साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति
4. कथानुवाद
4.3. (ख) सर्जनात्मक प्रयोग
सृजनात्मक साहित्य के अनुवाद में कई बार स्रोत एवं लक्ष्य भाषा के सामाजिक, एवं सांस्कृतिक स्तर पर भिन्नता के कारण अनेक प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अनुवादक को एक रचनाकार की भाँति पाठ के कथ्य एवं शिल्प को ध्यान में रखते हुए कई बार अनुवाद में कुछ जोड़ना पड़ता है या कुछ छोड़ना पड़ता है। और कई बार, मूल लेखक के संदेश अथवा मंतव्य को बनाए रखते हुए मूल पाठ की अभिव्यक्ति के लिए लक्ष्य भाषा में स्थानापन्न अभिव्यक्ति देनी पड़ती है। कई बार विभिन्न विकल्पों में से सटीक विकल्प ढूँढना पड़ता है और कई बार सामाजिक, सांस्कृतिक और भौगोलिक संदर्भों के अनुसार शब्दों का चयन करना पड़ता है। कई बार उसकी व्याख्या करनी पड़ती है और कई बार लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुसार समुचित उपमान, प्रतीक, रूपक आदि का सर्जनात्मक प्रयोग करना पड़ता है, तभी वह अनूदित पाठ मूल पाठ का सहपाठ बन पाता है। केन्याई लेखक गूगी वा थियोंगो (Ngugi wa Thiongo) के उपन्यास ‘Matigari’ के मूल अंश ”Wake up zebra! One of them punched him. He woke up”. का हिन्दी अनुवाद “ उठ भैंसे! एक ने उस पर घूँसा जड़ दिया। वह जाग उठा ”। अफ्रीकी समाज के इस उपन्यास का हिन्दी अनुवाद करते हुए ‘zebra’ शब्द के स्थान पर ‘भैंसे’ शब्द का प्रयोग भारतीय संदर्भ में किया गया है, क्योंकि भारत में ‘ज़ेब्रा’ नहीं होता और यहाँ ‘भैंसा’ शब्द ‘जेब्रा’ के भारीपन का लाक्षणिक अर्थ सटीक बैठता है।