साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति

4. कथानुवाद

साहित्य की तीसरी विधा है कथा जो उपन्यास और कहानी के माध्यम से व्यक्त होती है। नाटक में भी कथा होती है किंतु संवाद और अभिनेयता इसे उपन्यास कहानी से अलग करते हैं। उपन्यास कहानी में मुख्य तत्व छह होते हैं-कथानक, चरित्र, देश-काल-वातवरण, भाषा-शैली, संवाद एवं अंतिम उद्देश्य। अनुवादक को इन सभी तत्वों को लक्ष्य भाषा में ले जाना होता है। कथा साहित्य की भाषा दो स्तरों पर चलती है, एक तो वर्णन की भाषा जो वाचक (Narrator) प्रयोग करता है, दूसरी संवादों की भाषा। उदाहरण के लिए 'उसने कहा था' में आरंभ के अनुच्छेद में लेखक वर्णन करता है, लेकिन उसके बाद अलग-अलग पात्रों के अलग-अलग स्थितियों में संवाद होते हैं, जिनमें 'कुड़माई', 'सालू' जैसे शब्द आते हैं, सिख सैनिकों के आपस में बाले जाने वाले पंजाबी मिश्रित संवाद होते हैं अनुवादक को इन सब को लक्ष्य भाषा में पुनर्रचित करना होता है।

गद्य-साहित्य का फलक बहुत व्यापक होता है। इसमें कहानी, उपन्यास, नाटक, संस्मरण, आत्मकथा, जीवनी, निबंध, यात्रावृत्तांत, रेखाचित्र आदि कई विधाएँ आती हैं। जैसा कि पिछली इकाई में स्पष्ट किया गया कि साहित्यिक अनुवाद में कुछ सामान्य तत्त्व होते हैं जिनके अनुवाद की समस्या साहित्य की लगभग सभी विधाओं के अनुवाद में सामान्य रूप से पाई जाती हैं, फिर भी साहित्य के  रूप-भेद या विधा-भेद के अनुसार और उनके अनुवाद की प्रकृति तथा तत्संबंधित समस्याएँ भिन्न होती हैं। उदाहरण के लिए काव्यानुवाद की प्रकृति एवं उसकी समस्याएँ कथा-साहित्य के अनुवाद की प्रकृति एवं उसकी समस्याओं से भिन्न होती हैं। उसी प्रकार नाटकानुवाद की प्रकृति एवं समस्याएँ निबंध या आत्मकथा आदि के अनुवाद से भिन्न होती हैं।  पिछली इकाई में काव्यानुवाद की समस्याओं पर चर्चा की जा चुकी है, प्रस्तुत इकाई में कथा-साहित्य (कहानी और उपन्यास), नाटक एवं गद्य-साहित्य की अनुवाद विधाओं के अनुवाद की समस्याओं पर विचार किया जा रहा है।