक जो कहा जा सकता है- इसका अनुमान करना साहित्य के आस्वादन के लिए आवश्यक होता है। 'है, अभी कुछ और है, जो कुछ नहीं गया'- यह साहित्य का मुख्य अभिप्राय होता है, जिसके आगे संभावनाओं का अनंत आकाश होता है। जिसमें उड़ान भरने के लिए पाठक की कल्पना को मुक्त कर दिया जाता है। स्पष्ट है कि साहित्यिक अनुवाद में यही सब कुछ होगा जबकि साहित्येतर अनुवाद की सामग्री ही इतनी तथ्यपरकदो टूकएकार्थी होती है कि पाठक की कल्पना के लिए कुछ छोड़ा नहीं जाता । साहित्येतर अनुवाद क्रियोन्मुख होता है जैसे कार्यालयीन पत्रपरिपत्रसूचनाएँजिनमें विशेष प्रयोजन है और उस प्रयोजन की परिपूर्ति के लिए कोई न कोई कार्य व्यापार किया जाना होता है।

यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि साहित्येतर अनुवाद के क्षेत्र विविध स्तरीय हैंजिनमें वैज्ञानिक विषयों के अनुवादसरकारी कामकाज के पत्रपरिपत्रसूचनाएँ आदिविविध क्षेत्रों में न्यायालय के आदेशक़ानूनवाणिज्यव्यवसाय के क्षेत्र में बाज़ार भावविज्ञापन के साथ-साथ समाज विज्ञान जैसे अर्थशास्त्रराजनीति शास्त्र आदि का अनुवाद शामिल हैं- इसके अनुसार भाषा बदलती हैसाहित्येतर अनुवाद तो इन सभी क्षेत्रों के लिए दिया गया एक सुविधाजनक नाम हैइसके अंतर्गत अलग-अलग क्षेत्रों की भाषा अलग-अलग विशेषता लिए होती है। उदाहरण के लिए विज्ञापनों और बाज़ार भावों की भाषा में लक्षणा और व्यंजना शब्दशक्तियों का उपयोग समझे और आत्मसात किये बिना अनुवाद नहीं किया जा सकता ।