अनुवाद का स्वरूप
2. 'अनुवाद' : शाब्दिक अर्थ
संस्कृत में “प्राप्तस्य पुनः कथनम्' अर्थात् पहले कहे गये अर्थ को फिर स्पष्ट करने हेतु कहना अनुवाद कहा गया है।
'अनुवाद' शब्द का संबंध 'वद्' धातु से है। 'वद्' धातु का अर्थ है 'बोलना' या 'कहना' । 'वद्' धातु में 'धञ' प्रत्यय योग से 'वाद' शब्द निष्पन्न हुआ है। 'वाद' शब्द के पूर्व 'अनु' उपसर्ग के जुड़ने से 'अनुवाद' शब्द निष्पन्न होता है। 'अनु' उपसर्ग अनुवर्तिता आदि अर्थों
में प्रयुक्त है। 'अनु' उपसर्ग शब्दों के साथ लगकर पीछे, समान, साथ, बारंबार, प्रत्येक, योग्य आदि अर्थ देता है। 'वाद' शब्द के साथ समान, योग्य, बारंबार आदि अर्थ जुड़कर
अनुवाद के शाब्दिक अर्थ को पुष्ट करते हैं भाषा के संदर्भ में 'अनुवाद' का अर्थ- 'पुनः कथन' या 'किसी के कहने के बाद कहना' बनता है।
प्राचीनकाल में प्राय: सभी देशों में गुरु और शिष्य के बीच 'पुनः कथन' की प्रक्रिया चलती थी। गुरु कहता था और शिष्य उसको दुहराता था। इस दुहराने की प्रक्रिया को 'अनुवाद' कहते थे। इसके साथ-साथ अनुवचन, अनुवाक आदि शब्दों का प्रयोग भी मिलता है।
'अनुवाद' शब्द आजकल अंग्रेज़ी शब्द Translation (ट्रान्सलेशन) के पर्याय के रूप में प्रयुक्त होता है यह शब्द लैटिन के Trans (ट्रान्स) और Lation (लेशन) के योग से बना है। 'ट्रान्स' का अर्थ है 'पार' तथा 'लेशन' का अर्थ है 'ले जाने की क्रिया' । इस तरह एक पार से दूसरे पार तक ले जाने की प्रक्रिया ही 'ट्रान्सलेशन' की प्रक्रिया है। भाषा के संदर्भ में एक भाषा में व्यक्त भाव और विचार को दूसरी भाषा में ले जाना ही 'ट्रान्सलेशन' है। यहाँ अर्थ प्रधान होता है यही संबंध अनुवाद या 'ट्रान्सलेशन' में प्रमुख है।
अनुवाद (Translation) का आधुनिक अर्थ है - दो भाषाओं के बीच परस्पर रूपांतरण। इसी अर्थ में आज हम अनुवाद शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। अनुवाद दो भाषाओं के बीच होने वाली भाषिक प्रक्रिया है। जिस से अनुवाद किया जाता है उसे मूल भाषा/स्त्रोत भाषा (Source Language (SL, L1))कहते हैं। जिस में अनुवाद होता है उसे लक्ष्य भाषा (Target Language (TL) (L2))कहते हैं।