साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति
4. कथानुवाद
4.4. (ग) समतुल्य भाषिक अभिव्यक्ति
कथा-साहित्य के अनुवाद में समतुल्य भाषिक-अभिव्यक्तियाँ नहीं मिल पाना एक महत्त्वपूर्ण समस्या होती है। जब स्रोत और लक्ष्य भाषा की भाषिक-प्रकृति में समानता हो तो वहाँ समतुल्य भाषिक-अभिव्यक्तियाँ मिलने में कोई समस्या नहीं होती है परंतु जब भाषिक-प्रकृति में भिन्नता हो तो अनुवाद-कार्य उतना ही कठिन हो जाता है। भाषिक-अभिव्यक्तियों की समानता उन भाषाओं की सांस्कृतिक समानताओं पर भी निर्भर करती है। इसलिए भाषा और संस्कृति की परस्पर टकराहट से कई बार अनुवाद में कठिनाई पैदा हो जाती है। एक भाषा की संस्कृति में ‘चूड़ियों का टूटना’ और ‘सिंदूर का पुँछ जाना’ वैधव्य का प्रतीक होते हैं तो दूसरी संस्कृति में इनका कोई महत्त्व नहीं होता।
समतुल्य भाषिक अभिव्यक्ति के अनुवाद की समस्या को हम ‘कफ़न’ कहानी एक संवाद के माध्यम से भी समझ सकते हैं : (1) ‘मेरी औरत जब मरी थी’ का अंग्रेजी अनुवाद (अ) When your mother (आ) my mother (इ)my wife died मिलते हैं, उनमें ‘मेरी औरत’ की तीन अभिव्यक्तियों में my wife समतुल्य भारतीय संदर्भ में अधिक सटीक बैठता है। वास्तव में women शब्द में पत्नी का भाव नहीं आता और your mother में माता-पुत्र का संबंध अधिक प्रधान हो पाया है न कि पति-पत्नी का। (2) ‘सिरहाने बैठे हैं’ के अंग्रेजी समतुल्य (अ) to sit her side और (आ) to keep watch by her bed side में दूसरी अभिव्यक्ति की समतुल्यता अधिक उचित जान पड़ती है क्योंकि इसमें रोगी की देखभाल का अधिक संकेत मिलता है।
इसी प्रकार समतुल्य भाषिक अभिव्यक्ति के प्रति अनुवादक को सजग और सतर्क रहना आवश्यक होता है। यह समतुल्यता उपमानों के संदर्भ में भी देखी जा सकती है। उदाहरण के लिए हिन्दी समाज में ‘उल्लू’ का लक्षणार्थ ‘मूर्ख’ है, किंतु जापानी और यूरोपीय समाज में ‘उल्लू’ के समतुल्य क्रमशः Fukro और owl बुद्धिमत्त के प्रतीक हैं। अतः इस उपमान के समतुल्य कोई अन्य उपमान खोजना पड़ेगा जिसमें ‘मूर्खता’ का अर्थ निहित हो।
प्रत्येक समाज की भाषा में आंचलिक शब्द, गाली-गलौज, ताने और चुभते-व्यंग्य अलग-अलग होते हैं। कभी-कभी भाषा का लच्छेदार रूप भी मिलता है। फणीश्वरनाथ रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ में मिथिला अंचल (पूर्णिया जनपद) की भाषा, मैथिली और राही मासूम रज़ा के उपन्यास ‘आधा गाँव’ में भोजपुरी भाषा के प्रयोग मिलते हैं। कृष्णा सोबती के उपन्यास ‘मित्रो मरजानी’ की भाषा में आंचलिक शब्दों के साथ-साथ गाली-गलौज, ताने और व्यंग्य का भी काफ़ी प्रयोग मिलता है। इनके अनुवाद में समतुल्य-पर्यायवाची अभिव्यक्ति पाना न तो सरल है और ना ही इनके तीखापन, बेबाकीपन और उज्जड़पन को उसी प्रभाव के से अनूदित करना संभव है।