साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति
2. काव्यानुवाद
2.5. सौंदर्य एवं संवदेना का संप्रेषण
काव्यानुवाद को असंभव कहने का एक बड़ा कारण यह है कि अनुवादक चाहे जितना परिश्रम कर ले, मूल का सौंदर्य एवं संवदेना अनूदित पाठ में यथावत नहीं आ पाते। हाँ, अनुवाद की प्रक्रिया में अनूदित पाठ भी एक स्वतंत्र मौलिक रचना जैसा बन जाता है। कविता में कथ्य, भाव, शैली और संवदेना- सभी मिलकर एक समग्र प्रभाव उत्पन्न करते हैं। किसी एक तत्व से यह समग्र प्रभाव नहीं उत्पन्न होता। जैसे फूल का सौंदर्य उसकी पंखुड़ियों की समन्वित रचना, रंग, पराग, सुगंध आदि सभी का मिला-जुला सौंदर्य होता है, वैसा ही प्रभाव कविता का होता है। इसलिए कविता के अनुवाद में भी अनुवादक को ऐसा ही संपूर्ण प्रभाव उत्पन्न करना पड़ता है। उदाहरण के लिए प्रसिद्ध कवि मीर तक़ी 'मीर' का शेर देखिए-
मूल पाठ
उनके देखे से जो आ जाती है, रौनक़ मुँह पे,
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।
अनुवाद
उनके दर्शन से आ जाती है, मुख पर शोभा,
वो समझते हैं रोगी की दशा उत्तम है।
यह ख़राब अनुवाद है। मूल शेर की अभिव्यंजना का शब्दानुवाद कर दिया गया है, जिसके कारण अनुवाद मूल के अर्थ को प्रकट करने के बावजूद उसे हास्यास्पद बना देता है।
मूल पाठ को उसकी सांस्कृतिक चेतना, विचारधारात्मक आसंगों और अभिव्यंजना-सौंदर्य के सभी तत्वों के साथ लक्ष्य भाषा में ले जाने पर ही उसका प्रभाव और प्रेषण लक्ष्य भाषा के पाठकों तक पहुँचता है। उदाहरण के लिए अंग्रेज़ी में अनूदित 'Rubeite Omar Khayyam' के आधार पर हिंदी के कई कवियों ने जिनमें केशव प्रसाद पाठक, मैथिली शरण गुप्त, हरिवंशराय बच्चन, रघुवंशलाल गुप्त, सुमित्रानंदन पंत आदि मुख्य हैं- अपने-अपने अनुवाद प्रस्तुत किए। स्वयं एडवर्ड फ़िट्जराल्ड का अनुवाद फ़ारसी भाषा और संस्कृति को अंग्रेज़ी में लाने की चेष्टा तो इन हिंदी कवियों के हिंदी अनुवाद फ़िट्ज़राल्ड के अनुवाद पर आधारित हैं। अनुवाद-दर- अनुवाद का यह सिलसिला ही साहित्य और संस्कृति की परंपरा को आगे बढ़ाता हैं।