साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति
6. साहित्यिक रचनाओं के शीर्षकों का अनुवाद
किसी भी रचना का शीर्षक बहुत महत्वपूर्ण होता है क्योंकि यह उस रचना के मूल कथ्य या संदेश का सूचक होता है। कई बार शीर्षक किसी सांस्कृतिक प्रथा या विश्वास से जुड़े होते हैं, जैसे 'गोदान का अनुवाद 'Gift of a cow' किया गया, जो मूल अर्थ को प्रतिध्वनित नहीं करता। 'दान' Gift नहीं हो सकता। इस कठिनाई को समझकर दूसरे अनुवादक पी. लाल ने इसे 'गोदान' ही रखा। अर्थात अनुवादक ऐसी स्थिति में या तो मूल रचना का यथावत अनुवाद करता है या लिप्यंतरण कर देता है, या भावानुवाद करता है या सर्वदा नया शीर्षक दे देता है। तेलुगु उपन्यास 'वैवि पालु' का हिंदी अनुवाद 'सहस्रफण' इसलिए आसान हुआ कि हज़ार फण वाले नाग का मिथक भारतीय संस्कृति में मौजूद है। अंग्रेज़ी के 'मर्चेण्ट ऑफ़ वेनिस' का अनुवाद 'वंशपुर का महाजन या दुर्लभ बंधु' है, जो भावानुवाद या रूपांतरण है। इसी प्रकार शिव के कुमार के अंग्रेजी उपन्यास 'The bones of prayer का हिंदी अनुवाद सर्वथा नये शीर्षक 'आत्महत्या' के साथ किया गया है। कन्नड़ उपन्यास 'संस्कार' के हिंदी अनुवाद में ही नहीं, बल्कि अंग्रेजी अनुवाद में भी 'संस्कार' ही रखा गया क्योंकि उपन्यास के तीन-तीन अर्थ स्तरों को वहन करने वाला 'संस्कार' शब्द का अंग्रेजी पर्याय मिल ही नहीं सका।