साहित्यिक अनुवाद की प्रकृति

2. काव्यानुवाद

2.1. काव्यानुवाद : छन्दोबद्ध अनुवाद

कविता मुख्यतः और प्रथमतः छन्दोबद्ध रचना होती है, छन्दमुक्त या मुक्तछन्द का प्रयोग बहुत बाद में होने लगा मूल पाठ यदि छंदोबद्ध हो तो अनुवादक को सबसे पहला निर्णय यह लेना होता है कि वह अनुवाद छन्दोबद्ध करे या मुक्तछन्द में या गद्यानुवाद । यदि छन्दोबद्ध अनुवाद करना हो तो दूसरी समस्या उठती है कि मूल पाठ में प्रयुक्त छन्द लक्ष्य भाषा में उपलब्ध है या नहीं, और यदि उपलब्ध हो भी तो अनुवादक क्या उसी छन्द का प्रयोग करना चाहेगा या कर सकेगा। अनुवाद के क्षेत्र में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब लक्ष्य भाषा में समान छन्द सुलभ न होने पर अनुवादक ने अपनी ओर से लक्ष्य भाषा में उसी छन्द को गढ़ा है। रामचरितमानस का रूसी भाषा में अनुवाद करते समय अनुवादक वरान्निकोव ने दोहा - चौपाई के अनुवाद के माध्यम छन्द का निर्माण किया तो अंग्रेज़ी छन्द सॉनेट का निर्माण त्रिलोचन ने हिंदी में किया। उर्दू शेर अग्रेज़ी में उपलब्ध नहीं है किंतु प्रो. शिव के. कुमार ने फ़ैज अहमद 'फ़ैज' की शायरी को अंग्रेज़ी में अ से पुनर्प्रस्तुत करते समय अंग्रेज़ी में 'शेर' छन्द को गढ़ा। किसी कृति का छन्द विधान अनुवादक इतना सम्मोहित कर जाता है कि अनुवाद करने के लिए उसकी प्राथमिकता-छन्द विधान ही बन जाती है। उदाहरणस्वरूप हिंदी की कालजयी कृति- 'कामायनी' को लिया जा सकता है। कामायनी का पहला अंग्रेज़ी अनुवाद श्री बी. एल. साहनी ने किया, जिसमें उन्होंने छन्द का अपना ही रूप रखा, इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि तुक मिलता है या नहीं। 'कामायनी' आधुनिक महाकाव्य है और महाकाव्य शर्तों के अनुसार इसमें अलग-अलग सगों में अलग-अलग छन्दों का प्रयोग हुआ है। 'कामायनी' की इस विशेषता से आकर्षित हुए श्री मनोहर बन्दोपाध्याय और उन्होंने अंग्रेज़ी में अनुवाद करते समय अंग्रेज़ी में वही, छन्द गढ़े जो मूल कृति में प्रयुक्त हुए थे।