साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति

3. नाटकानुवाद

साहित्यिक विधाओं के अनुवाद में दूसरी चुनौतीपूर्ण विधा है-नाटक नाटक पाठ्य-रूप में और मंच पर अभिनीत दोनों ही रूपों में अनुवाद किया जा सकता है, या कहना चाहिए कि पहले किसी नाटक के लिखित रूप या पाठ (Text) को अनुवाद कर उसे मंच पर प्रस्तुत किया जाता है। नाटक के अनुवाद में सबसे पहले अनुवादक को रंगमंच का ज्ञान होना चाहिए। यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि मूल नाटक का अनुवाद किस काल की भाषा में किया जा रहा है या किया जाएगा। उदाहरण के लिए हिंदी में भारतेंदु हरिश्चन्द्र ने शेक्सपियर के 'मर्चेण्ट ऑफ वेनिस' का शीर्षक 'दुर्लभ बंधु वा वंशपुर का महाजन' के रूप में किया तो उसकी भाषा उनके अपने समय की भाषा थी, उन्होंने नाटक में पात्रों, स्थानों के नामों का भी भारतीयकरण कर दिया जैसे 'पोर्शिया' को 'पुरश्री' बना दिया, 'एण्टोनी' को 'अनन्त'। लेकिन शेक्सपियर के ही नाटकों का वर्तमान काल में करने वाले हरिवंश राय बच्चन, रांगेय राघव, रघुवीर सहाय आदि ने समकालीन भाषा में ही अपना अनुवाद प्रस्तुत किया और नामों का सांस्कृतिक रूपांतरण भी उन्होंने नहीं किया। नाटक के अनुवादक को स्रोत भाषा और लक्ष्य भाषा की रंगमंच परम्पराओं का ज्ञान होना चाहिए। नाटकों में मंचों के लिए निर्देश दिए जाते हैं, अभिनेताओं की वेशभूषा, हावभाव आदि के लिए भी नाटककार निर्देश देता है, जिनका लक्ष्य भाषा में सही अनुवाद किया जाना चाहिए। जैसे 'स्वगत', 'आकाशवाणी' आदि निर्देश 'स्वगत का अर्थ है पात्र संवाद दर्शकों को संबोधित करके या अन्य पात्रों को संबोधित न करके स्वयं अपने आप में बोले, 'आकाशवाणी' अर्थात अलक्षित रूप में कुछ कहा जाए। इसी प्रकार अंग्रेजी के 'लिविंग रूम', 'गार्डन रूम', हिंदी-संस्कृत में 'उत्तरीय' जैसे वेशभूषा से संबंधित शब्दों का अनुवादक को ज्ञान होना चाहिए ताकि लक्ष्य भाषा में वह नाटक के प्रस्तुतीकरण में सहायता दे सके। नाटक का प्राण होते हैं-संवाद, जो अलग-अलग पात्रों की वर्ग स्थिति के अनुसार अलग-अलग कोटि की भाषा में होते हैं, जैसे पढ़ा-लिखा वर्ग, ग्रामीण वर्ग, श्रमिक वर्ग, पंडित-पुरोहित, राजा, सामंत, दरबारी गण। प्राचीन संस्कृत नाटकों में राजा और उच्च वर्गीय सामंत संस्कृत में संवाद बोलते थे, जबकि स्त्रियों और सेवक वर्ग की भाषा प्राकृत हुआ करती थी। नाटक के संवादों की भाषा प्रवाहपूर्ण और अभिनेय होनी. चाहिए। उदाहरण के लिए शेक्सपियर के कुछ नाटकों के बच्चन और रांगेय राघव द्वारा किए गए अनुवादों में नाटकीयता और रंगमंचीय प्रभाव नहीं है। इसलिए वे सफल नाटकानुवाद नहीं हैं। इसका कारण है इन दोनों अनुवादकों को रंगमंच का व्यावहारिक ज्ञान न होना। नाटक 'संकलन त्रय' के सिद्धांत पर चलता है अर्थात स्थान, काल और कार्य व्यापार की एकता-अनुवादक को इसका परिज्ञान होना चाहिए।